जब गुरूकुल तोड़े जा रहे थे......

जब गुरूकुल तोड़े जा रहे थे......

➡️जिस प्रकार प्राचीन काल ईसा पूर्व प्रथम शताब्दी  में शक विरूद्ध स्वतंत्रता संग्राम में शको से लढते हुए विक्रमादित्य स्वतंत्रता के नायक मालवगणमुख्य थे और व्यास पीठ पर कालिदास, वराहमिहिर, आदि आचार्य ही थे,

➡️जैसे चंद्रगुप्त मौर्य के अखंड भारत संग्राम में व्यास पीठ पर आचार्य चाणक्य थे, गुरुकुल था.... 

➡️जब छत्रपति शिवाजी महाराज मुगलों से
लढे तब भी व्यसपीठ पर गुरूकुल था.. समर्थ रामदास के मार्गदर्शन में....... 

➡️वैसे ही 1857 के क्रांति में राजा महाराजा और नायक  थे तो उसकाल में गुरूकुल और आर्य परंपरा ही व्यास पीठ पर थी....

 लेकिन आज व्यासपीठ और शासक का तालमेल नहीं है अतः वैदिक सत्य सनातन धर्म की हानी हो रही है... 

19 वीं शताब्दी का वह दौर तब सरकार एडी चोटी का जोर लगा रही थी.... गुरूकुल जलाकर कयी महत्वपूर्ण पुस्तकों को नष्ट कर रही थी.... तब गुरूकुल शिक्षा पध्दति को खत्म करने के लिए अंग्रेजी अंग्रेजों के द्वारा अपनी विदेशी शिक्षा पद्धति चालू करके भारतीय युवकों के मस्तिष्क पर डाले जा रहे गहरी गुलामी के संस्कारों के मायाजाल को विशुद्ध , स्वदेशी राष्ट्रीय शिक्षा देकर छिन्न - भिन्न कर  स्वातंत्र्य , स्वभाषा , स्वराष्ट्र तथा स्वदेशी का पाठ पढाने का सूत्रपात सर्वप्रथम आर्यसमाज ओर से किया गया था , उस प्रारम्भकाल में इस शिक्षा संस्था की निम्न विशेषताएं थीं..... 

1 . वहां के अध्यापकों में एक भी अंग्रेज अध्यापक नहीं था ।

2.वहां किसी भी सरकारी विश्वविद्यालय की परीक्षायें न दिलाकर अपनी ही परीक्षायें दिलाई जाया करती थीं ।

3 . किसी भी सरकारी विश्वविद्यालय के निर्धारित पाठ्यक्रम की पुस्तकें भी गुरुकुल ने अपने पाठ्यक्रम में नहीं रखी हुई थी , वहां अपनी पाठ्य पुस्तकें अपने ही गठित शिक्षा बोर्ड द्वारा तैयारकर अपने ही प्रेस में प्रकाशित की जाती थी ।

4 . वहां पर इतिहास , भूगोल , विज्ञान , अर्थशास्त्र आदि सभी आधुनिक विषय आर्यभाषा ( हिन्दी के माध्यम से ही पढ़ाये जाते थे ।

5 . वहां सरकार अथवा सरकारी विश्वविद्यालय अनुदान आयोग से अनुदान के नाम पर एक पाई भी आर्थिक सहायता के रूप मे नहीं ली जाती थी ।

6 . वहा वार्षिकोत्सवों के अवसर पर अध्यक्षता , उपाधि तथा पारितोषिक वितरणादि के निमित्त अथवा दीक्षान्त भाषण के लिए किसी भी सरकारी अधिकारी को आमन्त्रित नहीं किया जाता था ।

7.अपने उत्सव के प्रबन्ध के लिए सरकारी पुलिस या सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त अथवा सरकारी छत्रछाया में पलनेवाले स्वयंसेवी संगठन के स्वयंसेवकों को न बुलाकर अपने छात्रवर्ग से ही उक्त प्रबन्ध का सारा कार्य कराया जाता था , जोकि उस समय की पुलिस के प्रबन्धों से भी सब प्रकार से उत्तम होता था ।

8 . वहां के सभी अधिकारी , कर्मचारी , ब्रह्मचारी विशुद्ध स्वदेशी खादी के वस्त्रों का ही प्रयोग किया करते थे ।

9. गुरुकुल संसार की नज़रों से दूर एकांत बीहड़ जंगल में था ।

10. गुरुकुल के छात्रों को तैरना , घुडसवारी , लाठी , भाला , तलवारादि शस्त्रों का चलाना तथा निशानेबाज़ी के साथ युद्धविद्या का भी अभ्यास कराया जाता था ।

11. सन् 1922 से पहले वहां के उत्सवों पर लगनेवाली दुकानों में दुकानदारों के लिये विदेशी चीनी ' लाना अधिकारियों की ओर से सख्त मना था , यदि कोई इस आदेश का उल्लंघन करता था तो उसे तुरन्त ही वहां से भगा दिया जाता था , क्योंकि उस समय यह चीनी विदेशिता का प्रतीक समझी जाती थी ।

इन सभी कारणों से यह संस्था एक लम्बे समय तक अंग्रेजी सरकार की आंखों में तीखे काटे की भांति खटकती रही , इस संस्था में विभिन्न वेश धारण कर सरकारी गुप्तचरो के चक्कर प्रतिदिन लगा करते थे , उनके लिये यह संस्था सिरदर्द बनी हुई थी , सरकारी डायरियों में गुरुकुल का नाम ब्लेकलिस्ट में था , एक गुप्तचर ने तो अपनी डायरी में लिखा था

"गुरुकुल के उत्सव पर लगभग एक लाख दर्शनार्थियों का विशाल जनसमुदाय जुटता है , धन की अपील होने पर स्त्रियां अपने आभूषण तक उतार कर दे देती हैं , आगे उसने यह लिखा था कि गुरुकुल में पढ़े - लिखे सन्यासियों ( स्नातकों ) का राजनीति से क्या सम्बन्ध होगा ?" 

यह एक विचारणीय विषय है - उसी प्रसंग में आचार्य रामदेवजी द्वारा लिखित एक रिपोर्ट की भूमिका का वर्णन करते हुये लिखा था

"यहां दी जानेवाली शिक्षा सर्वांश में राष्ट्रीय गुरुकुल में इतिहास इस ढंग से पढाया जाता है कि उससे ब्रह्मचारियों मे देशभक्ति की भावना उद्दीप्त होती है , उनमें उपदेश और आचरण दोनों से देश के लिये उत्कट प्रेम पैदा किया जाता है" (📖 राष्ट्रवादी दयानन्द , पृ 0 96 ). ।

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