महाभारत कालिन प्राकृतिक विज्ञान
महाभारत काल में ज्योतिष , वृक्ष विद्या , गर्भविद्या आदि विज्ञान पर्याप्त व्यापक रूप से पढ़े जाते थे , महाभारत में इस के लिये पर्याप्त प्रमाण उपलब्ध होते हैं । इस लेख में महाभारत कालिन प्राकृतिक विज्ञान के कतिपय निदर्शनों को उद्धृत किया जायेगा ।
*️⃣ ज्योतिष -
नक्षत्र विद्या भारतवर्ष की अत्यन्त प्राचीन सम्पत्ति है । वेदों में ग्रहों और नक्षत्रों के सम्बन्ध में अनेक सूक्त हैं । ज्योतिष सम्बन्धी बहुत सी बातें भारतवासियों के नैत्यिक अनुष्ठानों का अङ्ग बन गई थीं । महाभारत के समय भी साधारण प्रजा तक नक्षत्र विज्ञान की बहुत सी बातों से साधारणतया परिचित थी ।
आदिपर्व में द्रौपदी को द्रुपद उपदेश देता है कि “ जो सम्बन्ध रोहिणी नक्षत्र का सोम से , भद्रा का श्रवण से और अरुन्धती नक्षत्र का वसिष्ठ से है तू वही घनिष्ट सम्बन्ध अपने पति युधिष्ठिर से जोड़े रहना... "
*️⃣ #महायुद्ध के समय घोर नक्षत्रों का वर्णन इस प्रकार किया गया है..
"सूर्य का राहु से ग्रस्त होना , श्वेतग्रह का चित्रा को अतिक्रमण करना , धूम केतु का पुष्य नक्षत्र में उदय होना , अङ्गारक की महानक्षत्रों में वक्रगति , श्रवण नक्षत्र में बृहस्पति का भग नक्षत्र को अतिक्रमण करके राहु का ग्रास बनना , शुक्र का पूर्व प्रोष्टपदा नक्षत्र में उदय होना , श्वेत ग्रह का धूम सहित अग्नि के समान चमकना , इन्द्र नक्षत्र का ज्येष्ठा में आना , ध्रुव का खूब प्रज्वलित होकर बाई ओर को हट जाना | चित्रा और स्वाति में क्रूर ग्रह का होना , वक्र और अनुवक्र चाल से अग्नि रूप में होकर श्रवण नक्षत्रका ब्रह्मराशि नक्षत्र मण्डल में लाल रूप धारण करना , बड़े सप्तर्षियों का प्रकाश नष्ट हो जाना , बृहस्पति और शनि का विशाखा नक्षत्र के पास आकर वर्ष भर तक उदय रहना , चतुर्दशी पञ्चदशी और भूतपूर्वा शोडषी इन तिथियों में भी सूर्य और चन्द्र दोनों का ग्रहण होना , और उल्कापात ये सब चिन्ह जनता के भयंकर विनाश और भारी विपत्ति के सूचक हैं । "
इसका अभिप्राय यह है कि तत्कालीन भारतवासी इन उपर्युक्त ग्रहों की गति , स्थिति और अवस्था का ज्ञान खूब गहराई तक रखते थे ।
*️⃣ चिकित्सा - उस समय चिकित्सा दो प्रकार से की जाती थी - मन की प्रबल इच्छा शक्ति के आधार पर - जिसे आज कल मैस्मरिक होलिङ्ग कहते है और दृतिय थी औषधि विज्ञान अर्थात् आयुर्वेद शास्त्र प्राकृतिक अथवा आयुष्यविज्ञान ।
कर्ण पर्व में युधिष्ठिर के सम्बन्ध में लिखा है कि
" वह औषधि और मन्त्र चिकित्सा के प्रभाव से शीघ्र ही स्वस्थ होकर कर्ण और अर्जुन का युद्ध देखने के के लिये चला गया । "
उस समय घावों को भरने के लिये ' #विशल्यं_करणी ' नाम की एक औषधि प्रयुक्त की जाती थी । गहरे से गहरे घावों को भरने में भी यह औषधि आश्चर्य कारी प्रभाव दिखाती थी । युद्ध के समय इस औषधि का खूब प्रयोग किया जाता था । भीष्म पर्व में लिखा है-
"विशल्यंकरणी" औषधि का उपचार करने से दुर्योधन के घाव बहुत शीघ्र अच्छे हो गए ।
*️⃣ गर्भ विज्ञान-
स्त्री पर्व में विदुर ने महाराज धृतराष्ट्र से कहा है :
" जन्म होने के बाद से ही प्रणियों की सब क्रियाएं दृष्टिगोचर होनी प्रारम्भ होती है । पांच मास बीत जाने पर उस में कुछ चेतनता आने लगती है । इस समय वह सर्वाङ्ग सम्पूर्ण हो जाता है , वह चारों ओर से मांस और रक्त से घिरा रहता है । अन्त में वात के वेग से सिर नीचे और पैर ऊपर किये हुए योनिद्वार में आकर अत्यन्त कष्ट अनुभव करता है । "
