वीरांगणा रत्नावती ने बंदी बनाया था मलिक काफूर को

#एक_सफल_विजेता_वीरांगणा_रत्नावती

यह घटना अल्लाउद्दिन खिलजी के समय की है....
जब अल्लाउद्दिन खिलजी के जैसलमेर आक्रमण के समय राजकुमारी रत्ना ने जैसलमेर दुर्ग कि रक्षा की....और सेनापति मलिक काफूर को बंदि बनाया.. 

"....मरुप्रदेश के महाराज रत्नसिंह के सदा खिले रहने वाले मुख मंडल पर आज चिंता को रेखाएं पड़ी हुई थी । वे किसी गहन चिंतन में निमग्न थे । कोई समस्या ग्रंथि बन कर उनके मस्तिष्क को चुनौती दे रही थी । उन्हें अपने भरे - पूरे जीवन में एक अभाव खटक रहा था । जब वे समस्या को सुलझा नहीं सके तो उनके मुँह से दीर्घ निःश्वास निकल गयी । उसी समय उनको एकमात्र पुत्री #राजकुमारी_रत्ना ने उनके कक्ष में प्रवेश किया । अपने पिता के मुख से निकला यह दीर्घ निःश्वास और चिंतित मुख मुद्रा देखकर रत्ना गहरे सोच में पड़ गयी ।"

उसने अपने पिता से पूछा- " महाराज ! किस सोच में डूबे हैं आप । क्या मुझे उस समस्या का सुनने का अधिकार नहीं है जो आपको व्यथित किए हुए है । "

" कुछ नहीं राजकुमारी । "

" नहीं महाराज , कुछ तो है , आपको मेरी सौगंध जो आप मुझसे कुछ छिपाएं । "

" हमारे गुप्तचरों ने सूचना दी है कि हमारे राज्य पर दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी का सेनापति मलिक काफूर आक्रमण करने वाला है । वह जोधपुर के महाराज को परास्त कर जैसलमेर राज्य की ओर बढ़ रहा है । उसके पास विशाल वाहिनी है । आमने - सामने युद्ध करने की स्थिति में हमारी पराजय निश्चित । यहाँ जैसलमेर दुर्ग में रहकर लोहा लें तो खाद्यान्नों की समस्या सामने आएगी ।अभी हमारा अन्न भंडार बहुत कम है । और फिर इस विकट मरु प्रदेश में अन्न का एक दाना उपलब्ध होना भी कठिन है । तुरंत ही तो ऐसी कोई व्यवस्था नहीं हो सकती । दुर्ग में जो सामग्री है वह सौ सैनिकों के लिए ही पर्याप्त है । यदि सारे सैनिकों को दुर्ग में रखा जाय तो हम भूख से मर जाएंगे क्योंकि मलिक काफूर आसानी से घेरा नहीं उठायेगा । "

रत्ना अपने पिता की समस्या सुनकर कुछ क्षण गहन चिंतन में डूबी रही फिर बोली-

" तो इसमें चिंता करने की क्या बात है ? आप अपने सैनिकों के साथ दुर्ग से बाहर निकल जाइए और दुर्ग अपने किसी नायक को सौंप दीजिए । दुर्ग को रक्षा के लिए सौ सैनिक छोड़ दीजिए । "

" यही मेरी भी योजना है किंतु वह नायक मुझे नजर नहीं आ रहा है जो दुर्ग की रक्षा करने को वीरता व बुद्धिमत्ता दोनों रखता हो । काश ! मेरे कोई पुत्र होता । "

" दुर्ग की रक्षा करूंगी महाराज ! आपकी रत्ना आपके पुत्र की तरह ही दुर्ग की रक्षा करेगी । उसकी धमनियों में भी वही राजपूती रक्त बह रहा है जो राजपूत वीरांगनाओं को समरांगण में शत्रु से लोहा लेने लिए और समय पड़ने पर हँसते हँसते जौहर करने के लिए प्रेरित करता है । आप ही तो कहते थे मेरी रखा बेटी नहीं बेटा है । पालन - पोषण भी तो आपने उसी ढंग से किया है । क्या आप मुझ पर विश्वास नहीं करते । "

" ' करता हूँ बेटी ! सचमुच मैं तुम्हारा उचित मूल्यांकन नहीं कर सका था । तुमने मेरी परेशानी समाप्त कर दी है । मैं कल ही दुर्ग से प्रस्थान करता हूँ । "

दूसरे दिन सूरज की पहली किरण के साथ ही रणबांकुरे राजपूतों की वाहिनी जैसलमेर दुर्ग से निकलकर मरु प्रदेश की ओर बढ़ रही थी । रत्ना ने वीर वेश में सजे अपने पिता के मस्तक पर चंदन का टीका लगाकर आरती उतारी और उन्हें युद्ध क्षेत्र में जाने के लिए बिदा किया । महाराज रत्र सिंह आज बड़े प्रसन्न दीख रहे थे । अपनी पुत्री को नारी सुलभ ममता , सरसता और पुरुष सुलभ दृढ़ता , बुद्धिमत्ता ने उनके पुत्राभाव के गड्ढे को पूर दिया था । उनके जाते ही रत्ना ने दुर्ग की रक्षा का भार अपने कंधों पर सम्हाल लिया ।

