सम्राट विक्रमादित्य के चिन्हों को नष्ट कर दिया था विदेशी आक्रांताओं ने
चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य के साक्ष्यों को कालांतर से अनेक परिप्रेक्ष्य में देखें तो देश काल और परिस्थिति के नुसार उनके सनष्ट होने के क्रम प्रमाण दृष्टिगोचर होते हैं। सरलतम तरिके से निर्मित किए गए मंदिर और प्रासाद आदि नष्ट करने के लिए मुस्लिम आक्रांताओं ने तो बड़ा नाम कमाया है। भारत के मंदिरों के जगह मस्जिद बनाने के लिए वे प्रसिद्ध रहे। लुटना ही इस्लाम की सिख है और यही उनकी जन्नत! फिर आते हैं दृतिय दृष्टिकोण पर... इसके अनुसार कयी इतिहासकार मानते हैं कि हुणों के आक्रमण काल में लुटपाट का चक्र बड़ा लंबे अर्से से रहा। जिसमे अभी पिछले दिनों पीएम मोदी जी की सरकार द्वारा भारत की नटराज की मूर्ति पुन्ह भारत लाने की घटना ऐसे ही ऐतिहासिक लुटपाट की घटनाओं का प्रासंगिक उदाहरण कहना चाहीए। और एक किए है तक्षशिला और नालंदा जैसे विश्व विज्ञालयों के अरबों खरबों की संख्या से भी अधिक पांडुलिपियाँ और ग्रंथ जलकर बर्बाद हो जाना।
तृतीय है मैकाले और मैक्समूलर (जर्मन विद्वान जिसे अंग्रेजी और संस्कृत बखूबी आती थी) , जैसे अंग्रेज जिन्होंने भारत के मूल ग्रंथों में मिलावट की और तथ्यों को तोड़ने की कोशिश की जिसमें वे कयी हद तक सफल रहे। प्रसिद्ध क्रांतिकारी श्री राजिव दिक्षीत जी के व्याख्यान में उन्होंने मैकाले के द्वारा बनाई गई और मैक्समूलर के द्वारा बनवाई गई सांस्कृतिक ग्रंथों में कैसे एक नकली मनुस्मृति तयार की गई थी जिसे आर्य समाज ने भी स्वीकार किया है और इसके प्रमाण भी मिलते हैं। ग्रंथों में मिलावट अंग्रेजो की कूनिती और षड्यंत्र का अंग था। इसकी कहानी केवल धर्म ग्रंथों तक ही सीमित नहीं है। वैसे ही अपने गौरवशाली इतिहास को भुलाने और हमें मानसिक रूप से गुलाम बनाने उन्होंने भारतीय इतिहास के साथ भी छेड़छाड़ की, तथ्यों को बदला, साक्ष्यों को मिटाया । राजा भोज में डां. रेऊ ने लिखा है कि 1930 में भारत एक इतिहास के साक्ष्यों को लेकर प्रदर्शनी हुई थी जिसमें भारत के कई रियासतों ने भाग लिया था। ऐसी ही इतिहास के साक्ष्यों की प्रदर्शनी होती रहीं तथा रियासतों के माध्यम से कयी अनगिनत प्रमाण जिनसे भारत का मध्य युगीन और 11 वीं सदी से लेकर प्राचीन काल तक के साक्ष्य थे, जो परतंत्रता काल में ब्रिटिशों के हाथ लगें और उन्होंने बड़े आसानी से उन्हें मिटा दिया। एक प्रसिद्ध इतिहासकार कर्नल टाॅड और अन्य लोगों ने भी यह माना है कि भारत के इतिहास के साथ सर्वाधिक छेड़ छाड़ की गई है।
विक्रमादित्य के बारे में सबसे प्राचीन अनुश्रुती प्रतिष्ठान के राजा हाल सातवाहनरचित गाथा सप्तशती या गाहा सत्तसई की है । उनपर डाँ राजबली पांडेय.एम.ए कृत संवत् प्रवर्तक विक्रमादित्य में विशिष्ट विवरण दिया गया है। उन्होंने विक्रमादित्य के विषय में हुई भ्रांतियों को सुलझाया है।
