आर्य गौरव का अलबरूनी को आभास
(१.) आर्य - गौरव का अलबरूनी को आभास - -
बहुत दिन की बात नहीं । नौ सौ वर्ष से कुछ पहले की घटना है । खीवा वासी महम्मद - बिन - अब रिहां - अलबेरूनी अपनी अरबी पुस्तक #अलकिताब - उल - हिन्द में लिखता है - - . . . . . . . "उन ( हिन्दुओं ) के जातीय जीवन की कुछ विशेषताएं जो उन में गहरी निहित है , प्रत्येक ( विदेशी ) के लिए स्पष्ट हैं , . . . . . . . . " हिन्दू विश्वास रखते हैं , उनके देश से बढ़ कर कोई देश नहीं , उन की जाति के समान कोई जाति नहीं , उन के राजाओं के समान कोई राजा नहीं , उनके धर्म के समान कोई धर्म नहीं , उन के ज्ञान के समान कोई ज्ञान नहीं । इति । #अलबेरूनी के काल में आर्यों का जो विश्वास था वह सौ दो सौ वर्ष में नहीं बना था । उसका आधार वह इतिहास था जो सृष्टि के आदि से चला आ रहा था । उस काल के आर्य यद्यपि हीन दशा में आ चुके थे , परन्तु उनका आत्मगौरव का भाव अक्षुण्ण - रूप से स्थिर था । विदेशी मुसलमान अलबेरूनी को यह बात अच्छी नहीं लगी ।
(२.) मुगल सम्राट अकबर का मन्त्री #अब्बुल_फजल हिन्दू चरित्र के विषय में "आईन - ए - अकबरी" में लिखता है :-
- "हिन्दू धार्मिक , मिलनसार , विदेशियों के प्रति नम्र , स्वयं प्रायश्चित्त करने वाले , न्यायप्रिय , संसार - त्याग के भाव से युक्त , व्यवहार - कुशल , कृतज्ञ , सत्य की प्रशंसा करने वाले और अपरिमित कर्तव्य - परायण होते हैं । उनका शुद्ध चरि दुःख के समय सब से अधिक चमकता है । उनके योद्धा रण - भू से भागना जानते ही नहीं । युद्ध में जब वे अपने विजय में सन्देह करते हैं , तो वे घोड़ों से उतर पड़ते हैं , और शूरता से लड़ते हैं। उन्हें रोकना लगभग मुश्किल है।"
(नोट:- कयी भारतीय विश्लेषकों ने विदेशी लुटेरे बाबर के बाद हुए शासकों को विदेशी मूल के होने से राष्ट्र के दायरे में विदेशी दृष्टि के अनुरूप होने के कारण उन्हें विदेशी दृष्टि कोण में गिना है। एक विदेशी और तत्कालीन मुस्लिम शासक भारत के प्रति समान भाषा का प्रयोग करते थे। जबकि एक भारतीय कवि या लेखक भारत के प्रति अपनत्व, अमुलाग्र सामिप्रता को अभिव्यक्त करता मानौ स्वयं भारत ही कह रहा हो।)
(३.) अल - मासूदी और हिन्द - संकृति - - (वि.संवत्
_ ६६० के समीप )
अरबी - लेखक #मासूदी लिखता है - -
" हिन्दु सूरा - पान नहीं करते , और पीने वालों से घृणा करते थे । इस का कारण धार्मिक - बाधा न हो कर सुरा से होने वाला विचार - शक्ति का ह्रास ही समझा जाता था । यदि उस समय के किसी राजा का मद्य - पान करना प्रमाणित हो जाता था , तो उस राज्य से परे होना पड़ता था । उस समय के भारतीयों का मत था कि राजा की बुद्धि पर सूरा का प्रभाव होने से उस की शासन - शक्ति का लोप हो जाता है । इति ।"
