भारतीय तत्व - दर्शन की पुष्टि में साइन्स का सिद्धांत तब बड़ा सहायक सिद्ध हुआ कि आपः में शब्द को आच्छादित किया । अन्तरिक्षे दुन्दुभयो वितना बदन्ति - अधिकुम्भाः पर्यायन्ति । ( जैमिनि 2/404 ) । अर्थात् अन्तरिक्ष में दुन्दुभि के समान विस्तृत और सर्वव्यापी परम वाक् - ध्वनि होती रहती है । अब तक यह बात समझ में आने न वाली थी पर जब सूर्य की खोज करते - करते सन 1942 में मक्क्रिय ने इस तरह की ध्वनि सचमुच सुनी तो वह आश्चर्यचकित रह गया । उसने अपनी ' फिजिक्स आफ दि सन एण्ड स्टार्स ' पुस्तक के 83 पेज पर लिखा है कि- ' श्री जे.एस. दे द्वारा वर्णित सूर्य से आने वाली ध्वनि ( सोलर न्वाइज ) गलत नहीं है वरन् सूर्य की ध्वनि की तरह ही और भी तारा - मण्डलों ( ग्लैक्सीज ) से ध्वनि तरंगें आ रही हैं । वह सौर - घोष सोलर न्वाइज के समान ही हैं । उनका अनुसंधान किया जाना बहुत आवश्यक है । ' इस शताब्दी में सुर्य से ओ३म् की ध्वनि की पुष्टि भी नासा के एक वैज्ञानिक पाडेय ने की है। अमेरिका संस्था NASA ने सूर्य की आवाज रिकॉर्ड की है , किंतु अपने कानों की क्षमता 20 Hz से लेकर 20,000 Hz तक ही होती है , किंतु सूर्...
महाराणा प्रताप के दरबारी पं. चक्रपाणि मिश्र: ज्ञान विज्ञान के एक विस्मृत एक अपरिचित एतिहासिक पात्र...... महाराणा प्रताप के दरबार में चक्रपाणि मिश्र एक दरबारी-पंडित थे, साथ ही महाराणा प्रताप के बाल मित्र भी थें। वह उस समय के एक वास्तुकार और प्रसिद्ध वनस्पति विज्ञानी, कृषि विज्ञानी थे। उनकी प्रसिद्ध रचनाओं में विश्ववल्लभ, मुहूर्तमाला, राज्याभिषेक पद्यति आदि शामिल हैं। उन्होंने जल संसाधनों के विकास पर जोर दिया। वे तत्कालीन युध्द कला में भी थोड़े अवगत थे किंतु उनका अधिकार क्षेत्र ज्ञान विज्ञान की विभिन्न शाखाएं थी जिसका वे एक जीवीत कोष थें। मेवाड़ के लिए ग्रंथ रचना करने का प्रेरित आदेश स्वयं महाराणा प्रताप ने ही उन्हें कार्यभार के रूप में सौंपा था ताकि उनके राज्य में अच्छी शिक्षा, ज्ञान, साहित्य तथा कला- सुत्र, का समतोल तंत्र विकसित हो सकें। 'चक्रपाणि मिश्र’ ने कई ग्रंथ रचे किंतु मुख्यतः चार ग्रंथों की रचना की थी। उनके ग्रंथों के नाम इस प्रकार हैं... (१) #विश्व_वल्लभ (२) #मुहूर्त_माला (३) #व्यवहार_दर्श (४) #राज्याभिषेक_पद्धति ‘चक्रपाणि मिश्र’ एक उच्च कोटि के विद्वान थे। उन्होंने...
सिगरेट और शराब पीने वालों पर कुख्यात व्यभिचारी ओशो के यह विचार जान लीजिए... ओशो कहता है - ❝ सभ्यता दो रोग पैदा करवाती है, एक तरफ अहंकार और एक तरफ अपराध। तुमने किसी बच्चे को कहा, सिगरेट नहीं पीना; महापाप है, नरक में सड़ोगे। तुमने डरवाया। अब अगर पीएगा, तो अपराध-भाव पैदा होगा कि मैंने कुछ पाप किया। मां-बाप से झूठ बोला, छिपाया। वह डरा-डरा घर आएगा। चैकन्ना रहेगा कि कहीं न कहीं से खबर मिलने ही वाली है। कोई न कोई देख ही लिया होगा। कपड़े में बास आ जाएगी मां को। मुंह को पास लाएगा, तो मुंह से पता चल जाएगा। वह पकड़ा ही जाने वाला है। वह अपराध से भरा हुआ है, डर रहा है, घबड़ा रहा है। ❞[1] अब इस कथन पर क्या कहे? कोनसी गाली दे? कोई शब्द ही नहीं बचा। निशब्द। ये कितना मुढ़बुद्धि रहा होगा इसका अनुमान आप लगा सकते हैं। पहला तो इसको समाज में जो असामाजिक तत्व है जो समाज मे अत्यंत निषिद्ध तथा लॉ तथा विज्ञान के विरूद्ध गलत काम करते हैं उनको अपनी ओर आकृष्ट करना था। और अपने आप को उनमे भगवान के रूप में प्रतिष्ठित करना था। इसने अपनी योजना या अभियान की ऐसी ही रूपरेखा गढी है जैसे कयी ढोंगी पाखंडी रचते है लेकिन ये कु...
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