कैसे हुई थी मेवाड़ की महाराणी अजबदे पँवार की मृत्यु

कैसे हुई थी मेवाड़ की महाराणी अजबदे पँवार की मृत्यु?

अकबर हल्दीघाटी के युध्द की तैयारी कर रहा था। योजनाएँ बना रहा था तथा उसने मानसिंह को उस युध्द का नेतृत्वकार रखना भी निश्चित कर लिया। उसे पता था कि पठान तोफजी हाकिम खान सुरी और उसके साथी अफगानिस्तान का मिर्जा यदि  हल्दीघाटी में महाराणा प्रताप का साथ देते हैं तो वह यह जंग कभी नहीं जीत सकता। इसलिए जब उसे पता चलता है कि मिर्जा  महाराणा का ही साथ देगा तब हल्दीघाटी के जंग के पहले ही मीर्जा को अपनी छावनी में बुलाकर उसे छल से मार गिराया और उसके सैनिकों को बच्चों बुढो के साथ बेरहमी से कत्लेआम करवा दिया। और संधि तथा शांति के नाम पर हाकिम खान सुरी को भी छावनी में बुलाकर ही बंदि बनाया।

हालांकि हाकिम खान सुरी अकबर के कपट तथा दृष्टता से  पहले से ही पुर्ण परिचित था लेकिन मिर्जा के कहने पर न चाहते हुए भी उसे वहां आना पड़ा था। हाकिम खान सुरी को बंदि बनाकर अकबर ने और एक षड्यंत्र की योजना सोची, की महाराणा प्रताप को शांती का समझौता देने और अमन के नाम एक लकड़ी हाथी का तौहफा दिया जाए जिसमे फैजल नामक एक भयावह जंगली कबिलाई सरदार और उसके साथी हमलावर हो तथा इस अभियान का गोपनीय लक्ष्य महल में सोए महाराणा प्रताप को छल पूर्वक मार दिया जाए।

जिसमें महल के भीतर सहायता पहुंचाने का काम महाराणा प्रताप की विमाता अर्थात् देश द्रोही जगमाल की मां धीरबाई (राजमाता ) करेगी।


जगमाल प्रतापसिंह का सौतेला भाई और परम शत्रु था जो अकबर से मिला था। फिर क्या, अकबर ने बहलोल खान की मदत से फैजल द्वारा इस योजना को मुर्त रूप देना आरंभ किया तथा उपरी रूप से मानसिंह को शांती का प्रस्ताव देने भेजा।

जब अकबर इस योजना को बनाने अपने छावनी से फैजल के कबिले के लिए अकेले बिना बताए कुच कर दिया और जब आया ही नहीं तब हाकिम खान सुरी ने मौके पर उसे ढूंढने के लिए मदत करने की बात मानसिंह को लिख भेंजी। मानसिंह उसे लेकर अकबर की खोज में वन में चल पडा। निशाकाल था। अरण्य का चप्पा चप्पा हाकिम को ज्ञात था। मौका मिलते ही वह भाग निकला तथा सुर्योदय तक मेवाड़ पहुंचा। मुगल बेचारे देखते ही रह गए और वन में भटक गए। सुबह तक बड़े मुश्किल से छावनी तक पहुंचे। देखा तो अकबर आ चुका था। अकबर इस घटना के लिए मानसिंह पर क्रोधित हुआ।

उधर मेवाड़ पहुंच चुके हाकिम खान सुरी ने अपने मित्र महाराणा प्रताप को हल्दीघाटी युध्द की तैयारी की खबर विस्तार से बताकर राणा प्रताप को सावधान किया। दरबार भरा और उसमें इसपर विशद चर्चा चलीं। भील और पठान इस युध्द के मे महाराणा प्रताप को साथ देंगे यह सुनिश्चित हुआ। हाकिम खान सुरी ने अकबर के हल्दीघाटी में युध्द तैयारी का हाल तो कह दिया किंतु उसे क्या पता था कि अकबर वन में किस काम के लिए और क्यों गया था?

