जानिए पोवार गौरव अवन्तिनायक शिवभक्त महाराजा श्रीभोजदेव की टॉप टेन उपाधियाँ
मालवनरेश भोज का व्यक्तित्व इतना महान और बलाढ्य था कि उन्हें कवियों, विद्वानों जनश्रृतियो ने अनेकों उपाधियों से अलंकृत किया। परमार चक्रवर्तीय सम्राट महाराजा भोज की सर्वोत्तम अग्रीम दस उपाधियाँ और उनके पीछे का कारण अर्थात् क्यों उपाधि अभिप्राप्त हुई इसका अवलोकन और सार्थकता :
(१) कविराज :- उनके दरबार में 500 से अधिक विद्वान थे और सम्राट भोज संस्कृत के महानतम् विद्वान थे। उन्होंने अनेकों विद्वानों को आश्रय प्रदान किया क्योंकि वे कवि और विद्वानों का, विज्ञान (विद्या) का सम्मान करते थे। संस्कृत के सिध्दहस्त श्रीभोज निष्णात संस्कृत कवि भी थे। बहुत कम आयु में चम्पू पद्य रचना में उन्होंने चम्पू रामायण की भी रचना करके विद्वानों को चकित कर दिया था। कालिदास नामक कवि भी उनके दरबार में शोभा पाते थे। अतः उनका स्थान कवियों में राजा के भांति था। कवि राजा मुंज की परंपरा को उन्होंने भी आगे बढाया। इसलिए उन्हें भी समुद्रगुप्त की ही भांति #कविराज कहाँ गया।
(२) नवसाहसांक :- इसका अर्थ होता है "नया विक्रमादित्य।" सम्राट भोज की तुलना यदि किसी से कि जा सकती है तो वह है सिर्फ चक्रवर्ती विक्रमादित्य महान। जिसके दान ने, न्यायप्रियता ने, सादगी ने, पांडीत्य ने विक्रमादित्य को भी लजाया, कर्ण और विक्रम भी जिसके प्रताप सम्मुख लोग भुल बैठे ऐसे #प्रत्यक्षरंलक्षं की दान गरिमा से वे विद्वानों में चर्चित रहे, सुविख्यात रहे । कल्हन का पछतावा ही रह गया कि वह धारेश्वर भोज के समय धारानगरी नहीं आ पाया। विद्वानों ने महाराजा भोज की तुलना विक्रमादित्य से की है अन्य नरेशों की तुलना राजा भोज से ही की है। गुणों में विक्रमादित्य और उन्हीं के वंशज माने जाते हैं इसलिए भी नवसाहसांक कहना हर प्रकार से सर्वोत्तम व सर्वोचित है।
(३) मालवचक्रवर्ति :- पैतृक राज्य को उन्होंने ऐसा विस्तार प्रदान किया कि उनकी तुलना सम्राट पृथु से की गई है। उन्होंने सार्वभौमिक चक्रवर्ती साम्राज्य की स्थापना की। राजधानी को और सुरक्षित करने धारानगरी को बसाया और ऐसा सजाया की संत कबीर ने उसके वैभव का उल्लेख अपने पंथ के सबसे बड़े प्रमुख ग्रंथ #बीजक में धारानगरी को दुल्हन सी सजी कहकर कर दिया जिससे राजा भोज की धारा की कल्पना ही कि जा सकती है। उन्होंने अपने साम्राज्य के पूर्वी सीमा पर सुंदरबन, दक्षिणी सीमा पर रामेश्वर, पश्चिमी सीमा पर सोमनाथ तथा उत्तरी सीमा पर केदारनाथ सरिख विख्यात मंदिरों का निर्माण तथा पुणर्निर्माण करवाया। भलेही एक मंदिर किसी अन्य राजा के राज्य में बनाया हो लेकिन चारों मंदिर कोई क्यों दुसरे राजा के राज्य क्षेत्र में बनाएगा? इसलिए "उदयपुर प्रसति का यह कथन" और श्री भोज के "राज्य विस्तार की सीमा" यही प्रामाणिक प्रतित होती है। इस प्रकार के चक्रवर्ती साम्राज्य का विस्तार करने और मालवा का चक्रवर्ती सम्राट होने के बाद उन्हें #मालवचक्रवर्ति कहाँ गया गया।
(४) विदर्भराज :- विदर्भ का राजा अर्थात् #विदर्भराज। विदर्भ (जिसमें वर्तमान 11 जिले है) सम्राट भोज प्रथम के साम्राज्य का ही भाग था। उनका शासन कोकण तक विस्तीर्ण था। इसलिए उन्हें चम्पू रामायण, कोदंड काव्य आदि में भी विदर्भराज कहा गया है ❗
