एक अमर बलिदानी वीरांगणा राणी सारंधा

#भारत_की_एक_अमर_बलिदानी "#वीरांगणा_राणी_सारंधा"......... 

बुंदेलखंड के महाराज रुद्रप्रताप के वंशज ओरछा नरेश चंपतराय जब से गद्दी पर आसीन हुए अपने बाहुबल से राज्य का विस्तार करते जा रहे थे । उन्होंने मुगल बादशाह शाहजहाँ को कर देना बंद कर दिया था । मुगल सेनाएं आक्रमण करती पर उन्हें मुंह की खाकर वापस लौटना पड़ता । नरेश चंपतराय को वीर गाथाएं बंदेलखंड के बच्चे - बच्चे की जवान पर छायी हुई थीं । उनका विवाह भी टेकड़ी के राजा अनिरुद्ध सिंह की बहन वीरव्रती सारंधा से हुआ था । सारंधा नरेश को वीरता से ही उनकी ओर आकर्षित हुई थी । चंपतराय भी ऐसी वीर हृदया पत्नी पाकर बड़े प्रसन्न हए थे ।

उतार - चढ़ाव हर व्यक्ति के जीवन में आते हैं । चंपतराय के जीवन में भी कुछ ऐसी परिस्थितियां आ गईं कि उन्हें मुगल बादशाह का समर्थक एवं आश्रित बनने का मन बनाना पड़ा । शाहजहाँ तो ऐसे अवसर की ताक में ही था । उसने चंपतराय का दिल्ले में भव्य स्वागत किया ।

उस समय कुम्हारगढ़ को जागीर स्वतंत्र थी पर शाहजहाँ उसे अपने राज्य में मिलाना चाहता था । उसने इस कार्य हेतु चंपतराय को भेजा । साहसी चंपतराय ने इस कार्य को बड़ी बहादुरी के साथ संपन किया । फिर क्या था ? वे थोड़े ही समय में शाहजहाँ तथा उनके ज्येष्ठ पुत्र दारा शिकोह के कृपापात्र बन गए । दारा ने उन्हें नौ लाख रुपये वार्षिक को जागीर पुरस्कार में प्रदान की । वैभव - विलास के जीवन ने नरेश चंपतराय को पतनोन्मुख कर दिया ।

धन की मादकता में वे स्वाभिमान को छोड़ बैठे । स्वाधीनता के स्थान पर पराधीनता के जीवन में उन्हें आनंद आने लगा , पर सारंधा को यह सुविधाएं मानों काटने को दौड़ रही थीं । उसका सौंदर्य मंडित मुख उदास रहने लगा । एक दिन चंपतराय ने पूछ ही लिया -

"' प्रिये ! जब से तुम दिल्ली में आई हो तब से प्रसन्न नहीं दिखाई देती । तुम्हारे मुख मंडल की आभा न ' जाने कहाँ लुप्त होती जा रही है । जब मैं रात - दिन युद्ध में व्यस्त रहता था उस समय तुम सुखी और संतुष्ट दिखाई देती थी और अब सुख - चैन का समय आया तब तुम्हारा चेहरा कुम्हलाया दिखाई देता है । इसका क्या कारण है ? "'

#सारंधा दुःखी मन से बोली-

" उस समय मैं स्वतंत्र थी और अब परतंत्र हूँ । मैं ईश्वर को छोड़कर और किसी की भी दासता स्वीकार करने को तैयार नहीं हूँ । एक दिन में स्वाभिमानी राजा की रानी थी और आज एक मुगल बादशाह के सेवक की पत्नी हूँ । मन में बार - बार यही आता है कि स्वाभिमान से परिपूर्ण जीवन कभी लौटेगा या नहीं ? मुझे स्वतंत्रता प्यारी है । मैं सर्वस्व समर्पित करके भी उसे प्राप्त करने की इच्छा रखती हूँ । आज मैं गुलामी की रोटियाँ खा रही हूँ । गुलामी के जीवन की सुविधाओं से स्वतंत्रता का अभावग्रस्त जीवन कहीं अच्छा है । पर न जाने क्यों यह बातें आपके गले नहीं उतरती । आपको मातृभूमि की याद नहीं सताती । आप भले ही सुख की नींद सोयें पर सारंधा का हृदय बुंदेले बच्चों के करुण क्रंदन से फटा जा रहा है ।"