इस घटना को एक सप्ताह भी नहीं बीता था कि जैसलमेर के पूर्वाकाश में धूल का एक बवंडर उठता दिखाई पड़ा । मरुभूमि में आधियाँ उठती ही रहती हैं ,इसलिए दुर्गवासियों ने उस ओर विशेष ध्यान नहीं दिया । यह धूल मलिक काफूर के नेतृत्व में जैसलमेर विजय के लिए आ रही सेना के कारण उड़ रही थी ।

सेना ने आते ही दुर्ग को घेर लिया । जैसलमेर का विकट दुर्ग यों ही उनके अधिकार में आ जाना संभव नहीं था । अतः मलिक काफूर को विवश हो घेरा डालना पड़ा । वह उसे जीतने का उद्योग करने लगा । मलिक काफूर अपनी वीरता व कूटनीति के कारण सारे भारत में प्रसिद्ध हो गया था । साधारण से गुलाम से सेनापति वह अपने उन्हीं गुणों के कारण बना था । उसने कई राजाओं को हराया था ।

मदोन्मत्त काफूर ने अपने सैनिकों को दुर्ग पर प्रबल आक्रमण करने की आज्ञा दी । किंतु रत्ना भी कम नहीं थी । वह पुरुष वेश में कमर में तलवार बांधे , हाथ में धनुष बाण लिए , पीठ पर तरकश बाँधे किले में घूमती रहती । अपने थोड़े से सैनिकों से ही ऐसी मोर्चा बंदी की थी कि टिड्डीयों की तरह उमड़ कर आने वाले शत्रु दल को हर बार पीछे हटना पड़ता ।

एक दिन शत्रु के सैनिक किले की दीवारों पर चढ़ने लगे । ऊपर से बरसने वाले तीरों की परवाह न करते हुए वे ऊपर ही चढ़े चले आ रहे थे । उसी समय ऊपर से गर्म तेल , पत्थर , मिर्च से घोला हुआ खौलता पानी गिराया गया । फलतः वे अपने इस दुःसाहस का अच्छा फल पा गए ।

#मलिक_काफूर को घेरा डाले कई दिन हो गए । उसे दुर्ग विजय के कोई आसार नजर नहीं आ रहे थे । उसकी हर चाल का उत्तर रखा इस कुशलता व तत्परता से देती थी कि वह अपना सा मुँह लेकर रह जाता । उसने देखा कि उसे यों युद्ध करते हुए तो दुर्ग पर अधिकार करने में कई वर्ष लग जाएंगे । तब उसने दूसरा रास्ता अपनाया ।

वह कूटनीतिक चालें खेलने पर उतर आया । साँझ धीरे - धीरे मरुभूमि पर उतर रही थी । सूरज किसी अज्ञात प्रदेश की यात्रा पर जा रहा था मरु धरती को छोड़कर । ऐसे ही समय एक मनुष्य को छाया दुर्ग की ओर अग्रसर हुई और दीवार पर चढ़ने लगी । रखा बुर्ज पर खड़ी उसके क्रिया कलाप देख रही थी । उसने कड़क कर पूछा-

" कौन है ? " ' आपके पिता का संदेश वाहक । " ' क्या संदेश लाए हो , बोलो । " " नहीं , वहीं आकर बताऊंगा ।"

"" बताओ , नहीं तो प्राणों से हाथ धोना पड़ेगा । ""

उसकी यह चेतावनी अनसुनी करके वह छाया दीवार पर चढ़ती ही रही । रत्ना ने ऊपर से निशाना साधकर तीर छोड़ा । वह धरती पर गिर पड़ा और मर गया । सबने देखा , वह शत्रु का सैनिक था ।

मलिक काफूर ने एक द्वार रक्षक को घूस देकर अपनी ओर मिलाने का प्रयास किया । उसे काफी सोना दिया गया । द्वार रक्षक पूरी तरह ईमानदार व कर्तव्यनिष्ठ था । उसने राजकुमारी के सामने जाकर सभी बातें कह दी-

 " मलिक काफूर ने यह सोना मुझे इसलिए दिया है कि मैं रात्रि में द्वार खोल दूँ जिससे काफूर अपने चुने हुए सैनिकों के साथ दुर्ग में प्रवेश कर सके । "

राजकुमारी ने उसकी कर्तव्यनिष्ठा की सराहना करते हुए कहा कि तुम उस समय द्वार खोल देना और मलिक काफूर और उसके चुने हुए सैनिकों को भीतर लेकर फिर द्वार बंद कर देना और गुप्त द्वार से मेरे पास आ जाना ।

