सम्राट भोज प्रथम का साम्राज्य एक अध्ययन
सम्राट भोज की राज्य सीमा
(१) सी ० पी ० वैद्य , विश्वेश्वर रेउ , आदि भोज के राज्य को सीमित मानते हैं । सी . इ ० लुार्ड एवं के ० के ० लेले के अभिमत से सहमत होते हुए रेउ कहते हैं कि मुंज के राज्यक्षेत्र में भोज वृद्धि नहीं कर पाया था ।
(२) पी ० टी ० श्रीनिवास अय्यंगर भोज का राज्य गोदावरी तथा यमुना तक विस्तृत स्वीकार करते हैं ।
(३) डी ० सी ० गांगुली भोज का राज्य उत्तर में बांसवाड़ा तथा डूंगरपुर तक , दक्षिण में गोदावरी तक , खानदेश व कोंकण तक , तथा पश्चिम में आज के करा जिले तक विस्तृत मानते हैं ।
(४)' #द_स्ट्रगल_फार_एम्पायर ' ग्रन्थ में भोज के राज्य में चित्तौड़ , बांसवाड़ा , डूंगरपुर , भेलसा , खानदेश , कोंकण तथा गोदावरी के उत्तरी तट का क्षेत्र स्वीकार किया गया है ।
(५) डा ० दशरथ शर्मा के अनुसार ' गुजरात का कुछ भाग , समस्त मालवा , राजस्थान के अनेक भाग , मध्यभारत के कुछ क्षेत्र और महाराष्ट्र का कुछ अंश उसके साम्राज्य में सम्मिलित था । '
(६) एक भग्न शिलालेख के अनुसार निर्गणनारायण ( भोज ? ) ने साकेत तथा उससे उत्तर में हिमालय तक , दक्षिण में मलय पर्वत तथा पश्चिम में द्वारिका तक के विस्तृन भूभाग पर अधिकार कर लिया था।
(७) श्री क ० मा ० मुन्शी भोज के राज्य की सीमा उत्तर में छम्ब तथा थानेश्वर से दक्षिण में कृष्णा तथा तुंगभद्रा तक एवं द्वारिका से कन्नोज तक स्वीकार करते हैं । उनके अनुसार छम्ब , डूबकुण्ड , शाकम्भरी , नाडोल , मेदपाट , पाटण , कच्छ , सौराष्ट्र , लाट , कोंकरण , चेदी , कल्याण आदि भी उसके अधीन थे ।
(८) प्रसिद्ध संस्कृत विद्वान डॉ. रेवा प्रसाद द्विवेदी ने प्राचीन संस्कृत साहित्य पर शोध के दौरान मलयाली भाषा में भोज की रचनाओं की खोज करने के बाद यह माना है कि राजा भोज का शासन सुदूर केरल के समुद्र तट तक था।
(९) भोज सार्वभौम था। उसने ' मालवचक्रवर्ती ' उपाधि प्राप्त की थी । परन्तु भोज की राज्यसीमा का निर्धारण अब तक अन्तिम रूप से नहीं हो पाया है ।
(१०) डाॅ. भगवतीलाल राजपुरोहित ने अपने ग्रंथ राजा भोज का रचनाविश्व में सम्राट भोज को चक्रवर्ती सम्राट और सार्वभौमिक राजा कहाँ है तथा उनका साम्राज्य विस्तृत माना है।
#निष्कर्ष : सम्राट भोज उत्तर में गोदावरी तक, पश्चिम में केरल के सुदूर तट से द्वारका तक तथा पूर्व में साकेत और अयोध्या तक एवं दक्षिण में कृष्णा यमुना और केरल तक के साम्राज्य के अधिपति थे।
भोज शौर्य का जीवित वीरत्व था । उसने अनेक छोटे - बड़े राजाओं को पराजित कर अपने राज्यक्षेत्र की सीमा में अपरिमित वृद्धि की थी । उपयुक्त विवरण से यह स्पष्ट है । उसकी वीरता के गुणगान विविध शिलालेख , अवनि कूर्म शतम् , पारिजातमंजरी , कोदण्डकाव्य , खड्गशतम् , अज्ञात नामा प्राकृत काव्य आदि विविध कृतियों में प्राप्त होते हैं । वह उन्नतिशील विचारधारा का राजा था जो संग्राम विजेताओं में सदा अगुअा रहता था।




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