"कहाँ वे दिन और कहाँ आज का भारत । ''
(४.) महमूद द्वारा पश्चिमोत्तर भारत में संस्कृति नाश - -
इस्लाम की शक्ति सिन्धु - देश में पहुंच चुकी थी । संवा ७७० तक लगभग ३०० वर्ष यह सिन्धु और मुलतान तक ही सीमित रही । पंजाब और सौराष्ट्र के शक्तिशाली राजाओं ने इसे प्राग नहीं बढ़ने दिया । पर संवत १०६० के पश्चात् गजनी से महमूद ने पञ्जाब पर आक्रमण प्रारम्भ किए । महमूद के साथ अल्बेरूनी नाम का एक विद्वान् था । उस ने भारत में रह कर संस्कृत - विद्या का अध्ययन किया . और भारतीय संस्कृति के इतिहास पर एक ग्रन्थ लिखा । वह ग्रन्थ बड़ा उपादेय है । ( १६६ ) महमूद ने पञ्जाब को मट्टी में मिला दिया । उस के अाक्रमणों के विषय में अल्बेरूनी लिखता है - - महमूद ने भारत के ऐश्वर्य को सर्वथा नष्ट कर दिया , और वहाँ ऐसे अद्भ त पराक्रम दिखाए कि हिन्दू मृत्तिका के परमाणों की भांति चारों ओर बिखर गए और उन का नाम लोगों के मुख में एक प्राचीन - कथा के समान ही रह गया । . . ."
हिन्दू विद्याएँ हमारे द्वारा विजित देशों से भाग कर काश्मीर , बनारस आदि सुदूर स्थानों में चली गई है , जहाँ हमारा हाथ नहीं पहुँच सकता । इति । इस वर्णन से ज्ञात होता है कि महमूद ने संस्कृति का घोर नाश किया ।
भागते हुए ब्राह्मण अपने साथ प्राचीन ग्रन्थ नहीं ले जा सके । उन्हें जीवन की पड़ी थी । तब कितने अमल्य ग्रन्थ नष्ट हुए , इस की कौन कहे । पञ्जाब में संस्कृत - विद्या लगभग नष्ट हो गई । प्राचार - व्यवहार समाप्त हो गया । कला के उत्कृष्ट निदर्शन - लप्त हो गए । यही कारण है कि पञ्जाब में प्राचीन मन्दिर नहीं मिलते । पूजा - पाठ का तब लोप हुअा।
पर सोमनाथ के विध्वंस के बाद मध्य और दक्षिण भारत के परमार नामक एक राजा (चक्रवर्ती सम्राट भोज ) की विशाल सेना ने आक्रमण किया जिसमें कई राजपुत मिल गये थे। तुर्की लेखक गरदिजी लिखते हैं कि महमूद किसी तरह सिंध की रास्ते बच निकलने सफल हुआ। ई. लेनपूल के अनुसार एक माह के भीतर इसी युद्ध में भोज ने सल्लार मसुद का शिश काटकर गजनवी के सेना के सेनापति तुरूष्क को भी खदेड़ा और उसके अधिपत्य मे आए किले भी राजपुतों ने जीते। भोज ने थानेश्वर, हांसी नगर, कोटा को इस्लाम मुक्त किया। इस सात माह के बाद फिर पुन्ह गजनवी या किसी मुस्लिम आक्रांताओं ने मध्य भारत पर विशेषतः सन 1055 तक आक्रमण नहीं किया। इस संघर्ष में जाट वीरों का एवं, गोगाजी परमार का नाम अत्यंत उल्लेखनीय है।
👉महाराज भोज का संस्कृति उद्धार -
अलबरूनी ने लिखा है कि , जिस समय ई० स० १०३० ( वि० सं० १०८७ ) में उसने अपनी भारतवर्ष - सम्बन्धी पुस्तक लिखी थी उस समय धार और मालवा साम्राज्य पर भोजदेव राज्य करता था । राजा भोज की बनाई पाठशाला से मिली सरस्वती की मुर्ति के नीचे वि० सं० १८९१ ( ई० स० १०३५ ) लिखा है ।¶
