नशेड़ी ओशो के अनुसार बच्चे खुलकर नशा करें...
सिगरेट और शराब पीने वालों पर कुख्यात व्यभिचारी ओशो के यह विचार जान लीजिए...
ओशो कहता है - ❝ सभ्यता दो रोग पैदा करवाती है, एक तरफ अहंकार और एक तरफ अपराध। तुमने किसी बच्चे को कहा, सिगरेट नहीं पीना; महापाप है, नरक में सड़ोगे। तुमने डरवाया। अब अगर पीएगा, तो अपराध-भाव पैदा होगा कि मैंने कुछ पाप किया। मां-बाप से झूठ बोला, छिपाया। वह डरा-डरा घर आएगा। चैकन्ना रहेगा कि कहीं न कहीं से खबर मिलने ही वाली है। कोई न कोई देख ही लिया होगा। कपड़े में बास आ जाएगी मां को। मुंह को पास लाएगा, तो मुंह से पता चल जाएगा। वह पकड़ा ही जाने वाला है। वह अपराध से भरा हुआ है, डर रहा है, घबड़ा रहा है। ❞[1]
अब इस कथन पर क्या कहे? कोनसी गाली दे? कोई शब्द ही नहीं बचा। निशब्द। ये कितना मुढ़बुद्धि रहा होगा इसका अनुमान आप लगा सकते हैं। पहला तो इसको समाज में जो असामाजिक तत्व है जो समाज मे अत्यंत निषिद्ध तथा लॉ तथा विज्ञान के विरूद्ध गलत काम करते हैं उनको अपनी ओर आकृष्ट करना था। और अपने आप को उनमे भगवान के रूप में प्रतिष्ठित करना था। इसने अपनी योजना या अभियान की ऐसी ही रूपरेखा गढी है जैसे कयी ढोंगी पाखंडी रचते है लेकिन ये कुछ ज्यादा एडवांस व्यभिचारी था। खुलापन फैलाना स्वतंत्रता है ऐसा बिल्कुल वामपंथी तर्ज पर ये कहता था। स्त्री माने वाम नारीवाद पर भी ये बोलता था। परस्त्रीगमन होना चाहिए ऐसा इसका अभिमत था उसी का तो इसने ये पंथ बनाया । विदेश में व देश में ये पंथ हेतु चलता रहा। अपनी वामपंथी अभारतीय क्राइम इंडस्ट्री के रूप में इसने वापिस आकर कथित आश्रम या वेश्यालय या कोठा पूणे मे खोला था। ओशो अब्रह्मचर्य व व्यभिचार नशेड़ी बनने के साथ कुछ अच्छी आध्यात्मिक पुस्तकों को पढकर प्रवचन गढकर पुस्तक छपवाने का भी लंबा धंदा किया। जिससे इसके कामी दुराचारी बुद्धिहीन लम्पट चेले चपाटे इसे नैतिक, दार्शनिक या ज्ञानी बताते नही थकते। लेकिन यही देख लिजिए कितनी दुराचरण की बात कर रहा है, और सिगरेट न पीने देने का जो दबाव भय बच्चो मे अभिभावकों का होता है, उसे परतंत्रता प्रताड़ना बता रहा है और धर्म से जोड रहा है, स्वर्ग नर्क से जोड रहा है जबकि कही किसी ग्रंथ में ऐसा नही लिखा । अपितु दुराचरण लिखा है, और उससे होनेवाली हानी दुख ही नर्क है। केवल अनैतिक ही नहीं अवैज्ञानिक बात कर रहा है। इसकी माने तो हर बच्चे निसंकोच शराब बीडी गुठका सिगरेट निर्भीक होकर गुरूजनों व अभिभावकों के समक्ष सेवन करे।
➡️ इसके दो कारनामे बच्चो के संदर्भ में प्रमाण के साथ जानिए :-
