क्या वैदिक ऋषि विज्ञान जानते थे? (1)

#क्या_वैदिक_ऋषि_विज्ञान_जानते_थे ? भाग - 1


'ऐसा प्रश्न इस समय वारंवार पूंछा जाता है । कुछ समय के पूर्व कई विद्वान ऐसा कह रहे थे कि वैदिक ऋषि करीब करीब अरण्य अवस्थामें थे । पर यह बात अब रही नहीं है। अब विद्वान् लोग मानने लगे हैं कि वैदिक ऋषियों की सभ्यता अच्छी उन्नतिका चिन्ह बता रही है और विज्ञान की प्रागति भी उस समय अच्छी हुई थी । इस विषयमें किसी को कुछ संदेह हो तो उसका निराकरण , प्रो . श्री के . भ . पटवर्धन , एम . एस . सी . इन्दौर निवासीने मंत्र , ब्राह्मण , भारण्यक , उपनिषद , यज्ञ , याग , इष्टि आदि का संशोधन करके , इस लेख के श्रृंखला में अच्छी तरह किया गया है।

 ' क्या ऋषि विज्ञान जानते थे ' इस प्रश्नका उत्तर प्रथम देना चाहिये । तो जानिए.... 

#प्रो०_पटवर्धनजीने इस लेखमाला में इसका यथोचित उत्तर दिया है और बताया है कि वे वैदिक काल के ऋषि अच्छे शास्त्रज्ञ थे । पर इस विषयके प्रमाण और भी हैं और वे यहां मननीय भी हैं इसलिये हम यहां एक दो प्रमाण देते हैं।

◾(१) जलकी उत्पत्ति :-

मित्रं हुवे पूतदक्षं , वरुणं च रिशादसम् ।
धियं घृताचीं साधन्ता ॥ ऋग्वेद १ । २ । ७

( पूत - दक्षं ) पवित्रता करके बल बढानेवाले ( मित्रं हुवे ) मिन्न वायुको मैं लेता हूं और ( रिश् - अदसं वरुणं च ) जंग चढाकर खानेवाले वरुण वायुको लेता हूं । ये दोनों ( घृत - अचीं धियं साधन्ता ) पानी प्रवाहित करने के कर्म की साधना करते हैं ।

वायु सूक्तके मंत्रों में यह मंत्र है । और ( घृत - अचीं ) जल प्रवाहित करने के ( धियं ) बुद्धि पूर्वक किये कर्म की साधना यहां लिखी है ।

" रिश " यह वैदिक पद है इसका " रिष्ट " ऐसा रूप होता है , यही ( Rust ) का मूल रूप है । जंग करके खाना ( रिश - अदस् ) का अर्थ है । कौन जंग लाता है ? आक्सिजन वायु जंग लाकर धातुओंको खाता है ।

दूसरा वायु “ मित्र " है । मित्र का अर्थ मापन करनेवाला ( Measurer ) है । वह पवित्र बल देता है । अन्य पदार्थों का वजन करने के कार्य के लिये यह उपयोगी है इसलिये इसका नाम “ मित्र " ( मापन करनेवाला Measurer) है।

क्या ये शब्द शास्त्रीय प्रगतिके द्योतक नहीं हैं ? इन दोनों वायुओं के मिश्रण से जल उत्पन्न होता था यह क्या इस ऋषि को विदित नहीं था ? यदि नहीं था तो ये शब्द प्रयोग किस तरह हुए इन शब्द प्रयोगों से स्पष्ट प्रतीत हो सकता है कि इस ऋषिको जलकी उत्पत्ति इन दो वायुओंके मेलसे होती है इसका ज्ञान अच्छी तरह था । " रिश " और " रूश " इन दोनों धातुओं का अर्थ हिंसा करना है । " रूश " का रूष्ट ( Rust ) होता है और " रिश " का रिष्ट ( Rist ) होता है । " रष्ट " ( Rust ) का अर्थ जंग करके खा जाना होता है । रिश - अदस् में यही भाव है ।

ये पद शास्त्र सिद्धांतके अनुकूल नहीं हैं ऐसा कोई नहीं कह सकेगा । विज्ञान की उन्नति होने की अवस्था में ही ऐसी शास्त्रीय शब्द रचना होना संभव है । और देखिये

