आपत्तिजनक पँवारी कुल
#आपत्तिजनक_पँवारी_कुल
इस पोस्ट का उद्देश्य किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचना या किसी भी पँवारी कुल पर आक्षेप करने और किसी के मन को ठेस पहुंचाने हेतु नहीं है अपितु ना ही यह दावा करना है कि उक्त कुल "पँवारी" नहीं हो सकते बल्कि इन कुलों के आपत्तिजनक नामों को सबके समक्ष उजागर करना तथा इस पर सबका लक्ष्य केंद्रीत करना ही इस लेख का सही उद्देश्य है। जिससे इनके उक्त नामों के इतिहास का यथोचित संशोधन और विमर्श हो सकें। तथा उचित निष्कर्ष निकाला जा सकें। एक अवलोकन किया जा सकें। फिर भी यदि किसी का मन इससे विदिर्ण होता है तो मैं क्षमाप्रार्थी हूँ।
(१) 6 वीं शताब्दी के बाद जो भाषा आर्यावर्त में म्लेच्छों के साथ चली आयी,, 7 वी शताब्दी में बडे़ मुश्किल से 1% घूल मिल गई।
(२) एक एतिहासिक घटना के अनुसार सोलहवीं सदी में मेवाड़ के महाराणा उदय सिंह ने एक बार दरबार में इब्राहिम खान जो वहां राजपुताना की विख्यात कुश्ती प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए और शत्रु द्वारा आयोजित एक षड्यंत्र के अभियंता के रूप में छद्म वेश लिए आया था, उसे स्वयं पहचान लिया की वह एक दिल्ली से आया पहलवान मात्र नहीं बल्कि एक अफगान ही है। जो अनुमान बिल्कुल सत्य सिध्द हुआ था। केवल बात करने में आए शब्दों के प्रयोग द्वारा यह पहचान हुईं। यह दौर राजपुताना में मुगलों के प्रवेश पूर्व का था।
(3) जब यह भाषा ही कल की आई हुई है जिसे तुर्क, मुगल, अफगान अपने साथ ले आए तो इसके शब्द पँवार कुलों में प्रयुक्त होने से यहां तो पँवारी वंश के प्राचीन होने पर ही प्रश्न चिन्ह लग जाता है।
(4) कहा वैदिक काल जब उर्दू का जन्म नहीं हुआ था,, कहाँ सम्राट विक्रमादित्य, जिन्होंने अपने विद्वान अरब भेजें ताकि वहाँ ज्ञान सुर्य उदित हो सके जिसका आभार आप "सायर-उल-ओकुल" में देख सकते हैं। जिन्होंने हम से पाया, याद रहे हमसे वो है हम उनसे नहीं। हमारे यहाँ उनके चिन्ह होना तो हमारे अतित गौरव के लिए बड़े शर्म की बात है।
(5) ऐसे शब्द पर किसे विश्वास है कि यह पोवारी कूलों के नाम हो सकते हैं? यदि हाँ,, तो इसका अर्थ यह है कि यह "कुल" उर्दू भाषा के भारत में दाखिल होने के समकालिन मानना पडे़गा। अर्थात जब उर्दू भारत में आई तब यह कूल हुए ज्यादा से ज्यादा इनका अस्तित्व इस्लाम के भारत में पांव रखने के समकालिन माना जा सकता है। उससे अधिक नहीं। जो अन्य कुल आपत्तिजनक नहीं है केवल वे ही संस्कृत काल के माने जा सकते हैं।
1️⃣ #रहमत : रहमत अरबी शब्द है। जिसका अर्थ है दया, या मेहरबानी। क्षमा करें लेकिन यह कुल पँवारी हो इसमें आपत्ति ही आपत्ति है।
2️⃣ #तुर्क : तुर्क शब्द का साधारण सा अर्थ है तुर्कीस्थान का निवासी या मुसलमान (जैसे तुर्क नवयुवक).
तुर्क के अन्य अर्थ
⏺️.उस्मानी साम्राज्य से जुड़ी चीज़
⏺️.तुर्क लोग या (तुर्की के लोग तथा तुर्क लोग में अन्तर है)
⏺️.ईरान में अज़री लोगों को भी तुर्क कहा जाता है।
⏺️. तुरूष्क या तुर्कीस्थान के निवासी (राजतरंगिणी के अनुसार - "मलेच्छ" माने विदेशी)
3️⃣#फरिद : प्रसिद्ध मुस्लिम प्रयुक्त शब्द है। फरिद बाबा कई मौलवियों को भी कहा जाता है। नाम का अर्थ है "अद्वितीय" । यह शब्द उर्दू है। शब्द का लिंग पुल्लिंग है।
4️⃣#डाला : सुफीनामा [1] तथा रेख्ता [2] नामक प्रसिद्ध उर्दू शब्दकोश में यह शब्द आया है। अतः यह शब्द उर्दू है।
तुर्क और तुरकर मे भेद :
एक इमेज image है (👇) जो ज्यादा प्रचलित है, उसमें "तुर्क /तुरकर" लिखा है । अब तुरकर को तुर्क कहना भी तुरकर कुल के प्रति भयंकर भूल है। दोनों शब्द समानार्थी कैसे हो सकते हैं? समझ में नहीं आ रहा है कि तुर्क को तुरकर से कब जोडा गया?
🔮तुरकर शब्द की उत्पत्ति..
"तूर" यह संस्कृत शब्द है। जिसके [संज्ञा पुल्लिंग] अर्थ है
1. तुरही ; नरसिंगा ; हरकारा
2. एक प्रकार का नगाड़ा।
तो इसका अर्थ निकलता है कि जिसके लिए हरकारा या नरसिंहा बजाने, बजवाने का आदेश देने का कार्य का प्रभार रहता है ऐसे अधिकारी। जैसे राजादेश हुआ और राज्य भर में घोषणा करने आदि का कार्यभार ग्रहण करने वाले प्रयोजकिय अधिकारी यह संभवत हो.. । जिससे तुरकर शब्द बना। इसका निष्कर्ष यही अंतिम नहीं कहा जा सकता। लेकिन हमारा एक छोटा सा #निष्कर्ष है कि संस्कृत के "तुर" शब्द से ही तुरकर शब्द आया। फारसी में "तूर" शब्द का अर्थ बहादुर या महारथी होता है।
(देखे https://www.bsarkari.com/तूर-meaning-eng-163805)
ऎसा संभव कैसे हो सकता है कि उर्दू नाम के कूल पँवारों में आ जाएं ? एक अध्ययन...
(1) #कारण : #अपभ्रंश और #कन्वर्शन
(i) अपभ्रंश उसे कहते हैं जो एक भाषा के उच्चारण को शब्दों को बदलकर अर्थ कि समानता को बनाए रखते हुए बदलाव करें। हो सकता है मुगलों के बीच रहने और उर्दू के मदरसों में पढने के बाद कोई उर्दू के शब्द का प्रयोग करने लगें, और अपने पूर्वजों की भाषा छोड़कर उर्दू का प्रचलन अपना लें। और अपना धर्म भी न छोड़े। (याद रखें कि मुगल काल में हिंदू भी शिक्षा के लिए मदरसों में जाते थे,, बलपूर्वक यह कार्य चला था इसके लिए इतिहास गवाह है।)
(ii) दुसरा वर्ग वह है जिसने विवशता वश इस्लाम कबूल कर लिया। फिर उसे इस्लाम की ओर से कूल और वंश का नया नाम, औदा प्राप्त हुआ होगा। परवर्ती काल में वे स्वाधीन होने के बाद अपने पूर्वजों के विशुद्ध वंशजों में पुन्ह जा मिले होगें। संभवतः कूल यथावत रह गये हो ।
(iii) एक बात यहाँ उल्लिखित करने योग्य है कि परमार शासकों में "शाह" की उपाधि सर्वप्रथम लभद्रशाह को मिली थी। वें गढवाल के 43 वे शासक थे। बहलोल लोदी (लोदिवंश का इस्लामी शासक) ने उन्हें यह उपाधि दि थीं। फिर इतिहास गंवाह है कि सम्मान जनक इस उपाधि को कुल के भांति नाम पश्चात लगाने वाले कई परमार शासक हुए जिनकी सुची आप श्रीबैकेट या सभासार ग्रंथ में देख सकते हैं। क्यों न कुलों के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ हो?
पँवारी कूलों के यह परिवर्तित उर्दू के शब्द क्यों? इसके यहि उपरोक्त कारण संभवतः हो सकते हैं, लेकिन इसका दावा हम नहीं कर सकते। जो प्रत्यक्ष है उसको प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती, इसलिए यह तो सिध्द हो जाता है कि कूल का नाम उर्दू प्रत्यक्ष है अतः यह आपत्तिमत इन दो आपत्तियों के सर्वथा उपयुक्त रहेगा। सत्य जानने के लिए संशोधन की आवश्यकता होगी।
एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि कई बार क्षत्रियों के युध्दों में प्रचंड वीरगति से कूल समूल नष्ट हो जाया करते थे। पँवारी कुल पहले छत्तीस थे। इनकी विलुप्ति सुलभता दुर्मिलता को विवाद विसंगति और अपवादों के आयाम से होते हुए इस बात से जोड़कर अवश्य देखा जाना चाहिए और परिणाम और संभावनाओं को अनुमानित करना भी करना चाहिए। यही पँवारी इतिहास और उसमें बिखरे पन्ने जोड़ने का हमारा कर्तव्य है। सधन्यवाद 🙏🙏🙏
🔥⚔️जय मां सच्चीयाय ⚔️
🔥⚔️जय राजर्षि भोज ⚔️
#संदर्भ :
[1]https://sufinama.org/urdudictionary/?keyword=डाला&lang=hi
[2]https://www.rekhta.org/urdudictionary/?keyword=डाला&lang=hi
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