नाम का क्या महत्व है ?
#नाम_का_क्या_महत्त्व_है.... ....
वैष्णव मत में नाम की बड़ी महिमा बताई गई है , और गोस्वामी तुलसीदासजी ने तो नाम को ही सब कुछ कह दिया है । धर्म शास्त्र में तो यहाँ तक आज्ञा दी है कि यदि किसी कन्या का नाम बुरा हो , तो उसके साथ कमी विवाह मत करो । इस का आशय यह भी है कि कोई मनुष्य अपने बच्चों का नाम बुरा न रक्खे ।
(१) सम्राट नेपोलियन एक बार अपने पक्ष की अतुल सेना देखकर साहस हीन हो गया था , पर ज्योही उसको अपने नाम का ध्यान आया तो उसके हृदय में , वीर रस की तरंगे उठने लगी । और थोड़ी सी सेना से ही शव को परास्त कर दिया ।
(२) चित्तौड़गढ़ के महाराना केवल #सूर्यवंश के नाम पर ही जान को हथेली पर धरे रहते थे ।
(३) गुरुगोविन्दसिंहजी इस नाम के महत्व को भली प्रकार जानते थे , उन्होंने जहाँ सिक्खों में जीवन दान देने के अनेक उपाय किये उनमें सब से प्रथम नाम को जानकर ही , सिक्खों का नाम सिंह रख दिया था ।
(४) आप के सामने दो मनुष्य समान आयु और बल वाले खड़े हैं , आप को पूछने पर जब यह ज्ञात होगा कि इन में से एक मनुष्य राजपुत्र है , तो उसके प्रति आपके हृदय में और ही कुछ भाव उत्पन्न हो जायेंगे । इसका कारण यह है कि नाम के साथ ही झट से उसके गुण भी याद आ जाते हैं ।
(५) यदि मनुष्य किसी भले पदार्थ का नाम ही जानता होता यह होगा कि एक दिन उसके गुणों के जानने का भी विचार - उसके हृदय में अवश्य उठेगा । बच्चों को प्रकृति इसी नियम के अनुसार शिक्षा देती है ।
उसी तरह क्षत्रिय कहते बराबर क्षात्र धर्म की अभिव्यक्ति हो जाती है, अपना धर्म स्मरण करने के लिए सच में इसलिए हमारे पुर्वजों ने नाम भी ऐसे ही रहे जिनसे उनके उस प्रवृत्ति की झलक हो उठे। वेदों मे क्षत्रियों के लिए राजन्य और क्षत्र शब्दों का प्रयोग किया गया है।
(६) वैसे जिस "भोज" शब्द को विरूद रूप में लगाने से विद्वान स्वयं को श्रेष्ठ प्रदर्शीत करते थे उसी 'भोज ' शब्द की निति मिहिरभोज की ग्वालियर - प्रशस्ति में प्राप्त होती है :-----
""#आक्रन्य_भूभृतां_भोक्ता_यः #प्रभुर्भौज_इत्यभात् ।""
भुभृतों ( राजाओं अथवा पर्वतों ) पर आक्रमण कर जिनने उनके राज्य तथा उनकी सेवा का उपभोग किया वह प्रभु या स्वामी '#भोज' कहलाया । शृंगारमंजरीकथा में धारेश्वर महाराज भोज ने स्वयं के व्यक्तित्व का विशेष परिचय दिया है । उस अलंकृत विवृति में महाराज भोज की कई विशेषताओं की यथार्यता अन्य स्रोतों ने भी पुष्ट होती है । इस तरह सम्राट भोज का नाम भी बड़ा ही अर्थपुर्ण हैं।
(७) मनोवैज्ञानिकों के अनुसार हर नाम का एक अर्थ है। उसके अर्थ की अभिव्यक्ति के साथ ही सुक्ष्म रूप से उसका अपना प्रभाव है, वह गुण वाचक भी होता है। नाम और गुण का परस्पर अभेद भेद हैं। हमारे पुर्वज नाम रखने में थोडे जागरूक थे। आप देखेंगे कि क्षत्रिय राजवंशों की वंशावली, क्षत्रिय समाज की क्रोनोलाजी में नाम कुछ और तो निम्न, अन्य प्रांतों तथा समाजों और जातियों में देश काल के अनुसार भिन्न-भिन्न नाम पाए जाते हैं। आजकल पश्चिमी देशों के प्रभाववश जो नाम रखे जा रहे हैं सर्वथा अनुचित है।
(८) हिन्दू शिशुओं में 'विक्रम' नामकरण के बढ़ते प्रचलन का श्रेय आंशिक रूप से हमारे आदर्श, चक्रवर्ती प्रमारकुलावतंस महाराज #विक्रमादित्य की लोकप्रियता और उनके जीवन के बारे में लोकप्रिय लोक कथाओं एवम् गाथाओं की दो श्रृंखलाओं को दिया जा सकता है।
(९) "विक्रमादित्य" नाम, 'विक्रम' और 'आदित्य' के समास से बना है जिसका अर्थ 'पराक्रम का सूर्य' या 'सूर्य के समान पराक्रमी' है। उन्हें विक्रम या विक्रमार्क (विक्रम + अर्क) भी कहा जाता है (संस्कृत में अर्क का अर्थ सूर्य है)।
(१०) उसी तरह विक्रमादित्य महाराज के दरबारी उज्जयिनी के राजकवि महाकवि कालिदास का असली नाम राजतरंगिणी में मातृगुप्त कहा गया है लेकिन #कालिदास शब्द का शाब्दिक अर्थ है - "काली का सेवक"। मां कालिका के अनन्य भक्त होने के बाद उन्हें इस गुणवाचक नाम से ही जाना जाता है।
जैसे कि हमने पहले कहा यदि मनुष्य किसी भले पदार्थ का नाम ही जानता होता यह होगा कि एक दिन उसके गुणों के जानने का भी विचार - उसके हृदय में अवश्य उठेगा । बच्चों को प्रकृति इसी नियम के अनुसार शिक्षा देती है ।
इसलिए हमने क्षत्रिय समाज के अनुकूल ही नामकरण करने चाहिए जिससे हमें हमारे गौरव का स्मरण रहे। क्योंकि भलेही नाम में कुछ भी नहीं रखा किंतु उसका महत्व अवश्य ही है। आज के नामकरण के पध्दति से ही पता लगाया जा सकता है कि हम हमारे पुर्वजों की अपेक्षा कितने जाग्रत है।
सम्राट भोज प्रथम का प्रभाव ऐसा था कि उनके उपर कहा जाता उनके शत्रुओं को के लिए "अरे विरोधी शत्रुवर्ग तुम विनय से श्री भोजदेव की शरण ग्रहण करों ।अन्यथा तुम्हें अवश्य ही वन की शरण लेनी पड़ेगी।" इसपर इतिहासकार दशरथ शर्मा लिखते हैं कि ऐसी ही किर्तिमान से उनके शत्रु उनसे ईर्ष्या करते थे।
शाङ्गधरपध्दति श्लो. क्र. 1252 में कहा गया है, हे विरोधी शत्रुवर्ग तुम विनय से श्री भोजदेव की शरण ग्रहण करों ।अन्यथा तुम्हें अवश्य ही वन की शरण लेनी पड़ेगी।
#जय_राजा_भोज 🚩 🚩 🚩 🚩 🚩
#जय_मां_गढकालिका 🙏🙏🙏🙏🙏🙏

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