(१) इसका खुलासा एक लडके ने किया कि जब वह 10 साल का था तो पुणे आश्रम मे क्या क्या होता था क्या चलता था वो इसने बताया जो कि न्यूज चैनल के वेबसाइट पर लेख उपलब्ध है। इसके माता पिता व्यभिचार कर रहे थे अलग-अलग पार्टनर से व इसे 10 साल के आयु मे बीयर दारू आदि पिलाकर नशेड़ी बना दिया गया। फिर इसकी असुरक्षा की भावना इसके मां की व्यथा गाथा इसने बताया है।Osho Ashram: खुले-आम सेक्स, नशा और आजादी! [2]
(२) "वर्ष 1957 में दर्शनशास्त्र के प्राध्यापक के तौर पर रजनीश रायपुर विश्वविद्यालय से ये ओशो जुडा। लेकिन वहां भी अपने व्यभिचार नशा करने के शिक्षा के चलते, गैर परंपरागत धारणाओं और जीवनयापन करने के तरीके को छात्रों के नैतिक आचरण के लिए घातक समझते हुए विश्वविद्यालय के कुलपति ने उनका स्थानांतरण कर दिया।
~ विकिपीडिया
ओशो को दार्शनिक मानने वाले चेले चपाटे ये बताए कि ये कौनसा दर्शन है कौनसा मोक्ष की प्राप्ति मार्ग है जहा दस वर्ष के बालक को शराब पीना नशा करना व दंपति को व्यभिचार करना सिखाया जाता है? जो कि गैर कानूनी ही नहीं गैर पारंपरिक ही नहीं अनैतिक ही नहीं अपितु संपूर्ण रूप से निषिद्ध अवैज्ञानिक वाममार्ग है। अनुमान प्रमाण तो यही कहता है कि ओशो का बलात्कारी होना तो सामान्य बात थी। मर्डर हत्या का नर्क पैदा करना ही इसका काम रहा। निस्संदेह ये एक एजेंट हो सकता है। जैसे की कि कैप्टन अजीत वडकायिल नामक ब्लागर ने लिखा है कि ओशो एक रो-श्चि-ल्ड एजेंट था। और एक एंगल से यहूदी था और हम केवल इतना जानते हैं कि वो जैन मूल का था । ओशो का पंथ अधिकांश यहूदी चेलो से चला।
▶️ नशे से स्मोकिंग से हानी संबंधित वैज्ञानिक विश्लेषण व रिपोर्ट्स...[3]
शोधकर्ताओं ने अपने अध्ययन में पाया गया कि तीन से 18 साल की आयु के वैसे 2,000 से अधिक बच्चों की सेहत को खतरा है जिनके माता-पिता दोनों ही सिगरेट पीते हैं.
विशेषज्ञों का ये भी मानना है कि 'पैसिव स्मोकिंग' यानि सेकेंड हैंड स्मोकिंग से हाने वाले खतरे का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता है.
फिनलैंड और ऑस्ट्रेलिया में किए जाने वाले इस शोध में यह बात सामने आई है कि धुंए से भरे घर में पल-बढ़ रहे् बच्चों की सेहत पर बुरा प्रभाव पड़ता है. हालांकि स्मोकिंग से शरीर को होने वाले नुकसान के अलावा दूसरे नुकसानों को नकारना कठिन है.
जिस बच्चे के माता-पिता दोनों धूम्रपान करते हैं जब उनका अल्ट्रासाउंड किया गया तो उसमें ये देखा गया कि बच्चे के गले से सिर तक जाने वाली मुख्य धमनी की दीवारों में कुछ बदलाव आए हैं.
जांचकर्ताओं का कहना है कि हालांकि धमनी की दीवारों में आया ये परिवर्तन मामूली है लेकिन 20 साल बाद बच्चे के वयस्क हो जाने पर यही बदलाव महत्वपूर्ण और असरकारक हो जाते हैं.
