रामायण का एशियाई देशों में प्रभाव

#रामायण_का_एशियाई_देशों_में_प्रभाव :  भाग: 1

वर्तमान समय के विद्वानों की भी यह धारणा है कि रामायण केवल भारत का और हिन्दुओं का ही ग्रन्थ है और वह भक्तिग्रन्थ और धर्मग्रन्थ है ।

अतः पूर्ववर्ती इण्डोनेशिया आदि देशों में , जहाँ किसी समय भारतीय राजाओं का राज्य था। इस लेख श्रृंखला में में हम यह बताएंगे कि रामायण केवल भारत , का या हिन्दुओं का ही नहीं , अपितु समस्त विश्व के लोगों का मान्यवर इतिहास ग्रन्थ रहा है । अतः विश्व के सारे देशों में रामायण पढ़ी जाती है ।

यदि कुछ देशों में रामायण का अस्तित्व या ज्ञान लुप्त हो गया है तो उसका कारण यह है कि वहां के लोग ईसाई या इस्लामी बन जाने के कारण उन्होंने रामायण की स्मृति दवा दी है । शोध करने से विश्व के हर देश में रामायण का अस्तित्व अवश्य निखर आएगा ।

रामायण की विश्वमान्यता और विश्व - प्रसार से एक और मौलिक निष्कर्ष यह निकलता है कि कृतयुग से कौरव - पाण्डवों के महाभारतीय युद्ध तक सारे विश्व के लोग वैदिकधर्मी ही थे । अतः वे रामायण को निजी पूर्वजों का इतिहास मानकर बड़ी श्रद्धा से उसका पठन करते थे ।

१४०० वर्ष पूर्व जब इस्लाम पंथ नहीं था और १६०० वर्ष पूर्व जब कृस्ती पन्थ को मानने वाले लोग मुट्ठी - भर ही थे तब सारे विश्व में रामायण का अध्ययन होता था । इसकी जानकारी हम इस अध्याय में और अगले अध्याय में प्रस्तुत करेंगे ।

हम इन अध्यायों में जो सूत्र प्रस्तुत कर रहे हैं उनके आधार पर यदि विश्व के विद्वान बारीकी से शोध कार्य आरम्भ कर दें तो उन्हें हर प्रदेश में रामकथा के अवशेष अवश्य प्राप्त होंगे ।

#श्रीलंका_में_रामायण

लोकेश चन्द्र जी लिखते हैं कि छठी कृस्ती शताब्दी का सिंहल नरेश कुमार धातुसेन उर्फ कुमारदास कवि भी था । सन् ६१७ के आसपास उसका शासनकाल कहा जाता है । उसका रचा हुआ जानकीहरण नाम का काव्य है ।

आज तक के ज्ञात इतिहास में वह श्रीलंका का प्राचीनतम संस्कृत साहित्य माना जाता है । बारहवीं शताब्दी में किसी अज्ञात लेखक ने उसका सिंहली भाषा में शब्दश : अनुवाद किया । अनेक सिंहली लेखकों ने उस काव्य की बड़ी प्रशंसा की है ।

आधुनिक युग में C. Don Bostean नाम के लेखक ने सिंहली भाषा में जो रामायण का अनुवाद प्रकाशित किया है उसका सिंहल की उपन्यास शैली पर बड़ा प्रभाव पड़ा है ।

John D'Silva जैसे आधुनिक सिंहली नाटककारों ने राम - कथा पर आधारित नाटक लिखे हैं । श्रीलंका में राम - कथा के प्रति बड़ी श्रद्धा और आदर है और सीता के गुणों की वैसी ही प्रशंसा की जाती है जैसे इण्डोनेशिया में होती है ।

#काम्बोज_में_रामायण

#स्याम के पूर्व में  काम्बोज देश है जिसे कम्बोडिया या कम्पूचिया भी कहते हैं । सातवीं शताब्दी के काम्बोज के खेमर शिलालेखों से पता चलता है कि रामायण उस समय का बड़ा मान्यता प्राप्त ग्रन्थ था ।

काम्बोज की ऐतिहासिक इमारतों पर रामायण के कई प्रसंग बड़े गर्व से उत्कीर्ण किए गए हैं । खेमर वंश के शासन में रामायण के प्रसंग या रामकथान्तर्गत विविध व्यक्तियों के नामों के उल्लेख से सामाजिक , नैतिक , ऐतिहासिक घटना या भावनाओं के तोल - मोल करने की प्रथा थी ।

बेयॉ नाम की इमारत की बाहर की दीवार पर सातवें जयवर्मन राजा ने वम् राज्य पर जो चढ़ाई की थी , उसके दृश्य रामायण प्रसंगों की शैली में ही अंकित हैं ।

राम ने लंका का जैसे दमन किया वैसे ही सातवें जयवर्मन ने चम् के  ' राजा पर विजय पाई , ऐसा दर्शाया गया है ।

सातवें जयवर्मन के समय से खेमर वंश के जीवन में रामायण का बड़ा महत्त्व रहा । उत्सवों में राम लीला का अन्तर्भाव होता था , चित्रकारी में रामायण के प्रसंग बताए जाते और कथा - कीर्तनों में राम - कथा कही जाती । खेमर के लोगों का काव्य सारा राममय हो गया था ।

अंकोर नाम की जो खेमरों की प्राचीन राज धानी काम्बोज देश में है , वहाँ की राम - कथा जावा द्वीप की राम - कथा से मिलती - जुलती है । उसमें और वाल्मीकि द्वारा लिखित राम - कथा में थोड़ा अन्तर पड़ गया है । '

रामायण की मूलकथा या इतिहास बाल्मीकि द्वारा ही प्रथम लिखा हुआ विश्व को प्राप्त है ।

बाल्मीकि ने भी एक संशोधक के नाते नारद जी के सुझाव पर प्राचीनकाल में घटे इतिहास का संकलन किया । तत्पश्चात् समय - समय पर विविध देशों के और विविध युगों के इतिहासकार , कवि , नाटककार , लेखक , चित्रकार , कथाकार , पौराणिक प्रवचनकार आदि ने उस कथा में प्रक्षेप , तोड़ - मरोड़ आदि परिवर्तन किए ।

इसी कारण जावा ( इण्डोनेशिया ) , काम्बोज आदि देशों में चित्रित या वर्णित राम - कथा बाल्मीकि द्वारा लिखी कथा से कहीं - कहीं भिन्न प्रतीत होती है ।

🙏विचार प्रसार🔮🔮🔮🔮🔮🔮
✍️जय मां भारती 🚩 🚩 🚩 🚩 🚩 🚩 🚩


 

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