क्या वैदिक ऋषि विज्ञान जानते थे ? (2)
(विगत लेख की लिंक 🔗 नीचे दी गई है।)
(६) #स्फोटक_अस्त्र :-
युद्धोंमें अस्त्रोंका उपयोग होता था । कई भत्र विज्ञानसे ही बननेवाले थे , इसमें संदेह नहीं है । बाणके नोक पर बम जैसा लगाया जाता था । वह शत्रु सेनामें जाकर गिरता और फट जाता था और वहां आग लगती थी । यह सब विज्ञानसे ही होता था । ये अस्त्र कई ऋषि बनाते थे । विज्ञान न होता तो ये स्फोटक बम या अस्त्र बनते कैसे ? इससे स्पष्ट प्रतीत होता है कि ऋषि कालमें विज्ञान भी पढाया जाता था । _ _
◾(७) अब अध्यात्मशास्त्र के विषयमें हम देखते हैं :-
"द्वे वाव ब्रह्मणो रूपे , मूर्ते च वामूर्ते च ।"
____________________________ (बृ . उ . २ । ३ ।१)
' ब्रह्मके दो रूप हैं एक मूर्त और दूसरा अमूर्त ' दोनों रूप एक ही ब्रह्मके हैं । अब यहां यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि अमूर्त रूप तो ब्रह्मका है पर मूर्त रूप भी ब्रह्मका कैसा है ! उपनिषद् कहता है कि दोनों मूर्त तथा अमूर्त ब्रह्मके ही रूप हैं ।
यूरोपमें इस समय मॅटर ( Matter ) और एनर्जी ( Energy ) ये एक दूसरे रूपमें बदलते हैं अर्थात् दोनों एक ही के रूप है ऐसा इस समय शस्त्रज्ञ मानने लगे हैं । पर पहिले दोनोंको अध्यात्म शास्त्र विभिन्न मानते थे । परन्तु सहस्रों वर्षों के पूर्व वैदिक ऋषियोंने मूर्त और अमूर्त ये दोनों रूप ब्रह्मके ही हैं ऐसा निश्चित रूपसे सिद्ध किया था । क्या यह ज्ञान और विज्ञानकी प्रगति नहीं है ?
मूर्त और अमूर्त एक ही वस्तु के रूप हैं इसका निश्चय होने के लिये ज्ञान और विज्ञानको प्रगति अत्यंत होनी चाहिये
उतनी प्रगति ऋषियों की ऋषिकाल में हो चुकी थी । और उन्होंने स्थूल और सूक्ष्म , मूर्त और अमूर्त , व्यक्त और अव्यक्त , जड़ और चेतन एक ही ब्रह्मके रूप हैं ऐसा प्रत्यक्ष साक्षात्कार किया था ।
विज्ञान की उन्नति के बिना यह नहीं हो सकता । विज्ञानकी उन्नति वैदिक समयमें कितनी हो चुकी थी यह हमने देखा और हम , माध्यात्मिक चरम सीमापर वे पहुंच चुके थे , यह भी देखते हैं ।
यस्मिन् सर्वाणि भूतानि आत्मा एव अभूद्विजानतः ।
तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः ॥
________________(वा० यजु० ४० ) " जिस अवस्थामें ये सब भूत आत्मा ही हुए उस ज्ञानीको एकत्वका दर्शन होने के कारण शोक और मोह नहीं होता ।"
यहां भी सब स्थूलभूत और आत्मामें एकत्त्वका दर्शन कहा है जो इसके पूर्व बताया था । मूर्त और अमूर्त ब्रह्म का अर्थ ही एकत्व दर्शन है । स्थूलभूत तो सबको दीखते हैं , आत्माका दर्शन नहीं होता , वह तो अमूर्त है । पर वेद कहता है कि , ये दोनों एक ही हैं अर्थात् आत्मा ही इन भूतोंके रूपोंमें दीखता है । जो दीखता है और जो नहीं दीखता वह सब एक ही परम तत्व का रूप है । यह ज्ञान विज्ञान की प्रगति न होने पर कदापि ध्यान में नहीं आ सकता ।
यूरोपके विद्वान् अब आत्माके अस्तित्वको मानने लगे हैं । इसके पहिले तो वे केवल स्थूल प्रकृति के विभेदों को ही मान रहे थे , जैसी जैसी प्राकृतिक विज्ञान की खोज होती गई वैसा वैसा यूरोपमें आत्माके अस्तित्व का ज्ञान होने लगा ।
इस के लिए हमारा यह लेख एक छोटा सा नमूना है: ______________