शोध करने वाले तस्मानिया विश्वविद्यालय के डॉ सिएना गल का कहना है, "हमारा अध्ययन बताता है कि जो बच्चा बचपन में पैसिव स्मोकिंग का शिकार होता है उसकी धमनियों की संरचना को प्रत्यक्ष और अपूरणीय क्षति पहुंचती है."
उन्होंने बताया, "माता-पिता को, यहां तक कि जो अभी मां या पिता बनने वाले हैं, उन्हें बिना देर किए सिगरेट पीना छोड़ देना चाहिए. इससे न केवल उनकी सेहत पर सकारात्मक असर पड़ेगा बल्कि उनके बच्चों को भी भविष्य में बुरी सेहत का सामना नहीं करना पड़ेगा."
इस अध्ययन में सिगरेट पीने वाले बच्चों को शामिल करने के बावजूद शोध के नतीजे नहीं बदलें.
हां, माता या पिता में से किसी एक के ही सिगरेट पीने की स्थिति में बच्चों की सेहत पर कोई असर नहीं देखा गया. संभवतः ऐसा इसलिए हुआ हो कि इस स्थिति में सिगरेट के धुंए का ज्यादा बड़ा प्रभाव क्षेत्र बन पाया.
डॉ गल कहते हैं, "यदि घर में कोई एक ही व्यस्क सिगरेट पीता हो और वह घर के बाहर जाकर सिगरेट पीता हो, तो इससे पैसिव स्मोकिंग का असर कम हो जाता है. लेकिन हमारे पास इसे साबित करने के लिए आंकड़े नहीं हैं, इसके बारे में केवल अटकल ही लगाया जा सकता है."
स्थितियां चाहे जो हों, शोधकर्ताओं का कहना है कि बच्चों को सेकेंड हैंड स्मोकिंग से बचाया जाना चाहिए.
ब्रिटिश हार्ट फाउंडेशन में ह्रदय रोग की वरिष्ठ नर्स डोरियन मड्डोक का कहना है, "पैसिव स्मोकिंग से सेहत को हाने वाला नुकसान जगजाहिर है. मगर ये अध्ययन इससे एक कदम आगे जाकर यह बताता है कि इससे बच्चों की धमनियों को प्रत्यक्ष और अपूरणीय क्षति पहुंचती है, जिससे भविष्य में बच्चों के दिल से जुड़े रोगों के पनपने के खतरे बढ़ जाते हैं."
वे कहती हैं, "अगर आप सिगरेट पीते हैं तो बच्चे को इससे होने वाले नुकसान से बचाने का सबसे असरदार उपाय है कि आप सिगरेट पीना तुरंत छोड़ दें."
उन्होंने आगे कहा, "और यदि ये मुमकिन नहीं तो कम से कम घर, या कार में सिगरेट बिलकुल ना पिएं. यह बेहतर विकल्प है."
वहीं दूसरी ओर स्मोकर्स ग्रुप 'फॉरेस्ट' के प्रमुख साइमन क्लार्क कहते हैं, "हमें दहशत फैलाने वाली इन अफवाहों से दूर रहना चाहिए. क्योंकि धमनियों को नुकसानदेह भोजन और वायु प्रदूषण सहित कई और कारणों से भी नुकसान पहुंचता है."
