धार का अतित और वर्तमान जिहाद
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भारतवर्ष में आज कोई भी ऐसा प्रमुख स्थान, भवन, मंदिर नहीं जहा जिहादियो ने अपनी मस्जिदों को नहीं बनाया है। उन्ही में एक चक्रवर्ती सम्राट राजर्षि भोज की बसाई धारानगरी है। धार संस्कृत नाम है । यह नगरी प्राचीनकाल में समृद्धशाली मालवा साम्राज्य की राजधानी थी । इसलिए इसमें अनेक मन्दिर और राजप्रासाद थे ।
इनमें से अधिकांश अब मस्जिदों का रूप धारण किए खड़े हैं । उनकी बाह्याकृति ही सभी को यह विश्वास दिला देगी कि इनका मूलोद्गम मन्दिरों के रूप में हुआ था । इससे भी बढ़कर बात यह है कि इस बात का लिखित प्रमाण भी उपलब्ध है । धूल में आच्छादित और दीवारों में गड़े हुए पत्थरों पर संस्कृत भाषा में साहित्य उत्कीर्ण है ।
एक सुस्पष्ट उदाहरण उस स्मारक का है जो छद्मरूप में कमाल मौला मस्जिद कहलाती है । कुछ वर्ष पूर्व जब उस भवन का कुछ अंश उखड़कर नीचे गिर पड़ा , तब उसमें प्रस्तर फलक दिखाई पड़े जिन पर संस्कृत - नाटकों के पृष्ठ के पृष्ठ उत्कीर्ण किए भरे पड़े थे । अब यह सत्य प्रस्थापित हो चुका है कि ' सरस्वती कण्ठाभरण ' नामक स्मारक संस्कृत - साहित्य के अनूठे पुस्तकालय के में था । यह पुस्तकालय इस दृष्टि से अनूठा था कि इसमें जो साहित्य संग्रहीत था , वह नश्वर कागजों पर न होकर , प्रस्तर - फलकों पर उत्कीर्ण था ।
यह उदाहरण इतिहास , पुरातत्त्व और वास्तुकला के विद्यार्थियों को इस बात के लिए प्रेरित करने की दृष्टि से पर्याप्त होना चाहिए कि वे उन सभी मध्यकालीन स्मारकों की सूक्ष्मरूप में जाँच - पड़ताल करें , जो आज मकबरे या मस्जिदों के रूप में घोषित हैं । निश्चित है कि खोज से अवश्य ज्ञात हो जाएगा कि ये प्राचीन राजपूत मन्दिर और राजप्रासाद थे ।
✍️जय मां भारती 🚩 🚩 🚩 🚩 🚩 🚩 🚩

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