कालिदास पृष्ठ क्र 43 पर महामहोपाध्याय वासुदेव विष्णु मिराशी ने भी स्पष्टता के साथ महाकवि कालिदास और गणाध्यक्ष पृथ्वीपती महाराज विक्रमादित्य को समकालिन माना है। उनके प्रधान रत्नों में धन्वंतरि पर यदि विचार किया जाए तो प्रकट होगा कि वैदिक काल में एक धन्वन्तरि हो गये हैं। जो काशी के वेदकालीन राजा दिवोदास के तीन या चार पिढी पूर्व हो गये थे।(जी. एन. मुखोपाध्याय कृत हिस्ट्री ऑफ इंडियन मेडिसिन पृष्ठ क्र.[दृतिय खण्ड] 310-11 ) उसके पश्चात धन्वन्तरि नामक वैद्यों की परंपरा चलीं। और धन्वंतरि कृत कहें जाने वाले "विद्याप्रकाशचिकित्सा" तथा धन्वंतरि निघण्टु आदि के विवेचन से यह ज्ञात होता है कि विक्रमकाल (ईसा पूर्व 57) में कोई धन्वंतरि हुए हैं। विद्याप्रकाशचिकित्सा में सुर्य वंदना दि हुई है। उसे देखते हुए ज्ञात होता है कि वैद्यराज धन्वंतरि विक्रमादित्य के आश्रीत कवि थे। आयुर्वेद की परंपरा के अनुसार इस ग्रंथ का काल लगभग ईसा पूर्व 56 या 57 या ईसा पूर्व प्रथम शताब्दी में रहा है। अतः प्राचीन काल में वैद्य राजसभाओ में नियुक्त होते ही थे। अतः वैसे ही मालवगणमुख्य गणाध्यक्ष के भी सभा में राज वैद्य हो इसमें कोई संदेह नहीं। प्रसिद्ध कोशकार अमरसिंह का समय भी ईसा पूर्व पहली शताब्दी माना जाता है। इसपर जयचंद विद्यालकर ने भी लिखा है कि अमरसिंह का समय ईसा पूर्व प्रथम शताब्दी ही है। अतः अमरकोश विक्रम युग की एक व्यवस्थाओं की प्रामाणिक जानकारी प्रदान करने वाला ग्रंथ माना जाता है। विक्रमादित्य के काल में सिंधु, गांधार और कन्नौज के अतिरिक्त आर्यावर्त में घोड़ो की कोई अच्छी जाती नहीं थी। अतः उसका आयात प्रचुर मात्रा में विदेशों से होता था। जैसे अरब या बनायू घोड़ों के लिए प्रसिद्ध था। अंग्रेज और मुगल द्वारा अरबी कवि जरहाम कितनोई कृत सायर-उल-ओकुल पुस्तक भी मिटा दी जाती यदि वह इस्तांबुल शहर की प्रसिद्ध लाइब्रेरी मकतब-ए-सुल्तानिया के बजाय भारत के तक्षशिला जैसे किसी विश्व विद्यालय या गुरूकुल में होती। विक्रम काल में घटिया प्रकार के हाथीं विन्ध, पारियात्र, सौराष्ट्र के वनों से प्राप्त कर लिए जाते थे तथा मालवों को विंध्य, पारिपात्र तथा सौराष्ट्र के हाथीयों पही निर्भर रहना पड़ता था। विक्रमादित्य के समय के साक्ष्य और उनकी सुक्ष्म ऐतिहासिकता का विस्तृत विवरण डाँ. व्यास महोदय ने अपने ग्रंथ विक्रमादित्य में दिया है। उनके पुस्तक के संदर्भ स्त्रोत से प्राप्त उल्लेखों के अनुसार शक और हुणों ने मालवा पर प्रतिशोधात्मक आक्रमण किया उन्होंने चुन चुन कर अपने प्रथम वंशाच्छेदक विक्रमादित्य के समस्त चिन्हों और स्मृतियों को यहाँ से चुन चुन कर नष्ट किया। हालाँकि यशोवर्मन ने उन्हें भारत से ही क्यों न खदेड़ दिया लेकिन ऐसा होने की संभावना निरापद नहीं कही जा सकती। अनेक इतिहासज्ञ यह भी स्वीकार करते हैं कि महाकाल मंदिर में विक्रमादित्य की सुवर्ण प्रतिमा थी और वह मुगलकाल में नष्ट हुई है । ऐसे अन्यान्य तथ्य कयी इतिहासकारों ने उल्लेखित किये जिनसे पता चलता है कि विक्रम कालिन कयी तथ्य नष्ट कर दिए गए।

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