(५) महाराजाधिराज परमेश्वर :- जन प्रिय, लोकप्रिय सम्राट, एक कर्तव्य परायण राजा श्री भोज दानी, ज्ञानी, और जन प्रतिनिधि थे। वे महान शासक रहे। विक्रमादित्य कि ही भांति इसलिए जनश्रृति यों में, कहावतों में भी विख्यात रहे, 'जैसे राजा भोज को वन में पडी विपत्ति' , भुजी मछली जल में गिरी, कहा राजा भोज कहा गंगू तेली आदि आदि। जनप्रियतता ही ऐसी राष्ट्र व्यापक, साहित्य व्यापक कहावतों का कारण होती है। प्रतापी शासक के किर्ति का ही प्रभाव होता है, उसके चरित्र तथा उच्च कोटि के गुण, कर्म उसे सर्वोच्च पद पर आसीन कर देते है। यही पद फिर विरूद बन जाते हैं। मणुष्य के अंदर का देवत्व, मणुष्यत्व, ऋषीत्व ही गुणवाचक विरूद होते हैं। महान हो उसे महात्मा, देवता के सरिख गुण कर्म स्वभाव दिव्य हो तो देवात्मा कहा जाता है, ऐसे ही शासक को भी विद्वानगण महाराजाधिराज, महाराजा आदि सम्बोधन गुणगामी होते हैं और ऐसा ही अलंकारीक विरूद श्रीभोज का भी है - महाराजाधिराज परमेश्वर❗
(६) धारेश्वर :- धारादेवी के आशिष के संस्पर्श से जिसने दुल्हन की तरह सजाई धारानगरी, बसाई। उसके अधिपति, जिन्होंने उज्जयिनी से धार में राजधानी को स्थापित किया उन्हें #धारेश्वर कहाँ गया।
(७) अवन्तिनायक :- मालवा का ही प्राचीन नाम है अवन्ति। चक्रवर्ती विक्रमादित्य प्रमार के समय भी इसके प्रचलन का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। अवन्ति महाभारत के समय भी कहा जाता था। अर्थात मालवगण का ही नाम अवन्ति था। मालव नामक एक जाती के कारण यह मालवा कहलाया। मालवगणमुख्य विक्रमादित्य ने शकों के विरूद्ध सेना तैयार की तब यहा मालवों का भी तत्कालीन जिक्र मिलता है। इसी राज्य के महानायक (राजा) श्रीमहाराज भोज अवन्तिनायक कहलाएँ ।
(८) आयुर्वेदसर्वस्व :- महाराज भोज आयुर्वेद के धुरंधर विद्वान थे। चारूचर्या तथा राजमार्तण्ड सरिख आयुर्वेद की रचनाएँ उनके आयुर्वेद के असाधारण योगदान और विद्वत्ता के परिचायक है और इसीलिए आयुर्वेद के विख्यात निघण्टु ग्रंथों के रचनाकारों ने श्रीभोज का उल्लेख अपनी उन रचनाओं में भी किया है। तिलकमंजरी सरीख ग्रंथ भोजदेव के ही आयुर्वेदसर्वस्वता का परिचय प्रदान करने के लिए अभूतपूर्व उदाहरण है।
(९) त्रिभुवननारायण :- अर्थात् त्रिभुवन का नारायण। पृथ्वी के ऊपर चक्रवर्ती शासन करने वाले शासक को ही ऐसी गुणवाचक विरूद की गरिमा प्रदत्त होती है। सम्राट भोज त्रिभुवनचक्रवर्ति भी कहलाएँ, लोक नारायण भी उन्हें कहा गया। नारायण त्रिदेवों में पालनकर्ता कहे गए हैं और नारायण उन्हें भी कहते हैं जो श्री संपन्न हो। लक्ष्मी जिसपर सदा प्रसन्न हो, जिसकी किर्ति त्रिभुवन तक हो, जिसका रचना विश्व त्रिभुवन में चारो दिशाओं में व्याप्त हो ऐसी समृद्धि के स्वामी राजा भोज को त्रिभुवननारायण कहा गया। जिसके छत्रछाया में विद्या और विद्यापतियों, विद्वानों ने प्राश्रय पाया हो वह निश्चित ही लोक पालक, विद्या संरक्षक और लोक नारायण है।
(१०) आदित्यप्रताप :- ८४ ग्रंथों के रचनाकार श्रीभोजदेव ने कई महान कृतियों को रचा। आदित्यप्रतापसिध्दांत श्रीमंत भोजदेव की एक कृति का ही अभिधान है। ऐसी अमर और अविस्मरणीय उपाधि के रूप में आदित्यप्रताप नामक उपाधि उनकी होने का उल्लेख किया गया है। अर्थात कहा गया है कि यह उपाधि उनकी सदा अविस्मरणीय है। इसलिए सम्राट भोज को उदयपुर प्रसति में भी आदित्यप्रताप कहा गया है।
अतः हम सभी ने सम्राट भोज की 84 उपाधियों से प्रमुख उपाधियाँ लेकर उनका नाम, यश, किर्ति जीवंत रखना चाहिए और भोज वंशी होने का दायित्व अदा करना चाहिए। जय विक्रमादित्य 🙏
✍️जय मां गढ"कालिका" 🚩🚩🚩

टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें