राणी दुर्गावती की बहन कमलावती के अपहरण की कहानी.....

राणी दुर्गावती की बहन कमलावती के अपहरण की कहानी.......


अकबर जो एक मलेच्छ विदेशी आक्रांता था और पुरे राजपुताना को साम दाम दण्ड भेद से एक करना चाहता था तथा स्त्री के प्रति आसक्त एक भेड़िया था। उस कायर ने गोंडवाना पर आक्रमण करने के बजाय राणी दुर्गावती को अपने अधिपत्य में लाने के लिए उसकी कमजोरी ढुंढी ताकि बिना युध्द काम बन जाएं।


उधर मेवाड़ में राणा प्रताप सिंह ने राजपुताना को एक करने के लिए उदयपुर में समस्त राजपुताना के राजपुत राणी राजाओं को आमंत्रित किया था जिसमें शस्त्र कला स्पर्धा और उदयपुर शस्त्रागारोद्घाटन समारोह भी आयोजित किया गया था। राणा कुंवर प्रताप सिंह उन दिनों महाराणा नहीं हुए थे बल्कि सिंहासन पर उदय सिंह ही थें। उनका का उद्देश्य था कि इस आयोजन के द्वारा विदेशी मलेच्छ आक्रांता मुगल अकबर को भारत से खदेड़ा जाए और उस हेतु सभी राजपुताना एक संगठन एक सुत्र में एकत्र हो जाए जिससे यह महान राष्ट्रीय उद्देश्य पुर्ण हो सकें। हालाँकि इस प्रयास का प्रतिफल देखे तो राणा प्रताप को निराशा ही हाथ आईं। राजपुताना तो एक हुआ नहीं फिर भी कुछ सकारात्मक लाभ मेवाड़ को हुए अवश्य थे।



(१) इसी में मारवाड़ के राव चंद्रसेन और राणा प्रताप सिंह के मध्य मित्रता हो गयी। भले ही राजनयिक संधि न हुई क्योंकि राव चंद्रसेन तो गद्दी पर नहीं थें। राणा प्रताप सिंह और राव चंद्रसेन दोनों मानस भाई हुए।

(२) दुसरा सकारात्मक लाभ यह हुआ कि राणी दुर्गावती ने राणा प्रताप सिंह को अपना भाई मानते हुए रक्षा बंधन के पर्व में राखी का पवित्र बंधन जोडा। वह भी इसी कार्यक्रम में उपस्थित हुई थी और जब सब राजा वापस जा रहे थे तब राणा प्रताप के अंतर्मन में हल्की सी निराशा थीं। यह राणी दुर्गावती को भी समझ आया। उस समय रक्षा बंधन का पर्व चल रहा था। जिसे राजनितिक रूप से एक संधि या सिधा अकबर के शत्रु राणा प्रताप से युं संबंध जोड़कर अकबर को गोंडवाना ने सिधी चुनौती दी इस दृष्टिवृत्त से देखा जाने लगा। हालाँकि तत्कालीन शत्रु वर्ग कुछ भी सोंचें। यह कार्यना राणी दुर्गावती के लिए भविष्य में लाभदायक ही सिध्द हुईं।


एक राजपुत दुसरे राजपुत को राखी बांधे अथवा कोई भी संबंध करें इससे मुगल अकबर को भय ही लगता था। वह चाहता नही था कि राजपुताना एक हो । तो उस काम को करने के लिए उसके कुछ राजपुत गद्दार समर्थन भी कर रहे थे जैसे राजा रायमल, गद्दार मानसिंह आदि आदि तथा मेवाड़ में जगमाल सिंह। इन गद्दारों के प्रयोसो से महाराणा प्रताप सिंह का राजपुताना को एक करने का लक्ष्य उस समय विफल रहा।

जब राणी दुर्गावती मेवाड़ से अपने गोंडवाना में पहुंच गई तब उसकी छोटी बहन जो उसे अत्यंत प्राण प्रिय थी उसका अकबर ने अपहरण करवाकर अपने आगरा के बंदि गृह में रखा था।
अकबर उसे तीन शर्त पर मुक्त करने की बात पत्र में कहता है :
  1. अपने राज्य को हमारे अधिन करना होगा
  2. अपने राज्य में मौजूद हिरे के खानों के मुकम्मल अख्तियारात हमें सौप दें।
  3. राणा प्रताप सिंह से अपने तमाम व्यक्तिगत और सियासी रिश्ते समाप्त कर दें।
दुर्गावती ने तीनों शर्तों को साफ इंकार कर दिया और इन्हें अपने मानस भाई कुंवर प्रताप को लिख भेजा। जिस पत्र को अजबदे ने भी पढ़ा तथा दुर्गावती की सहायता कर अपने कर्तव्यों को पुर्ण करने के लिए राणा प्रताप को अपना सहयोग दिया। 