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▶️ क्या ओशो दार्शनिक था? यदि ऐसा व्यक्ति दार्शनिक कहलाए तो कोठे की हर तवायफ भी दार्शनिक होंगी। जिनमे किसी की कैसी भी स्वच्छंद काल्पनिक विचारधारा होगी। कोई शराब से समाधि कहेगा कोई संभोग से समाधि कहेगा तो कोई सिगरेट पीने से मोक्ष की प्राप्ति बताएगा। इसप्रकार विचार करें तो प्रत्येक भांडवर्ग का भांड आध्यात्मिक न कहलाए तो कहना ही क्या। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि ओशो जैसा व्यभिचारी भी ब्रह्मचर्य पर लेक्चर देता था। वाणी और कर्म मे भिन्न ऐसी ही पंथ अनुचर जान ले की ब्रह्मचर्य की परिभाषा क्या है? ब्रह्मचर्य क्या होता है। दर्शन की परिभाषा क्या है? क्रमशः जानेंगे।
1️⃣➡️ ब्रह्मचर्य :
आयुर्वेद की चरक संहिता , उपनिषद एवं पुराण इनमे ये श्लोक ब्रह्मचर्य व्याख्या के रूप में प्रसिद्ध है -
स्मरणं कीर्तनं केलि प्रेक्षणं गुह्य भाषणं ।
संकल्पो अध्यवसायश्च क्रिया निवृतिरेवच ॥
अर्थात् शारीरिक और मानसिक क्षीणता करने वाले ये अष्ट मैथुन हैं -
(1) स्त्री का ध्यान करना , स्त्री के बारे में सोचते रहना कल्पना करते रहना ।
(2) कोई श्रृंगारिक , कामुक कथा का पढ़ना , सुनना ।
(3 ) अंगों का स्पर्श , स्त्री पुरुषों के द्वारा एक दूसरे के अंगों का स्पर्श करना ।
(4) श्रृंगारिक क्रीडाएँ करना ।
(5 ) आलिंगन करना ।
(6) दर्शन अर्थात नग्न चित्र या चलचित्र का दर्शन करना ।
(7) एकांतवास अर्थात अकेले में पड़े रहना ।
(8 ) समागम करना अर्थात यौन सम्बन्ध स्थापित करना । जो इन सभी मैथुनों को त्याग देता है वही ब्रह्मचारी है ।
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➡️ पंचशील के महत्व को समझाते हुए तथागत बुद्ध ने भिक्खुओं को धम्मोपदेश दिया था। तृतीय पंचशील का नियम है - व्यभिचार से विरत रहना : मानव को मिथ्या आचरणों के कारण अपमानित होना पड़ता है , इसलिए गलत आचरण करने से बचना चाहिए । व्याभिचारी व्यक्ति का जीवन पतित होता है , समाज में ऐसे व्यक्ति को सम्मान नहीं मिलता । जो मानव कामवासना से विरत रहता है , समाज उसका सम्मान करता है । तथागत बुद्ध ने भिक्खुओं को धम्मोपदेश देते कहा है कि मनुष्य को शारीरिक दुष्चरित्र को त्याग करके शरीर से सदाचार का आचरण करना चाहिए । शरीर को सदैव संयत रखना चाहिए । पर - स्त्री का सेवन करने वाला प्रमत्त मनुष्य का जीवन पापमय व दुखदायी होता है यथा - चत्तारि ठानानि नरो पमत्तो , आपज्जति परदारूपसेवी । अपुज्जलाभं न निकामसेय्यं निन्दं ततियं निरयं चतुत्थ ।। धम्मपद - 309
अर्थात्- प्रमादी एवँ परस्त्रीगामी मनुष्य को चार - गतियां प्राप्त होती है- पाप का भागीदार , सुख में अनिद्रा , निन्दा तथा दुखदायी जीवन।
यो च वस्ससतं जीवे , दुस्सीलो असमाहितो । एकाहं जीवितं सेय्यो , सीलवन्तस्स झायिनो । धम्मपद - 110
