बौध्द कालिन व्यापार और नौका नयन

#बौध्द_कालिन_व्यापार_और__नौका_नयन.. .

आर्यावर्त में बौद्ध पूर्व भारत में समुद्र यात्राओं का वर्णन हमने ""क्या हिंदू या आर्य सागर पार नहीं जाते थे?"" नामक लेख में देखा।¶ अब हम इस लेख में बौध्द कालिन आर्यावर्त की चर्चा करेंगे....

"बौद्धः साहित्य" के अनुशीलन से उस समय के व्यापार तथा नौका नयनः : में अनेक महत्वपूर्ण और मनोरञ्जक बातें ज्ञात होती हैं । उस समय : के सम्बन्ध में भारत के व्यापारी महासमुद्र को पार कर दूर दूर देशों में व्यापार के लिये जाया करते थे । समुद्र को पार करने के लिये जहान बहुत बड़ी संख्या में बनते थे . और उस समय में जहाज बनाने का व्यवसाय अत्यन्त उन्नत दशा में था ।

  • (१) समुद्द वणिज जातक में एक जहाज का उल्लेख है , जिन में वर्धकियों के सहन्त्र परिवार बड़ी सुगमता के साथ बैठः कर सुदूरवर्ती किसी द्वीप में चले गये थे । वर्धकियों के ये एक सहस्र परिवार ऋण के बोझ से बहुत दबे हुवे थे और अपनी दशा से असन्तुष्ट होने के कारण इन्होंने यह निश्चय किया था कि किसी सुदूर प्रदेश में जाकर बस जावें ।[1] 'सचमुच वह जहाज बहुत विशाल होगा , जिस में एक हजार परिवार सुगमता के साथ यात्रा कर सकें ।
  • (३) #वलाहस्स : जातक में पांच सौ व्यापारियों का उल्लेख है , जो जहाज के टूट जाने के कारण लंका के समुद्रतटः पर आ लगे थे और जिन्हें पथभ्रष्ट करने के लिये वहां के निवासियों ने अनेक  प्रकार के प्रयत्न किये थे । [2] 
  • (४) #सुप्पारक_जातक में ७०० व्यापारियों का उल्लेख है ,. जिन्होंने एक साथ एक जहाज पर समुद्रयात्रा के लिये प्रस्थान किया था ।[3]
  • (५) #महाजनक_जातक में चम्पा से सुवर्ण भूमि को प्रस्थान करने वाले एक जहाज का वर्णन आता है , जिसमें बहुत से व्यापारी अपना माल लाद करः व्यापार के लिये जारहे थे । इस जहाज में सात सार्थवाहों का माल लदा हआ था और इसने सात दिन में सातसौ योजना की दूरी तय की थी ।
  • (६) #संख_जातक में संख नाम के एक ब्राह्मण की कथा आती है , जो बहुत दान करता था । उसने दान के लिये . छः दानशालायें बनाई हुई थीं । इनमें वह प्रतिदिन छः लाख , मुद्राओं का दान करता था | एक वार उसके दिल में आया कि धीरे धीरे मेरी सम्पत्ति का भण्डार समाप्त होता जाता है और जब सम्पत्ति समाप्त  हो जायगी , तो मैं क्या दान करूंगा ? यह सोच कर उसने एक जहाज द्वारा सुवर्णभूमि ( वर्मा का एक प्रान्त ) मुद्राओं में बिका ।
  • दूसरी बार जब वे व्यापारी फिर व्यापार करते हुवे वादेरुदेश पहुंचे , तो जहाज पर अपने साथ एक मोर को ले गये , मोरे को देख कर बावेरु के निवासियों को और भी अधिक आश्चर्य हुआ और वह वहां पर एक सहस्र मुद्राओं में बिका ।
  • (७) इस विषय में सब विद्वान सहमत हैं कि बावरु का अभिप्राय बैबिलोन से है और इस जातक में यह भलीभांति स्पष्ट हो जाता है कि बौद्ध काल में भारतीय व्यापारी सुदूरवर्ती वैविलोनिया के राज्य में भी व्यापार के लिये जाया करते थे । बेबिलोन के मार्ग में विद्यमान फारस की खाडी और फारस का समुद्र तट उन के जहानों द्वारा भलीभांति आलोडित हुने थे , इस बात में भी किसी प्रकार का सन्देह नहीं किया जा सकता ।