रात्री हुईं! लकड़ी हाथी का तौहफा महल के बाहर खडा किया गया। यह अकबर का भेजा तोहफा था। अमन के लिए उसने भेजा था। अकबर की कपट योजना का आरंभ हुआ।

महाराणा प्रताप के प्रसिद्ध अश्व चेतक ने अकबर द्वारा भेजे हाथी मे छिपे फैजल के साथीयो को भांप लिया। लेकिन उसके संकेत कोई समझ नहीं पाया। कड़ी सुरक्षा व्यवस्था थी। सुरक्षा के लिए द्वार पर सैन्य थें। और फिर रात्रि हुईं। इससे पहले भी एक बार विष कन्या द्वारा महाराणा प्रताप पर हमला हो चुका था इसलिए प्रमुख अधिकारी राव चुंडावत ने विशेष तौर पर महाराणा प्रताप की सुरक्षा के लिए इंतजाम किये थे।

इतने में अकबर की योजना के अनुसार (राजमाता) धीरबाई ने वह सैन्य किसी प्रकार कुछ देर के लिए हटवाए और कबिलाई फैजल ने महल में प्रवेश किया। इस षड्यंत्र कारी कुल्टा स्त्री धीरबाई ने अपने सौतेले लडके महाराणा प्रताप सिंह को मारने योजनाबध्द तरीके से महल के उस स्थान तक फैजल और उसके दल को राजपरिवार के कक्षों तक पहुंचाने का काम किया। और उसी मध्य महाराणा प्रताप राणी अजबदे के कक्ष से चेतक के पास पहुंचे थे क्योंकि चेतक आतुरित उद्विग्न हो रहा था और उसे देखकर फिर पुन्ह वे अपने कक्ष की ओर आएं।

उस समय यकीन के साथ कह सकते हैं कि प्रथम पत्नी महाराणी अजबदे के अलावा भी महाराणा प्रताप की एक पत्नी मारवाड़ नरेश कि पुत्री, राव चंद्रसेन की भतीजी फुल बाई थीं। यह नया ही विवाह था। किंतु महाराणा प्रताप की मुख्य तथा प्रिय पत्नी कुंवराणी अजबदे थीं। (महाराणा प्रताप के पश्चात अमरसिंह महाराणा हुए वे अजबदे की संतान थे।) अतः राणी अजबदे के कक्ष में महाराणा प्रताप होंगे ऎसा संभव अनुमान प्रतित हुआ अतः हमलावर महाराणी अजबदे के कक्ष में पहुंचा। महारानी अजबदे उस समय संभवतया गर्भवती थीं। कक्ष में अंधेर था। बाहर हमलावर देखे जा चुके थे और उनका हनन भी आरंभ हो गया था। उसने महाराणा प्रताप समझकर एक तीक्ष्ण वार अपनी कृपाण से कर दिया और स्वर सुनकर की यह तो प्रतापसिंह नही वहां से भाग निकला। तभी वहां उन कबिलाईयो को भयंकर मौत के घाट उतारते हुए महाराणा प्रताप पहुंच गए। राणी अजबदे को कक्ष से लेकर अन्य कक्ष में चल पड़े तथा उनकी प्राण चिंता में चिंतीत हो राज्य वैद्य बुलवाया।


महाराणा ने उस हत्यारे का पिछा किया लेकिन #फैजल जो उस कबीले का मुखिया और महाराणी अजबदे का हत्यारा था भाग निकलने में सफल रहा। (लेकिन बाद में महाराणा प्रताप ने हल्दीघाटी के रण में द्वितीय दिन उस हत्यारे फैजल को ऐसी दर्दनाक मौत के घाट उतारा की उसकी आत्मा तक कांप उठी। उसके पुष्टकाय विशाल शरिर को महाराणा ने आधा चिर दिया।)

फैजल का वध हल्दीघाटी में 

राणी अजबदे की घायल हो जाने की खबर सुनकर महल में गहन विषाद और शोक, प्रतिशोध का पारावार उमड़ पडा। फैजल का पीछा छोडकर महाराणा प्रताप वापिस आए। अंतिम सांसे गिनती प्राणेशा अजबदे शयनित पडी थी...  बचने की कोई आशा न बचीं थी।