#सारंधा की दर्द भरी वाणी चंपतराय को बेचैन करने लगी । मातृभूमि के उद्धार के लिए उनका मन तड़पने लगा । दारा शिकोह भी उनसे असंतुष्ट हो गया और अपनी जागीर वापस ले ली । चंपतराय अपने अपमान को न सह सके । वह ओरछा वापस लौट आए और बिखरी हुई शक्ति को संगठित करने लगे ।

शाहजहाँ पुत्र औरंगजेब जब शासक बना तब वह चंपतराय और रानी सारंधा को अपने मार्ग का कांटा समझकर इनके विरुद्ध षडयंत्र रचने लगा । उसने विशाल सेना बुंदेलखंड में भेजी । घमासान युद्ध हुआ । सारंधा स्वयं सैन्य वेशभूषा में हाथ में नंगी तलवार ले दुर्गा की तरह मुसलमान शत्रुओं को गाजर -मूली की तरह काटने
लगी ।

समरांगण में भगदड़ मच गई । सीमित साधन होते हुए भी दोनों के पराक्रम ने चंपतराय को विजयी बना दिया । औरंगजेब भला अपनी पराजय को कैसे सहन करता ।

दूसरी बार उससे भी अधिक शक्तिशाली सेना बुंदेलों को हराने के लिए भेजो । चंपतराय को अपनी जीवन रक्षा के लिए भूखे - प्यासे जंगलों में भटकना पड़ा । विपत्रवस्था में जब चंपतराय निराश हो जाते उस समय सारंधा ही शक्ति का संचार कर उन्हें आशा बंधाती और उज्ज्वल भविष्य के सुहावने सपने सामने रखकर संघर्ष को जारी रखने की प्रेरणा देती ।

आपत्ति की इन घड़ियों में उन्होंने सोचा कि सहरा के जमींदार इंद्रमणि के यहाँ आश्रय लिया जाये और वहाँ भूमिगत होकर सेना का पुनः संगठन करके सुरक्षा पंक्ति को सुदृढ़ किया जाये । वहाँ दोनों को सम्मानपूर्वक आश्रय तो मिलगया पर मुगल शासन से यह बात छिपी न रह सकी । शीघ्र ही दुर्ग पर घेरा डाल दिया गया । युद्ध प्रारंभ हो गया । आश्रयदाता इद्रमणि बेमौत मारा गया । दुर्ग में हाहाकार मच गया । वहाँ केवल स्त्रियाँ और बच्चे ही शेष रह गए थे । रसद के न आने से सबके बुरे हाल थे । ऐसे में चंपतराय का भी स्वास्थ्य खराब हो गया । उठने बैठने की भी शक्ति उनमें न रही । ऐसी अवस्था में सारंधा ने अपने पति को यही सलाह दी-

" हम लोगों की वजह से ही दुर्ग में रहने वाले निरपराध मनुष्यों की दुर्दशा हो रही है । मुझसे तो इनके दुःख अब देखे नहीं जाते । यदि हम लोग इस स्थान को छोड़ दें तो सेना का घेरा उठा लिया जाएगा और ये लोग मरने से बच जाएंगे । "

चंपतराय को सारंधा का सुझाव बहुत पसंद आया । सारंधा अपने पति को पालकी में बिठाकर कुछ सैनिकों के साथ दुर्ग से बाहर निकल गई । उस समय युद्ध चल रहा था , अत : किसी का ध्यान इस ओर न गया । ऐसी विपत्ति के समय चंपतराय ने अपने बहनोई से सहायता मांगी पर उन्होंने मना कर दिया ।