अर्थात्- दुराचारी और असंयत रहकर सौ वर्ष जीवित रहना निरर्थक है , सदाचारी और संयत शीलवान का एक दिन का जीवित रहना ही श्रेष्ठ है । [4]
भगवान बुद्ध कहते हैं - जो लोग ब्रह्मचर्य का पालन नहीं करते और जवानी में धन नहीं जुटाते , वे उसी तरह नष्ट हो जाते हैं , जिस तरह मछलियों से रहित तालाब में बूढ़े क्रौंच पक्षी ।
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➡️ ब्रह्मचर्य को नष्ट करने से आधि भौतिक , आधि दैविक और आध्यात्मिक तीनों प्रकार की हानियाँ होती है ।
(१) आधि भौतिक हानि यह है कि शरीर कमजोर हो जाता है , नेत्रों की दृष्टि निर्बल पड़ जाती है । पाचन क्रिया मंद होती है , फेफड़े निर्बल बनते हैं , सहन शक्ति घटती है । तेज नष्ट होता है और दुर्बलता के कारण देह में नाना प्रकार के रोगों का अड्डा स्थापित हो जाता है ।
(२) आधि दैविक हानियाँ यह हैं कि - मस्तिष्क पोला हो जाता है । बुद्धि मंद पड़ जाती है , स्मरण शक्ति का ह्मस होता है । सूक्ष्म विचारों को ग्रहण करने की शक्ति घट जाती है , विद्या सीखी नहीं जाती । अन्तः करण ऐसा मलीन हो जाता है कि , स्वार्थ , लोभ , कपट , पाप आदि के आक्रमणों का विरोध करने की उसमें क्षमता नहीं रहती , इच्छा शक्ति , ज्ञान मनुष्य साहस हीन , इन्द्रियों का गुलाम भयभीत , चिन्तित और हीन मनोवृत्ति का बन जाता है ।
(३) ब्रह्मचर्य नष्ट करने से जो आध्यात्मिक हानि होती है वह तो बहुत ही दुखदायी है । आत्मा के स्वरूप को पहचानना , ईश्वर में परायण होना , धर्म कर्तव्यों पर बढ़ने के लिए कदम उठाना विषय वासना में रत मनुष्य के लिए क्या कभी संभव है ? ऐसे व्यक्तियों के लिए योग साधना एक कल्पना का विषय ही हो सकता है । कई असंयमी मनुष्य योग क्रियाओं में उलझे तो उन्हें तपैदिक , पागलपन या अकाल मृत्यु का सामना करना पड़ा ।
ब्रह्मचर्य को नष्ट करना एक ऐसा अपराध है जिसका फल न केवल अपने को वरन् समस्त सृष्टि को भोगना पड़ता है । लम्पट व्यक्तियों के निर्बल वीर्य से जो संतान उत्पन्न होती है वह भी अपने पिता की कमजोरी विरासत में साथ लाती है । ऐसी सन्तान संसार के लिए भार रूप ही सिद्ध होती है वह अपने और दूसरों के कष्ट में ही वृद्धि करती रहती है । जीवों के श्रेणी उत्पादन का क्रम यही है कि उन्नत आत्माएं तेजस्वी पिताओं के वीर्य में प्रवृष्ट होकर जन्म धारण करती हैं और पाप योनियों में जाने वाली पतित आत्मायें निर्बल व्यक्तियों के वीर्य का आश्रय ग्रहण करके जन्म लेती हैं । जिस देश के मनुष्य लम्पट और दुर्बल होंगे वहाँ कुल को कलंक लगाने वाली , देश और जाति को लज्जित करने वाली संतान ही उत्पन्न होगी ।
(http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1943/April/v2.11)
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➡️2️⃣ दर्शन क्या है?