  • (८) भारत से इन देशों तक पहुंचने के लिये अनेक जलमार्ग विद्यमान थे । भारत की नदियां उस समय मार्ग के तौर पर व्याहत होती थीं । चम्पा और बनारस उस समय में अच्छे बन्दरगाह माने जाते थे , जहां से जहाज पहले नदी में और फिर समुद्र में जाते थे ।
  • (९) कुमार महाजनक न सुवर्ण भूमि के लिये वैबिलोन से है और इस जातक में यह भलीभांति स्पष्ट हो जाता है कि बौद्ध काल में भारतीय व्यापारी सुदूरवर्ती वैविलोनिया के राज्य में भी व्यापार के लिये जाया करते थे । बेबिलोन के मार्ग में विद्यमान फारस खाडी और फारस का समुद्र तट उन के जहानों द्वारा भलीभांति आलोडित हुने थे , इस बात में भी किसी प्रकार का सन्देह नहीं किया जा सकता ।
  • (१०) भारत से इन देशों तक पहुंचने के लिये अनेक जलमार्ग विद्यमान थे । भारत की नदियां उस समय मार्ग के तौर पर व्याहृत होती थीं । चम्पा और बनारस उन समय में अच्छे बन्दरगाह माने जाते थे , जहां से जहाज पहले नदी में और फिर समुद्र में जाते थे । कुमार महाजनक ने सुवर्ण भूमि के लिये चलते हुवे चम्पा से प्रस्थान किया था । ( Ibid vol . vi , p . 22)  
  • (११) इसी प्रकार सीलानिसंस जातक में समुद्र में जहाज के टूट जाने पर जल मार्ग द्वारा यात्रियों को बनारस पहुंचाने का उल्लेख है ।  (Ibid vol . ii , p . 78 )
  • (१२)  पर सुदूरवर्ती देशों में जाने के लिये चम्पा और बनारस जैसे नदी तटवर्ती नगर विशेष उपयुक्त नहीं हो सकते थे । इसके लिये उस समय में समुद्र तर पर अनेक प्रसिद्ध बन्दागह विद्यमान थे । इन बन्दरगाहों के सम्बन्ध में भी कुछ महत्वपूर्ण निर्देश बौद्ध साहित्य में मिलते हैं । हम उन्हें यहां निर्दिष्ट करना आवश्यक समझते हैं ।
  • (१३) #लोसक_जातक में समुद्रतट पर विद्यमान एक बन्दरगाह का वर्णन है , जिप्तका नाम गम्भीरपत्तन था । यहां पर जहाज किराये पर मिल सकते थे । गम्भीर पत्तन से जहाजों के चलने और उनके महासमुद्र में नाने का वर्णन इस  जातक में उपलब्ध होता है । 'Cowell - Jatak vol . iv , p 268 Ibid vol . iv , p 228-231. 
  • (१४) #सुस्सोन्दि_जातक में भारुकच्छ नाम के बन्दरगाह का उल्लेख है । भारुच्छ से जहाज में जाने वाले व्यापारियों का विशदरूप से वर्णन इस जातक में किया गया है ।
  • (१५) इसी प्रकार #सुप्पारक_जातक में भी भारुकच्छ पत्तन का उल्लेख है , और वहां यह भी लिखा है कि यह समुद्रतट पर विद्यमान एक बन्दरगाह था ।
  • (१६)  इसी प्रकार अन्यत्र बौद्ध साहित्य में ताम्रलिप्ति , सुप्पारक , रोरुक , कविर पत्तन आदि बन्दरगाहों का भी उल्लेख है ।
  • (१७) समुद्र में जहाजों द्वारा होने वाले विदेशी व्यापार के अतिरिक्त बौद्ध कालीन भारत में अान्तरिक व्यापार की भी कमी न थी ।
  • (१८) भारतवर्ष एक बहुत बड़ा देश है । उसके विविध प्रदेशों में पारस्परिक व्यापार अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान रखता था । यह प्रान्तरिक व्यापार स्थल और जल दोनों द्वारा होता था । भारत में व्यापार के प्रमुख स्थल और मार्ग कौन से थे , इस पर हम आगे चल कर प्रकाश डालेंगे । पर यहां यह बताना आवश्यक है , कि स्थल मार्गों द्वारा होने वाले व्यापार का स्वरूप क्या होता था ।
  • यह आन्तरिक व्यापार सार्थों ( काफलों ) द्वारा होता था । बहुत से व्यापारी परस्पर साथ मिल कर काफीलों में व्यापार कहते । उस समय भारत में जंगलों की अधिकता थी । रास्ते बहुत सुरक्षित नहीं थे । इस कारण किसी व्यापारी के लिये यह सम्भव नहीं होता था कि वह अकेला सुदूरवर्ती प्रदेशों में व्यापार के लिये जा सके । वे बड़े बड़े काफले बना कर एक साथ व्यापार के लिये जाया करते थे ।