◾(२) #अश्वरहित_वेगवान_रथ:

अनेनो वो मरुतो यामो अस्तु , अनश्वश्चिद् यमजत्यरथीः ।
अनवसो अनभीशू रजस्तूर्वि रोदसी पथ्या याति साधन् ॥

 ______(ऋग्वेद ६। ६ ६। ७) 

इस मंत्रमें वर्णन किया हुभा स्थ ( अन् - अश्वः ) घोडों के बिना चलता है , ( अ - रथी - अजति ) चलानेवाला भी उसको नहीं रहता , परंतु वह वेगसे चलता है , ( अन् - अभीशुः ) लगाम भी इसको नहीं होते ऐसा यह रथ ( अन् - एनः ) निर्दोष है और यह ( रजः - तू : ) धूली को उडाता हुआ चलता है । घोडे , सारथी , लगाम आदि कुछ भी न होते हुए यह रथ धूली उडाता हुआ बडे वेग से चलता है ।

यह वर्णन केवल काव्य ही है ऐसा माना जायगा , ऐसा कैसा कहा जायगा । ऐसा वर्णन होने के लिये कवि के सामने घोडे के बिना चलनेवाला रथ तो चाहिये और यह धूली उडाता है इस लिये इसको पर्याप्त वेग भी है । क्या यह विज्ञानकी उन्नति नहीं बता रहा है ? और भी देखिये

◾(३) पक्षी जैसा विमान

तिनःक्षपः विरहातिव्रजद्भिः , नासत्या भुज्युं ऊहथुः पतंगैः।
तमूहथुः नौभिरात्मन्वतीभिः , अन्तरिक्षम॒द्भिरपोदकाभिः ॥ ______(ऋ० १।११६। ३ , ४) 

' तीन रात्रि और तीन दिन ' तक ( अतिव्रजद्भिः ) अतिवेगसे जानेवाले ( पतंगैः ) पक्षी जैसे वाहनों से भुज्यु को नासत्यों ने अपने स्थान पर लाया ।

ये वाहन ( अन्तरिक्ष - पुद्भिः ) अन्तरिक्षमेंसे ( अप - उदकाभिः ) मेघ मंडलके ऊपरसे ( आत्मवतीभिः नौभिः ) अपने आधीन रहनेवाले और नौकाओंके समान थे और ये तीन थे । यहां ( अतिव्रजत् ) अत्यंत वेगवान पक्षी जैसे दीखनेवाले विमानों का यह वर्णन है।  आज भी तीन अहोरात्र न थांमते हुए चलनेवाले विमान बने नहीं हैं । पर यहां वेदमें तीन अहोरात्र बडे वेगसे चलनेवाले पक्षी जैसे दीखने वाले विमानोंका यह वर्णन है । क्या यह केवल कल्पना ही होगी ? क्या यह वर्णन वायुयानों का वर्णन नहीं है ? ऐसे वायुयान विज्ञान उन्नति न हुई तो कैसे बन सकते हैं ?

◾(४) रक्त में लोहा :-

' लोहित ' शब्द रक्तवाचक है । इसका अर्थ ( लोह - इत ) लोह  जिसमें रहता है ऐसा है । रक्त में लोहा रहता है यह विज्ञान इस शब्द में भरा है । जिसको यह विज्ञान नहीं होगा वह रक्त का नाम लोहित रखेगा ही कैसे ?

रक्त में लोह रहता है यह या ही नहीं समझ में आ सकता । इसके लिये बड़े विज्ञान की आवश्यकता रहती है । यह सब विज्ञान इस शब्दने ही बताया है । ऐसे वैज्ञानिक शब्द ही जिनके वचनों में हैं , उनको विज्ञान मालूम था यह कहने की आवश्यकता ही क्या है ?

◾(५) ' #आयुष्यवर्धक_सुवर्ण ' :-

' अमृत ' नाम सुवर्ण की धातु के लिये है । मृत्युको दूर करता है इसलिये ' अ - मृत ' नाम सुवर्ण का है । सुवर्ण का यह गुण विज्ञानसे ही मालूम हो सकता है ।

क्रमशः

🚩विचार प्रसार🙏🙏🚩🚩🚩🚩
✍️जय मां भारती 🔥🔥🔥🔥🔥🔥

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