“ विपत्ति काल में अपने भी पराये हो जाते हैं " - वाली कहावत उन्हें सही होती दिखाई दी । दुर्ग से बच निकलने की बात मुस्लिम सेना से छिपी न रह सकी । उसने पीछा किया और कुछ मोल जाकर पुनः घेर लिया ।

सारंधा के साथी सैनिकों ने यह अच्छी तरह जान लिया कि अब अंतिम अवसर है । अतः पूरी शक्ति से शत्रु सेना
 का सामना किया गया । मुट्ठी भर सैनिक कब तक लोहा लेते । अस्वस्थ होते - होते हुए भी चंपतराय अपने को रोके न रह सके । वह भी बीमार शेर की तरह प्रतिशोध की भावना से भरकर पालकी से बाहर निकले । पर कमजोरी के कारण उनके हाथ से तलवार जमीन पर गिर पड़ी और वह मूर्छित होकर गिर गए । सारंधा ने दौड़कर उनका सिर अपनी गोद में रख लिया । अब चंपतराय रानी से उन पर तलवार चलाने को कहने लगे जिससे वे बंदी होने के अपमान से बच सकें ।

सारंधा चीख पड़ी । उसे अपने कानों पर विश्वास न हो रहा था । वह अपने हो हाथों से यह अनर्थ कैसे करेगी ? जिस हृदय के लिए वह अपना सर्वस्व समर्पित करने को तैयार रहती थी उसी पर तलवार का वार वह कर सकेगी , यह कैसे संभव है ?

अंतिम बुंदेला लड़ते - लड़ते जमीन पर गिर पड़ा । मुगल सैनिक चंपतराय को पकड़ने के लिए लपके । नरेश ने अपनी रानी सारंधा की ओर आशा भरे सजल नेत्रों से देखा । मानों वह कह रहे हों इस जीवन पर तुम्हें गर्व था ?
आन की रक्षा के लिए तुम मुझे समय - समय पर उत्साहित करती रहती थीं और जब परीक्षा की घड़ी आई तब तुम्ही विचलित होना चाहती हो । देख लिया तुम्हें । साहस करो । '

 बढ़ते हुए मुगल सैनिकों ने जैसे ही चंपतराय को पकड़ने का प्रयास किया कि बिजली की तरह लपक कर सारंधा ने अपनी तलवार अपने प्रियतम के उस हृदय में भोंक दी जिससे उसे अविरल प्रेम प्राप्त होता था , आलिंगन को सुखानुभूति उसे आत्म विभोर कर देती थी । आज उसी हृदय से रक्त की धारा प्रवाहित हो रही थी । चंपतराय सदैव के लिए सो गए सेनापति इस मर्मातक दृश्य को देखकर स्तब्ध रह गया ।

उसने आगे कहा

" रानी साहिबा ! खुदा गवाह है । आखरी समय आपका जो हुक्म हो उसे बजाने के लिए तैयार हूँ । "

" यदि हमारे पुत्रों में से कोई भी जीवित हो तो हमारी दोनों लाशें उन्हें सौंप देना । बस यही सबसे बड़ी मेहरबानी होगी । " सारंधा ने इतना कहकर उसी तलवार की नोंक अपने हृदय में भोंक ली और अपने पति से जा मिली ।

इस प्रकार अपने प्राणों का बलिदान दिया इन वीर विरांगणाओं ने और भारत स्वाभिमान की रक्षा की... इसलिए आर्य संस्कृति आज तक यथावत् है..... #वामपंथीयों के षड्यंत्र को पहचानकर राणी सारंधा के इतिहास के अमर गाथा को अवश्य पढाया जाना चाहिए ताकि स्वाभिमान और अमर बलिदान की प्रेरणा से आर्यावर्त के धर्म और संस्कृति के रक्षकों को हम जान पाए🚩⚔️

⚔️🚩जय मां भारती
📚 भारत की महान वीरांगनाएं (awgp literature)

⚔️🚩विचार प्रसार🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥
✍️जय मां भारती ⚔️🚩⚔️🚩⚔️🚩⚔️🚩⚔️🚩

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