*️⃣अश्व चिकित्सा :
उस समय अश्चिकित्सा के उत्तम उत्तम साधनों का अविश्कार हो चुका था । माद्री के बड़े पुत्र नकुल को अश्वविद्या का एक विशेषज्ञ समझा जाता था ।
विराट पर्व में नकुल ने स्वयं कहा है " मैं अश्वशिक्षा और अश्व चिकित्सा में खूब निपुण हूं । "
*️⃣ शरीर ज्ञान-
शान्ति पर्व १८५ अध्याय में शरीर विज्ञान के सम्बन्ध में थोड़ा बहुत निर्देश है । पांच भूतों से बने शरीर को पञ्चवायुएं ही स्थिर रखती हैं ।
प्राण वायु, मूर्धा और शरीर की अग्नि में क्रिया करती है । बुद्धि , अहंकार , विषय और पञ्चभूत ये सब प्राण से ही गतियुक्त होते हैं । अपान समान के साथ ही मनुष्य के मध्य भाग में कार्य करता है ।
मनुष्य के प्रयत्न कर्म और बल में उदान सब से अधिक आवश्यक है । यह शरीर के सब जोड़ों में रहता है , इत्यादि । प्राचीन वैद्य तथा चिकित्सक इसी शरीर विज्ञान के आधार पर अपनी चिकित्सा करते थे ।
*️⃣ विश्व की उत्पति का सिद्धान्त -
विश्व की उत्पत्ति के सम्बन्ध में शान्ति पर्व में लिखा है-
" उस घायु और जल के पिण्ड में सम्पूर्ण तम को निवारण करने वाला अग्नि उत्पन्न हुआ । तव अशि , वायु और जल मिल कर एक बादल के रूप में हो गया , यही बादल धीरे धीरे कठिन होकर भूमि बन गया ।"
आज कल के वैज्ञानिक भी विश्व की उत्पत्ति के सम्बन्ध में लगभग इस से मिलता जुलता सिद्धान्त ही मानते हैं । वृक्षों में जीव - आर्ष सिद्धान्त के अनुसार संसार के प्रत्येक पदार्थ में एक चेतन शक्ति काम कर रही है ।
वृक्ष और वनस्पतियों में चेतनता है , वे खयं बढ़ती हैं । इस सम्बन्ध में हम शान्ति पर्व में वार्णत भृगु और भारद्वाज के सम्वाद का कुछ अंश उद्धृत करते हैं
" भृगु ने कहा - कछिन वृक्षों में भी निस्सन्देह भाकाश होता है , उन में कभी नए फूल निकलते हैं , कभी नये पत्ते । गर्मी से पत्ता मुरझा जाता है , फल फूल भी कुम्हला जाते हैं , इस से वृक्षों में स्पर्श की शक्ति सिद्ध होती है ।"
"वायु , मेघ गर्जन और जिली के गिरने से फल फूल झड़ जाते हैं , इस लिये वृक्ष में सुनने की शक्ति भी माननी चाहिये । लता वृक्ष पर चड़ जाती है , उस के चारों ओर लिपट जाती है , इस लिये उस में देखने की शक्ति भी माननी चाहिये ।"
" अच्छी गन्ध और अनुकूल वायू के प्रभाव से वृक्ष फलते फूलते हैं , रोग रहित हो जाते हैं अतः उन में गन्ध शक्ति भी स्वीकार करनी होगी । वे पैरों से पानी सींचते हैं , रोगी हो जाते हैं , उन के रोग की चिकित्सा भी की जाती है इस लिये उन में रसना शक्ति भी माननी चाहिये ।"
"वृक्ष को वृद्धि के लिये जल वायु दोनों की आवश्यकती होती है । उन्हें दुख सुख भी अनुभव होता है । कटा हुवा वृक्ष फिर उग आता है अतः मेरा विश्वास है कि वृक्ष अचेतन नहीं हैं ।"
तत्कालीम शिल्प के कुछ नसूने पहले अध्यायों में दिखाए जा चुके हैं । महाराज युधिष्ठिर ने अश्वमेध के समय जो प्रदर्शनी की थी वह इसका एक उत्तम उदाहरण है ।
तत्कालीन रंग शालाएं , वेध शालाएं , सज प्रासार और इन्द्रप्रस्थ में मयकी बनाई अद्भुत वस्तुएं भी शिल्प कला का अच्छा उदाहरण हैं । चित्रकारी , धातु का कार्य , गान्धर्व विद्या और धनुर्वेद आदि कलाओं और शिल्पों के प्रमाण तो महाभारत में जगह जगह प्राप्त होते हैं । इन सब उदाहरणों से तत्कालीन भोतिक शिल्प पर्याप्त उन्नत प्रतीत होता है ।
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✍️ जय मां भारती 🙏🙏🙏🙏🙏🙏

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