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हमारे भारतके ऋषियोंने परा और अपरा ये दो विद्याएं हैं ऐसा मानकर अपरा विद्यामें सब विज्ञानको माना और परा विद्यामें आत्मीकी विद्या मानी है।
इस वर्गीकरणसे ही स्पष्ट प्रतीत होता है कि भौतिक विज्ञान भी प्राचीन ऋषिकाल में अच्छी प्रगति तक पहुंचा था । यही विषय श्री पटवर्धनजी के निबंधमाला में भी प्रतिपाद्य विषय है । हमे यह मानना पडेगा कि जो सिद्धांत आज माने जाते हैं वे ऋषियोंने खोज करके अति प्राचीन समयमें निकाले थे । निष्पक्ष होकर जो इसको पढ़ेंगे , तो वे इसी परिणामतक पहुंचेंगे इसमें मुझे संदेह नहीं है ।
आर्य या हिंदू निर्विवाद रूप से विश्व की प्राचीनतम चिंतन धारा है , जिसमें समय - समय पर इस महान देश में जन्मे मनीषियों के मौलिक दार्शनिक विचारों का संगम होता रहा है । इसीलिये हिंदुत्व बहुआयामी है । उसमें ईश्वर है और निरीश्वरवाद भी । उसमें निगुर्ण चिंतन है और सगुणोपासना भी , उसमें योग और ध्यान हैं तो तंत्र और मंत्र भी ।
वस्तुतः हिंदुत्व कोई धर्म ( Religion ) नहीं है और न ही को विशिष्ट दर्शन । उसमें तो इस देश की भौगोलिक , जातिगत , तथा सांस्कृतिक विविधताओं एवं तम्जन्य अति बुद्धिवादी दर्शनिक विचारों से लेकर अत्यंत विचित्र प्रकार के कर्मकांड और अनुष्ठानों तक सभी का अपूर्व समावेश है । उसे तो देश के निवासियों के प्रगतिशील चिंतन से उपजी एक बहुरंगी जीवनशैली का ही नाम दिया जा सकता है ।
ऋषियों के चिंतन में कभी भी ठहरावन आने तथा प्रकृति पर अत्यंत गहरी विश्लेषक दृष्टि डालने के कारण ही हिंदुत्व के विचार प्रवाह एवं उसके प्रकट स्वरूप में आधुनिक विज्ञान के कतिपय सिद्धांतों के समावेश का भी स्पष्ट आभास होता है तथा गंभीरता से मनन करने पर मानव जाति के आज के इस अतुल ज्ञान - कोष के संदर्भ में भी पुरातन हिंदुत्व को असंदिग्ध प्रासंगिकता सूर्य की प्रथम रश्मियों की भाँति उजागर होने लगती है ।
(८) भौतिकशास्त्री "फिट्जोफ कँप्रा" अपनी प्रसिद्ध पुस्तक " ताओ ऑफ फिजिक्स " ( फोन्टाना / कोलिन्स , 1976 ) में प्रारंभ में ही लिखते हैं -
" इस पुस्तक में हम देखेंगे कि बीसीं शताब्दी के भौतिकशास्त्र के दो शिलाधार क्वांटम सिद्धांत तथा सापेक्षवाद - विवश कर देते हैं कि हम इस विश्व को उसी प्रकार से परखें जैसा कि हिंदू , बौद्ध एवं ताओ दार्शनिकों ने अनुभव किया है । "
(९) इसी प्रकार परमाणु भौतिकी के पुरोधा जूलियस राबर्ट ओपेनहाइमर Science And Common Understanding ( Oxford Univ . Press London 1954 ) नामक पुस्तक में लिखते हैं कि :-
" आधुनिक परमाणु भौतिकी के स्तब्धकारी अनुसंधान किसी भी तरह सर्वथा नये नहीं कहे जा सकते । उनके बीज निश्चित रूप से हमारी प्राचीन संस्कृतियों - हिंदू और बौद्ध - में पहले से ही विद्यमान हैं। "
इस प्रकार सत्य सनातन वैदिक धर्म में विज्ञान का सत्यान्वेषण आध्यात्मिक वैज्ञानिकवाद के अनुरूप असंदिग्ध और सुक्ष्म सिध्द होता है....
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#संदर्भ :- Ancient India: spirituality and science.
¶ऋषियों के विज्ञान की श्रेष्ठता °°°°°°°
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