जिस समय ग़ज़नी का महमद उत्तर - पश्चिम भारत पर आक्रमण कर के पंजाब की आर्य - संस्कृति का समूल उच्छेद कर रहा था , उस समय मालवा के परमार - वंश का भोज भारत के पश्चिम में राज्य करता था । भोज न अपनी राजधानी धारा नगरी में बनाई । यहाँ उस ने विभिन्न - विद्याओं के सकल - दिगन्तरोपागत विद्वानों का संघ एकत्र किया । उस ने संस्कृत के पठन - पाठन के लिए शारदा - सदन अथवा भोज - शाला बनवाई । उस शाला के चारों ओर शिलाएँ लगवाई गई । "आएन-ए-अकबरी" के अनुसार चक्रवर्ती भोज के दरबार में 500 से अधिक विद्वान थे। समस्त हिंदुस्तान में उन दिनों उनके विजयों का, दान और ज्ञान का नाम और यश था। भारतवर्ष के सांस्कृतिक इतिहास में पं. भगवत दत्त ने भी लिखा है कि उस समय कविराज भोज विद्वानों के आश्रयदाता और भारतीय संस्कृति के संरक्षक थे।
(५.) #प्लूटार्क का कथन:-
भारतीय संस्कृति का इतिहास अपूर्ण रहेगा , यदि उस काल के पंजाब के देशभक्त #ब्राह्मणों का नाम स्मरण न किया जाए । ये ब्राह्मण देशहित की अग्नि से उत्तप्त हो गए । विदेशी भारत में अत्याचार करे , यह उनसे सहा नहीं गया । वे इस दुःख से बचने के लिए कटिबद्ध हुए । ग्राम ग्राम और नगर - नगर में प्रचार हा कि संगठित हो जाओ । शत्रु का विरोध करो । जिस प्रकार भारत के अभी कल के स्वतन्त्रता - युद्ध ( संवत् १९१४ ) में साधुओं ने देश - भक्ति की ज्वाला जगा कर भारतीय सैनिकों को सहायता पहुंचाई थी , उससे कहीं बढ़ कर उस पूर्व - युग के ब्राह्मणों ने काम किया । ब्राह्मणों ने , वीर - क्षत्रियों को सर्वत्र युद्ध के लिए प्रोत्साहित किया । प्लूटार्क लिखता है सिकन्दर ने ऐसे दार्शनिकों को बंदी कराया और उन्हें फांसी दी । ' पर वे ब्राह्मण भयभीत नहीं हुए । उनमें जीवन था । वे स्वार्थी नहीं थे । उन्होंने कर्तव्य को प्रधान मान कर उसकी वंदी में प्राणाहति दे दी ।
इस प्रकार के प्राण लेने और मृत्यु से बिल्कुल भी भयभीत न होकर बलिदान और क्रांति, अटल निश्चय वाले भारतीय विभुतीता से प्लूटार्क बड़ा प्रभावित हुआ।
(६.) #मेगस्थनीज (304-299 ई.पू.)-
मेगस्थनीज चंद्रगुप्त मौर्य के दरबार में यूनानी सम्राट सेल्यूकस के राजदूत के रूप में आया था।
इसने मौर्य कालीन भारत के बारे में अपने अनुभवों एवं विचारों को अपनी पुस्तक इण्डिका में लेखबद्ध किया है।यद्यपि मूल पुस्तक तो अप्राप्य है किन्तु परवर्ती लेखकों-एरियन,स्ट्रैबो,प्लिनी आदि की रचनाओं में उसकी पुस्तक के कुछ अंश उद्धृत किये गये हैं।
मेगस्थनीज के अनुसार भारतीय समाज में सात वर्ग थे।उसने दास प्रथा का उल्लेख नहीं किया है।किन्तु सती प्रथा का उल्लेख किया है।