  • जातक साहित्य में बहुत से काफीलों और उन की यात्राओं के वर्णन संगृहीत हैं । अनेक काफलों में तो ५०० से लेकर १००० तक गाड़ियां होती थीं । जातक कथाओं में जिन काफलों ( सार्थों ) का वर्णन है , वे बैलगाड़ियों द्वारा व्यापार करते थे ।
  • सार्थ के नेता को सार्थवाह कहते थे । काफलों की यात्रा निरापद नहीं होती थी । उन्हें लूटने के लिये डाकुओं के विविध दल हमेशा प्रयत्नशील रहते थे । सत्तिगुम्ब जातक में डाकुओं के एक ग्राम का उल्लेख है , जिप्स में ५०० डाकू निवास करते थे । ?
  •  सार्थो की इन डाकुओं का सामना करने तथा उन से अपने माल की रक्षा करने की उचित व्यवस्था करनी पड़ती थी । इस के लिये वे अपने साय शस्त्रयुक्त पहरेदारों को रखते थे । ये पहरेदार व योद्धा सार्थ पर होने वाले हमलों का वीरता के साथ मुकाबला करते थे । सार्थों की रक्षार्थ साथ चलने वाले पहरेदारों का जगह जगह पर जातक कथाओं में वर्णन है । डाकुओं के अतिरिक्त अन्य भी अनेक प्रकार की अापत्तियों का मुकाबला इन सार्थों को करना होता था ।
  • अपएणक जातक में इन विपत्तियों का विशद रूपसे वर्णन है । डाकुओं के अतिरिक्त जंगली जानवर , पानी की कमी , भूत पिशाच आदि की सत्ता और आहार का अभाव ये सब अापत्तियां थीं , जिनका समुचित प्रबन्ध किये बिना कोई सार्थ सफलता के साथ अपनी यात्रा नहीं कर सकता था । स्थल मार्ग से व्यापार करने वाले ये सार्थ चड़ी लम्बी लम्बी यात्रायें किया करते थे ।
  • गन्धार जातक में एक सार्थ का वर्णन है , जिस न विदेह से गन्धार तक की यात्रा की थी । इन दोनों नगरों का अन्तर १२०० मील के लगभग है । बनारस उस समय व्यापार का बड़ा भारी केन्द्र था । बनारस के साथ बहुत से नगरों और देशों के व्यापार का उल्लेख जातकों में मिलता है । काम्बोज , काम्पिल्य , कपिलवस्तु , कोशल , कुरुक्षेत्र , कुरु , कुशीनारा , कौशाम्बी , मिथिला , मधुरा , पाञ्चाल , सिन्ध , उज्जैन , विदेह आदि के साथ बनारस के व्यापार का वर्णन इस बात को सूचित करता है , कि उस समय में बनारस व्यापार का एक अत्यन्त महत्वपूर्ण केन्द्र था , जहां से सार्थ विविध देशों में व्यापार के लिये -जाया करते थे । '
  • बनारस से काम्बोज , सिन्ध और उज्जैन बहुत दूर हैं , इतनी दूर व्यापार के लिये जाने वाले सार्थो की सत्ता इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि वौद्ध काल में भारत का अान्तरिक व्यापार बहुत उन्नत दशा में था । स्थल मार्ग के अतिरिक्त आन्तरिक व्यापार के लिये नदियों का भी प्रयोग होता या । उस समय में गंगानदी जहाजों के आने जाने के लिये प्रयोग में लाई जाती थी । जातक कथाओं में बनारस पाने वाले जहाजों का अनेक स्थानों पर उल्लेख है । महाजनक जातक से सुचित होता है , कि बौद्धकाल में गंगा में बहुत से जहाज आते जाते रहते थे । गंगा के अतिरिक्त अन्य भी अनेक नदियां व्यापारिक मार्ग के रूप में प्रयुक्त होती थीं ।

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☑️#ref:
📝[1.] Cowell - Jatuk vol . iv , p . 100
📝[2.] Ibid vol . ii , p . 89-90 .
📝[3.] Ibid vol . iv , 87-90 Ibid .vol . vi , p . 22 
📝[4.] Cowell - Jatak vol . iii , p . 83 - 84.
📖📚bharatvarsha ka itihaas by aachary ramdev. VOL. lll. P. 345-353.

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