उसने ठीक वैसा ही किया जैसा राजकुमारी ने उसे आदेश दिया था । मलिक काफूर व उसके सैनिकों को भीतर लेकर उसने द्वार बंद करके ताला लगा दिया और अंधेरे में ऐसा लोप हुआ कि उन्हें कुछ पता ही न चला । इस प्रकार काफूर अपने सैनिकों सहित चूहेदानी में फंस कर रह गया । जैसलमेर का घेरा डाले महीनों बीत गए और किला हाथ नहीं आया वरन् उसका चतुर और वीर सेनापति एक लड़की से मात खाकर बंदी हो गया है - यह समाचार जब अलाउद्दीन खिलजी तक पहुंचा तो उसने जैसलमेर विजय करने का इरादा ही छोड़ दिया ।

जिस देश में ऐसी वीर और बुद्धिमती कन्याएं हों , उसे जीत पाना उसके बस में नहीं था । अतः उसने महाराज रत्न सिंह के पास दूत भेज कर संधि कर ली । मलिक काफूर जो एक गुलाम था , उसे स्नेह , सहानुभूति व मानवतापूर्ण व्यवहार कहीं नहीं मिला था । इसी कारण वह क्रूर हो गया था ।

उसने रखा का दुर्ग की रक्षा करते समय जो रूप देखा था उससे कुछ भिन्न स्वरूप अपने बंदी काल में देखा । बंदी होते हुए भी उसके व उसके सैनिकों के साथ राजकुमारी ने सहृदयतापूर्ण व्यवहार किया था । उन्हें वही भोजन दिया जाता था जो दुर्ग के अन्य सैनिकों को दिया जाता था । जब घेरा लंबा होने लगा , दुर्ग को खाद्य सामग्री कम पड़ने लगी तो राजकुमारी ने उन्हें अपने सैनिकों की अपेक्षा अधिकं ही भोजन दिया । उसके इस मानवीय व्यवहार से वह बहुत प्रभावित हुआ था ।

राजकुमारी ने उसके शरीर को ही बंदी बना कर पराजित नहीं किया था वरन् उसके मन को भी पराजित किया था । तलवारों की भाषा जानने वाले इस सेनापति ने यहाँ आकर यह भी देखा कि मनुष्यता में , मानवीय व्यवहार व भावनाओं में भी एक शक्ति होती है जो शस्त्रों से कई गुना श्रेष्ठ होती है ।

रत्ना ने दुर्ग की रक्षा के साथ - साथ अपने दुर्ग में रहने वालों को भी परिवार के कर्ता - धर्ता की तरह पाला था । अन्न की कमी होने पर उसने दुर्ग में सबसे कम अन्न खाना आरंभ कर दिया था । दुर्गवासियों के लाख आग्रह करने पर भी उसने उस निश्चित मात्रा में किंचित मात्र भी वृद्धि नहीं की थी । इस कमी करने से उसका शरीर कुछ दुर्बल हो गया था किंतु चेहरे की कांति व आत्मिक तेज और भी बढ़ गया था । एक दिन उसने दुर्ग की प्राचीर पर खड़े - खड़े देखा कि सुल्तान की सेना अपने डेरे - डंडे उखाड़कर जा रही है ।

सुदूर मरु प्रदेश से #भगवा_ध्वज 🚩 फहराती हुई राजपूत सेना दुर्ग की ओर बढ़ी चली आ रही है । निकट आने पर देखा महाराजा रत्न सिंह सबसे आगे चपल अश्व पर बैठे गर्व से सीना फुलाए जैसलमेर लौट रहे थे । रत्ना के हर्ष का पारावार न रहा उसने जो वचन अपने पिता को दिया था , वह पूरा हो चुका था ।

दुर्ग में स्वागतसूचक तुरही बज उठी । दुर्ग के द्वार खोल दिए गए । रखा ने श्रद्धावनत हो पिता को प्रणाम किया तो उन्होंने उसकी पीठ थपथपाते हुए कहा

" सचमुच तूने देश की लाज रख ली । तू बेटी भी है . और बेटा भी । आज मेरा मस्तक गर्व से ऊंचा हो गया । लोग व्यर्थ ही पुत्र के लिए आग्रह रखते हैं जबकि पुत्री पुत्र से किसी कदर कम नहीं होती ।"

इस प्रकार राजकुमारी रत्ना की गौरवगाथा आर्य आदर्श, एक वीरांगणा, क्षात्र धर्म परायणता के लिए प्रेरित करने वाली राष्ट्र भक्ति की एक महान मिशाल है। वामपंथियों ने हर संभव प्रयास किया और इतिहास से इन्हें हटाया। इसलिए अब राजकुमारी रत्ना जैसे स्त्री रत्नों को इतिहास में अवश्य पढाया जाना आवश्यक है।

जय आर्यावर्त 🚩
✍️ जय मां भारती 🔥🔥🔥

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