उसके अनुसार भारतीय यूनानी देवता डायोनीसियस तथा हेराक्लीज की पूजा करते थे। वस्तुतः इससे शिव एवं कृष्ण की पूजा से तात्पर्य है।
उसने लिखा है कि भारत में दुर्भिक्ष नहीं पङते थे। उसके अनुसार मौर्य काल में नगर का प्रबंध एक नगर परिषद द्वारा होता था जिसमें पाँच-2 सदस्यों वाली छः समितियाँ काम करती थी।
इसने भारतीय पत्तनों, बंदरगाहों तथा व्यापारिक माल का वर्णन किया गया है। यह संगम युग का महत्वपूर्ण विदेशी साहित्यिक स्रोत है।
इंडिका में दक्षिणी भारत के पत्तनों एवं प्रथम शदाब्दी ई. में रोमन साम्राज्य के साथ होने वाले व्यापार का विस्तृत वर्णन मिलता है।
जिसे इन विद्वानों ने “ एंशिएंट इंडिया “ (प्राचीन भारत) कहा है, उसे वस्तुतः प्राचीन नहीं, मध्यकालीन कहना चाहिए क्योंकि हमारा इतिहास तो बहुत पुराना है । भारतीय इतिहासकारों के अनुसार पांच हजार वर्ष तो महाभारत काल को ही हो चुके, रामायणकाल उससे भी बहुत पहले का है, और सिन्धुघाटी और वैदिक युग और भी पुराना, (इसे सिद्ध करने के लिए भारतीय इतिहासकार अनेक प्रमाण देते हैं), जबकि विदेशी इतिहासकार मेगस्थनीज के जिस समय की बात कर रहे हैं वह तो उनके अनुसार ही अब से लगभग सवा दो हजार वर्ष पहले की बात है, तो उसे “ प्राचीन ” कैसे कह सकते हैं ?
इसके अतिरिक्त यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि विदेशी इतिहासकारों ने अपनी समझ के अनुसार भारतीय इतिहास का कालक्रम निर्धारित कर तो दिया, पर उसकी अनेक विसंगतियाँ अब उजागर होती जा रही हैं ।
उदाहरण के लिए, उन्होंने गौतम बुद्ध का समय ईसा से लगभग 500 वर्ष पूर्व निर्धारित किया है, जबकि चीन के विद्वानों का यह मानना है (और वे इसके प्रमाण देते हैं) कि चीन में बौद्ध धर्म ईसा से लगभग 1100 – 1200 वर्ष पूर्व पहुँच चुका था जिसका स्पष्ट अर्थ है कि गौतम बुद्ध का समय ईसा से कम से कम डेढ़ – दो हजार वर्ष पहले होना चाहिए ; पर विदेशी इतिहासकारों की “ जिद “ थी कि पूरे विश्व के इतिहास को लगभग पांच हजार साल में समेटना है क्योंकि वे जिस ईसाई धर्म के अनुयायी थे उसकी मान्यता के अनुसार सृष्टि का निर्माण ईसा पूर्व 23 अक्टूबर 4004 को प्रातःकाल 9.00 बजे हुआ था ।
मानव सभ्यता विकसित होने में भी समय लगा. अतः जब इस दुनिया को बने ही लगभग छह हजार साल हुए हैं,
तो इतिहास उससे अधिक पुराना कैसे हो सकता है ? यों इस कसौटी पर भी मेगस्थनीज़ का समय मध्यकाल ही ठहरता है, प्राचीनकाल नहीं ।
(७.) #प्लिनी (प्रथम शता. विक्रम युग )-
यह यूनानी लेखक था। इन्होंने लैटिन भाषा में नेचुरल हिस्ट्री लिखी जो इण्डिका पर आधारित है।
इसने अपनी पुस्तक नेचुरल हिस्ट्री में प्रतिवर्ष रोम से भारत में चली जाने वाली सोने की भारी मात्रा के लिए दुख प्रकट किया है।
प्लिनी ने भारतीय बहुमूल्य रत्नों की एक लंबी सूची दी है और भारत को एक बहुमूल्य रत्नों वाला एक बङा उत्पादक देश बताया है। उसने भारत तथा उसकी नदियां को रत्न धारक उपाधि से विभूषित किया है।
(८.) #फाह्यान (399-414ई.)-
प्रसिद्ध चीनी बौद्ध भिक्षुक फाह्यान गुप्त सम्राट चंद्रगुप्त द्वितीय के शासन काल में भारत आया था।इसने तत्कालीन भारत की सामाजिक,धार्मिक और आर्थिक स्थिति की जानकारी दी है।(राजनीतिक स्थिति का वर्णन नहीं )।
फाह्यान के अनुसार गुप्तकाल में वस्तु विनिमय कौङियों के माध्यम से होता था।उसने चंद्रगुप्त मौर्य के राजप्रसाद का वर्णन करते हुए लिखा है कि यह राजप्रसाद मानव कृति नहीं बल्कि देव निर्मित है।
(९.) #ह्वेनसांग 9629-643ई.)-
प्रसिद्ध चीनी बौद्ध भिक्षुक ह्वेनसांग सम्राट हर्षवर्धन के शासन काल में भारत आया।तीर्थयात्रियों के राजकुमार के नाम से प्रसिद्ध इस चीनी बौद्ध भिक्षुक ने कई वर्ष भारत में रहकर नालंदा विश्वविद्यालय में अध्ययन किया।इसने हर्ष को शिलादित्य के नाम से अभिहित किया है।
इसके यात्रा विवरण को सि-यू-की कहा जाता है।कन्नौज की धर्म सभा का यह अध्यक्ष था।ह्मेनसांग ने क्षत्रियों की वीरता की प्रशंसा की तथा उन्हें राजाओं की जाति का तथा शूद्रों को कृषक कहा है।
उसने अपने विवरण में महान चक्रवर्ती विजयेता उज्जयिनी के विक्रमादित्य संबंधित वर्णन भी लिखे हैं।
(१०.) #अब्दुर्रज्जाक (1443-1444ई.)-
यह फारसी यात्री था जो कालीकट के जमोरिन के यहाँ शाहरूख का राजदूत बनकर आया था।
1443ई. में देवराय द्वितीय के शासन काल में इसने विजयनगर की यात्रा की थी।
विजयनगर शहर के अद्भुत रूप में वैभव से आश्चर्यचकित होकर उसने लिखा है- मैंने पूरे विश्व में इसके समान दूसरा शहर न कोई देखा है,न सुना है । यह इस प्रकार हुआ है कि एक के भीतर एक इसमें सात परकोटे हैं।
उसके वर्णन से तत्कालीन विजयनगर की स्थलाकृति, प्रशासन तथा सामाजिक जीवन के बारे में विस्तृत जानकारी मिलती है।
संदर्भ :-
(1) भारतवर्ष का सांस्कृतिक इतिहास पं. भगवत दत्त 1955
(2)https://www.google.com/url?sa=t&source=web&rct=j&url=https://www.studyfry.com/bharat-mein-aaye-pramukh-videshee-yaatree&ved=2ahUKEwiM_8-PlZvnAhVDQH0KHYXvA_4QFjACegQIBBAB&usg=AOvVaw1eBdSySjhJewBDH463rbjR.
(3)https://prabook.com/web/mobile/#!profile/3733244
(4) इविडयन ऐक्टिकेरी , भा०६ , पृ० ४१ - २४ ।अलबेरूनी की इण्डिका , प्रोफेसर सचाउ ( Sachau ) का अनुवाद , भा०१ , पृ० 1811. (इतिहासकार विश्वेश्वरनाथ रेउ ने भी इस संदर्भ का वर्णन किया है।)

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