❛❛....दर्शनशास्त्र का अर्थ समझने के लिए संस्कृत भाषा में एक प्रसिद्ध सुक्ति है - दृश्यते अनेन इति दर्शनम् अर्थात् जिससे देखा जाए , वह ' दर्शन ' कहलाता है । सामान्यतः यह देखना दो प्रकार का होता है । एक स्थूल आँखों से देखना तथा दूसरा सूक्ष्म आँखों से देखना स्थूल आँखों से हम भौतिक स्थूल पदार्थों को ही देख सकते हैं । इसमें हमारा देखने का दृष्टिकोण भौतिकवादी या व्यावहारिक होता है । इसमें मात्र विचार , तर्क - वितर्क तथा वाद - विवाद ही होता है तो जब हम किन्हीं पदार्थों को स्थूल आँखों से देखकर उन पर केवल विचार - विमर्श ही करते हैं , तर्क - वितर्क व वाद - विवाद करके किसी निष्कर्ष पर पहुंचते हैं तो इसे भी ' दर्शनशास्त्र ' कहते हैं या तर्क - वितर्क एवं वाद - विवाद की मदद से वस्तुओं को देखना ' दर्शनशास्त्र ' है । मात्र वाद - विवाद करना , बौद्धिक चिंतन करना तथा अपनी तार्किक शक्ति का चमत्कार दिखाना भी ' दर्शनशास्त्र ' कहलाता है विषय चाहे भौतिक हो या अदृश्य । इसीलिए आत्मा , परमात्मा तथा चेतना पर विचार करने वाले को भी ' दार्शनिक ' कहा जाता है तो प्रथम प्रकार का यह देखना या ' दर्शन ' केवल बौद्धिक विलासमात्र है या विचारों का खेल है ।••••❜❜
पश्चिम में थैलिज आदि तथा सुकरात , प्लेटो व अरस्तू से लेकर आधुनिक काल के दार्शनिक बेकन , देकार्ते , स्पिनोजा , लाईबनित्स , लॉक , बर्कले , ह्यूम , हेगल , कांट, आदि तथा समकालीन मार्क्स सबके सब जितने भी दार्शनिक हैं उन सबने बौद्धिक तर्क - वितर्क ही किया है । अपने विचारों को व्यवहार में प्रयोगात्मक रूप इन्होंने कभी नहीं दिया । मार्क्स ने इस संबंध में थोड़ी कोशिश की थी लेकिन वे बुरी तरह असफल रहे । भारत में भी इसी तरह के अनेक शुष्क तर्क - वितर्क करने वाले दार्शनिक हुए हैं जिन्हें ओशो रजनीश एवं जिद्दू कृष्णमूर्ति ने तोतों की संज्ञा दी है । ये तोते केवल अपनी स्मृति के बल पर सूचनाओं का संग्रह करते हैं तथा इन सूचनाओं को इधर - उधर सरकाकर ये अपने आपको दार्शनिक एवं तार्किक कहलवाना पसंद करते हैं । '
❛❛ दूसरे प्रकार का देखना सूक्ष्म आँखों से देखना है । इसमें हमारी दृष्टि भीतर की तरफ होती है । हम अपने स्वयं को देखते हैं । इसमें तो विचार , तर्क - वितर्क एवं वाद - विवाद होता ही नहीं । धीरे - धीरे निर्विचारता आने लगती है । जब चित्त के पर्दे पर कोई भी विचारों का बादल नहीं रहता तो हम स्वयं को देखते हैं स्वयं का साक्षात्कार करते हैं । इस तरह स्वयं का साक्षात्कार करने वाले ज्ञानी , योगपुरुष एवं समाधिस्थ पुरुष भी ' दार्शनिक ' कहलाते हैं । (यही भारतीय दर्शन कि दृष्टि कह सकते हैं।) ❜❜
व्यभिचारी ओशो रजनीश ने तो ऐसे पुरुषों को ही ' दार्शनिक' माना है तथा स्थूल आँखों से देखने वालों को मात्र पंडित , तोते व मशीन कहा है । किसी भी विषय के गहन अध्ययन को भी ' दर्शनशास्त्र ' माना जाता है । विश्व की समस्त अनुभूतियों की बौद्धिक व्याख्या तथा उनके मूल्यांकन के प्रयास को भी ' दर्शनशास्त्र ' कहा जाता है ।
❛❛ पाश्चात्य विद्वान् इसे ' फिलॉसफी ' कहते हैं ।
लेकिन सही अर्थों में दर्शनशास्त्र का पर्यायवाची
' फिलॉसफी ' नहीं हो सकता । ❜❜
पश्चिमी के विचारक ' दर्शनशास्त्र ' का समानार्थी शब्द आज तक खोज ही नहीं पाए हैं । पश्चिम में ' फिलॉसफी ' का अर्थ ज्ञान का संग्रह , ज्ञान से प्रेम तथा सूचनाओं का संग्रह माना जाता है जबकि भारतीय मतानुसार ' दर्शनशास्त्र ' हमें संसार का ज्ञान करवाकर अपने स्वयं से मिलाता है- इससे हम अपने स्वयं को जानते हैं - आत्मा का परमात्मा से मिलन होता है- हमें तत्त्वज्ञान होता है हम सृष्टि के सब रहस्यों को जान लेते हैं । अत : ' दर्शनशास्त्र ' के संबंध में पश्चिम की अपेक्षा भारतीय मत ज्यादा विस्तृत , उपयुक्त , तर्कयुक्त एवं वैज्ञानिक है ।
पश्चिमी विद्वानों का जोर केवल बाहरी पक्ष पर है जबकि भारतीय विद्वानों का जोर बाहरी व भीतरी दोनों पक्षों पर है । भारतीय पक्ष अधिक संतोषप्रद है । युक्तिपूर्वक तत्वज्ञान प्राप्त करने के प्रयत्न को भी ' दर्शनशास्त्र ' माना जाता है । इस तरह ' दर्शनशास्त्र ' समस्त विश्व को समझाने एवं उसकी व्याख्या करने का प्रयत्न है । संसार के कुछ मुश्किल प्रश्न हैं जिनके समाधान की कोशिश मनुष्य शुरू से करता आया है , जैसे मनुष्य क्या है ? आत्मा क्या है ? विश्व क्या है ? इसकी उत्पत्ति क्यों हुई व कैसे हुई ? विश्व का प्रयोजन क्या है ? ईश्वर क्या है ? ईश्वर है या नहीं ? सत्य क्या है व इसकी प्राप्ति कैसे होती है ? शुभ व अशुभ क्या है ? उचित व अनुचित क्या है ? समाधि क्या है ? पुनर्जन्म क्या है ? आत्मा परमात्मा मिलन क्या है ? भाग्य क्या है ? कर्मफल क्या है ? कर्मों का फल मिलता है या नहीं ? आदि आदि सब प्रश्नों का उत्तर ' दर्शनशास्त्र ' में देने का प्रयास किया जाता है । भारतीय दार्शनिक ' दर्शनशास्त्र ' के संबंध में यह भी कहते हैं कि यह वह विद्या है जिसकी मदद से सत्य को जाना जा सके । सत्य का साक्षात्कार हो जाने पर व्यक्ति वास्तविक व मिथ्या का अंतर करने में समर्थ हो जाता है । दर्शन हमें ' सम्यक् दृष्टि ' प्रदान करता है । विषयों का वास्तविक ज्ञान हमें इसी शास्त्र से होता है । सत्यज्ञान होते ही व्यक्ति के सारे बंधन समाप्त हो जाते हैं व वह मुक्त हो जाता है । इसीलिए भारतीय तत्त्वज्ञानियों के मतानुसार ' दर्शनशास्त्र ' का उद्देश्य बंधन काटकर व्यक्ति को मोक्ष दिलाना है । भारतीय दर्शन को मोक्ष - दर्शन भी इसीलिए कहा गया है । इस तरह से ' दर्शनशास्त्र ' बाहरी व भीतरी दोनों पक्षों को समृद्धि प्रदान करता है । सांसारिक जीवन की समृद्धि के साथ आंतरिक जीवन को भी समृद्धि एवं वैभव प्रदान करना ' दर्शनशास्त्र ' का कार्य है ।
❛ भारत में षड् - दर्शन की परंपरा महाभारत के युद्ध से भी पहले की है । वैशेषिक , मीमांसा , न्यास , योग , सांख्य एवं वेदान्त आदि छह दर्शन भारत में हैं । ❜