पीड़ा के चलते अजबदे ने फिर महाराणा प्रताप के समक्ष अपने प्राण त्याग दिए।

महारानी अजबदे महाराणा प्रताप की तरह स्वाभिमानी, निरभिमानी स्वतंत्रता प्रिय विरांगणा थी। तन और मन से सौंदर्य प्रखर राष्ट्रभक्त थीं। एक आदर्श पत्नी थीं। उन्होंने अपने यौवनावस्था में बिजलियां को अपने दम पर बिना किसी मेवाड़ के संरक्षण के अफगानों को बिजोलियाँ से खदेड़कर रक्षित किया था । अर्थात वीरता और साहस में वह योध्दसंराव राजपुतानी एक शुर क्षत्राणी थीं।


महाराणा प्रताप को उनकी यही विशेषताएं प्रिय थीं। महाराणा प्रताप और अजबदे में कई दृष्टिकोणात्मक समानताएं थीं। अजबदे महाराणा प्रताप की राजनीतिक सलाहकार भी थीं। अजबदे ने बालकाल में बिजोलियाँ की जागिर पिता माम्रकसिंह के पश्चात सम्हालने का कार्य किया था।

जब चित्तौड़गढ़  को मुगलों ने घेर लिया था तब एक एक राजपुत सैन्य धीरे धीरे कम हो रहे थे। गढ में होने के कारण ऐसे में गढ़ से पूर्व प्रबल्य के साथ युध्द लढना कठिन था। कुंवराणी अजबदे ने ही तब विमर्श रखा था कि क्यों न अरण्य में जाकर के पुर्ण शक्तियता से मुगलों को खदेड़ा जाएं। इस प्रकार महाराणी अजबदे की भूमिका महाराणा प्रताप के जीवन में महत्वपूर्ण रही। 


अनचाह्य रूप से भी महाराणा प्रताप ने राजनीतिक कारणों से कई विवाह अवश्य किए किंतु उनकी सर्वप्रिय सहचारिणी महाराणी अजबदे थी ऐसा माना जाता है।

अजबदे की बर्बरता पूर्वक मृत्यु का समाचार समुचें राजपुताने में पहुंचा। सबके सामने अकबर की घृनित सच्चाई आई। जिसमें आक्रोश का माहौल हुआ। उस समय महाराणा प्रताप के आदर्शवादी जीवन तथा शत्रु से हुए घातक छल से उनके प्रति एकमत समर्थन में आया। अर्थात इस घटना से क्षुब्ध होकर कई राजपुत राजा महाराणा के मुक समर्थन में आ गये। कुछ सक्रिय कुछ निष्क्रिय ही सही।

जब अकबर पता चला कि महाराणा प्रताप निशस्त्र होकर गंगा में अस्थि विसर्जन के लिए चल पड़े हैं और तेरह दिनों तक सूतक काल में राजपुत अपनी परंपरा के अनुसार अस्त्र शस्त्र को छूते भी नहीं तब उचित अवसर देख कर कायर मलेच्छ अकबर महान ने उदयपुर के हल्दी घाटी की ओर सेना समेत आक्रमण करने का निश्चय किया। तथा एक हत्यारा, महाराणा प्रताप को मारने के लिए भेजा। हालांकि वह हत्यारा महाराणा प्रताप के मंत्री समय पर पहुंच कर समाप्त कर देते हैं।

इस प्रकार कुटिल कायर मलेच्छ अकबर ने कई छल पूर्वक असफल प्रयास किये महाराणा प्रताप को मारने। हर बार असफल रहा। इस तरह हमने देखा कि ऐसे ही एक प्रयास में महाराणी अजबदे पँवार की मृत्यु हुई।

महाराणा प्रताप के चित्त पर अजबदे की मृत्यु का विशेष प्रभाव हुआ। उनका वैराग्य तथा राष्ट्र अविराग परिपक्व हुआ। महाकाय ज्वाला का प्रज्वल्यमान विस्फोट हुआ जिसे हम हल्दीघाटी के रूप में देखते हैं। उन महान पुरूषोत्तम महान वीर महाराणा प्रताप ने गाजर मुली की तरह मुगलों को काटकर भीषण संग्राम किया। वे अजेय योध्दसंराव इसमें भी विजयी हुए। उन्हें और राणी अजबदे को तथा उनके आर्यातित यथार्थ को कोटी कोटी नमन।

🔥जय आर्यावर्त 🙏
✍️जय मां भारती 🚩🚩🚩🚩
✍️जय मां भवानी ⚔️⚔️⚔️⚔️⚔️

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