राणा प्रताप कमलावती को छुड़ाने के लिए मेवाड़ से गोंडवाना को निकल पड़े। साथ में राणी अजबदे, अमरसिंह, शक्ति सिंह तथा आचार्य राघवेंद्र थें। मार्ग में मुगलों ने प्रताप को रोकने के लिए सैन्य भेजे थे जिन्होंने हमला किया तब उसमें शक्ति सिंह ने राणी अजबदे और अमरसिंह की रक्षा की थीं। जब सकुशल सब गोंडवाना पहुंचे मारवाड़ के राव चंद्रसेन भी यकायक गोंडवाना पहुंच गए ताकि प्रताप को इस अभियान में साथ दे सकें। योजना बनाई गई जिसमें निश्चित हुआ की राणी दुर्गावती गोंडवाना में ही रहेगी तथा अभियान में राव चंद्रसेन, आचार्य राघवेंद्र तथा शक्तिसिंह राणा प्रतापसिंह के नेतृत्व में आगरा में व्यापारी वेश में गमन करेंगे।


फिर क्या था बड़े सकुशलता से अपने एक स्त्री गुप्तचर के  सहायता से योजना को तैयार कर सभी एक आगरा दुर्ग के निकट एक सराय में ठहरें। दुसरे दिन आगरा में पहुंच गए... दुर्ग में अफरातफरी मच गई। विस्फोट किए।

जहा पर कमलावती बंदी थी वहां आक्रमण किया और उसे छुड़ा लिया। 


यह लगभग असंभव था फिर भी अपने कुशलतम वीरता और बुध्दिमत्ता का परिचय देकर इन महावीरो ने उसे ऊंचे मिनार छुड़ाया। यह सब उपक्रम अचानक तथा शत्रु के नाक के नीचे हो रहा था। कितना आत्मघाती था। अकबर को और पहले से ही इन वीरो के आने की भनक भी थी। फिर भी कड़े इंतजामात और सैन्य होते हुए छद्म वेश में प्रवेश कर उन्होंने सहस्त्रो सैनिकों के मध्य अपना अभियान किया। आगरा द्वारा पर कई तोफें उडवा दि। और विस्फोट कर वहाँ से सकुशल निकल गये। अकबर और मानसिंह कुछ भी नहीं कर पाएं और बहन कमलावती को राणा प्रतापसिंह ने छुडवाकर सभी समेत सकुशल गोंडवाना में सब पहुंचाया ।
 

वहां से राणा प्रताप अपने परिवार समेत मेवाड़ गये। शक्ति सिंह उन्हें मार्ग में मिला था। वह पिता उदय सिंह से नाराज था। उसका मन मुटाव प्रताप ने दुर कर दिया और फिर और शक्ति सिंह भी उदयपुर पहुँच गए। ताकि रूग्ण पड़ गये उदय सिंह से आत्मिक रूप से मिलकर पुराने गिले शिकवे मिटा सकें और फिर वैसा ही हुआ। 


यह असंभव अभियान बहुत कठिनता और युक्ति से संभव हुआ। यह चमत्कार शायद ही किसी वीर ने इतिहास में कर दिखाया हो कि शत्रुओं के दुर्ग में जाकर जब शत्रु सचेत था, उसे पता था कि आक्रमण होगा फिर भी सहस्त्रो सैन्यो के मध्य से सुरक्षित कमलावती को छुड़ा लाना, यह पता करना कि वह कहा पर बंदि है आदि आदि कोई कम आत्मघाती कार्य नहीं थे किंतु महाराणा प्रताप वचन के बेहद पक्के राजपूत थें। उन्होंने बहन के संकट को मिटाने सहायता मांगने पर तुरंत अपना रक्षा वचन निभाया था। राणी दुर्गावती अपने बहन को पाकर प्रताप से कृतार्थ हो गयी। समस्त राजपुताना में कुंवर प्रताप की ख्याति और शौर्य की वृध्दि हुई। इससे शत्रु अकबर और भी बौखला गया।

जय सनातन 🚩 
जय मां भारती 🚩 🚩 🚩 🚩 🚩 

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