इन छह दर्शनों में सृष्टि के छह कारणों की व्याख्या को समझाया गया है । न्याय में परमाणु , वैशेषिक में काल , सांख्य में प्रकृति , योग में पुरुषार्थ , मीमांसा में कर्म तथा वेदांत में ब्रह्म से सृष्टि की व्याख्या की गई है । कोई ऐसा विषय नहीं है जो षड् - दर्शन में न हो । एक बात और हैं- छहों दर्शन सूत्ररूप में लिखे गए हैं । जिस सूत्रशैली या बात को छोटे रूप में कहने के ढंग को आज के विज्ञान में मान्यता मिली है तथा कंप्यूटर भी इसी सूत्रशैली पर कार्य करते हैं उसी शैली को भारतीय ऋषियों , दार्शनिकों एवं विचारकों ने लाखों वर्ष पहले ही खोज लिया था ।
' दर्शनशास्त्र ' के ग्रंथों में सूत्रशैली को अपनाया गया है । पाश्चात्य दर्शन के जनक व स्त्रोत सुकरात , प्लेटो तथा अरस्तू भी इस शैली से अनभिज्ञ थे । भारतीय दर्शन एवं संस्कृत व्याकरण भारत में सूत्र रूप में लिखे जाते रहे हैं । आज भी संस्कृत भाषा को कंप्यूटर हेतु सबसे उपयुक्त माना जाता है । वैज्ञानिकों ने कहा है कि आने वाले 20-25 वर्षों में शायद संस्कृति के माध्यम से ही दुनिया की सभी भाषाओं का सहज अध्ययन उपलब्ध हो सकेगा ।
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आशा है कि, दर्शन क्या है व कौन दार्शनिक हैं? इस प्रश्न का उत्तर इस विश्लेषण से कुछ स्पष्ट हुआ हो एवं ओशो जैसे पाखंडी अधर्मी लोग कैसे अपने पंथ से व्युत्पन्न बकवाद को कर चले गये व आज कुछ उनके चेले उस बकवाद को तार्किक मानकर दर्शन का नाम देते है। फिलोसोफी क्या है व दर्शन क्या है ये अवश्य समझे। बच्चो को अश्लीलता अर्धनग्नता शराब नशे आदि मे झोकने वाले चाइल्ड संबंधी क्रिमिनल ओशो का कथित दार्शनिक होना बहोत ही हास्यास्पद जोक है। ऐसे लोगो से सावधान रहे।
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# संदर्भ :
[2] Osho Ashram: खुले-आम सेक्स, नशा और आजादी! ओशो के आश्रम में 10 साल के बच्चे का अनुभव https://www.aajtak.in/lifestyle/news/photo/osho-death-anniversary-netflix-cult-shree-rajneesh-commune-childhood-story-tlif-1194551-2021-01-19-1
[1]https://www.amarujala.com/spirituality/wellness/osho-vani-on-dharm-hindi-rj
[3]https://www.bbc.com/hindi/science/2014/03/140305_passive_smoking_sk.amp
[4]https://books.google.co.in/books?id=3saoEAAAQBAJ&pg=PA55&dq=%E0%A4%AC%E0%A5%81%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7+%E0%A4%AA%E0%A4%82%E0%A4%9A%E0%A4%B6%E0%A5%80%E0%A4%B2&hl=en&newbks=1&newbks_redir=0&source=gb_mobile_search&ovdme=1&sa=X&ved=2ahUKEwjmu53MqoyBAxU9S2wGHcojC5gQ6AF6BAgOEAM#v=onepage&q=%E0%A4%AC%E0%A5%81%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%20%E0%A4%AA%E0%A4%82%E0%A4%9A%E0%A4%B6%E0%A5%80%E0%A4%B2&f=false
[5]
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