प्राचीन मां चण्डी का मंदिर "बोरोबुदुर (इंडोनेशिया)" तथा प्राचीन चोल हिंदू शैली से निर्मित श्रीविष्णु मंदिर "अंगकोर वाट (कंबोडिया)"
प्राचीन मां चण्डी का मंदिर "बोरोबुदुर (इंडोनेशिया)"
तथा प्राचीन चोल हिंदू शैली से निर्मित श्रीविष्णु मंदिर "अंगकोर वाट (कंबोडिया)" यह दोनों बौद्ध विहार के रूप में परिवर्तित हो आज पृथ्वी पर विश्व के सबसे बड़े बौद्ध विहार हैं।
दोनों "यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थल" हैं।
1️⃣#इंडोनेशिया_का_बौध्द_विहार_चण्डीका_बोरोबुदुर
(1) साक्ष्यों के अनुसार इंडोनेशिया के बोरोबुदूर का निर्माण कार्य ९वीं सदी में आरम्भ हुआ और 14 वीं सदी में जावा में हिन्दू राजवंश के पतन और जावाई लोगों द्वारा इस्लाम अपनाने के बाद इसका निर्माण कार्य बन्द हुआ। इसका निर्माण ९वीं सदी में शैलेन्द्र राजवंश के कार्यकाल में हुआ था जहां। यह माता चण्डी का मंदिर था।
(ref. Soekmono (१९७६). "Chandi Borobudur: A Monument of Mankind"p. 4.)
(2) Soekmono (१९७६). "Chandi Borobudur: A Monument of Mankind" के पृष्ठ १३ पर लिखा भी है,, ''इंडोनेशिया में प्राचीन मंदिरों को चण्डी के नाम से पुकारा जाता है अतः "बोरोबुदुर मंदिर" को कई बार चण्डी बोरोबुदुर भी कहा जाता है।'' चण्डी शब्द का अर्थ शक्ति संप्रदाय की देवी मां काली के लिए प्रयुक्त होता है। शक्ति संप्रदाय बौध्द संप्रदाय से पहले से है, वैदिक संस्कृति के भग्न होने के पश्चात से यह संप्रदाय उत्पन्न हुए यह बात तो प्रसिद्ध है ही।
(3) शैलेन्द्र राजवंश सोजोमेर्टो में प्राप्त पत्थर शिलालेखों के अनुसार वो हिन्दू थे। [देखें:Dumarçay (1991)] हो सकता है माँ चण्डी उनकी कूलदेवी थी जहाँ वर्तमान में श्रीयंत्र या चण्डीका के तांत्रिक यंत्र के जैसी प्रतिकृति के जैसा बौध्द विहार विद्यमान है। ऐसा माना जाता है कि तीनों मंदिर किसी रस्म प्रक्रिया से जुड़े थे (देखे J. L. Moens. 1951,, हालांकि प्रक्रिया क्या थी, यह अज्ञात है। तो निश्चित ही यह रश्म तांत्रिक यांत्रिक हिंदू वास्तु शैली को देखते हुए मां चण्डीका से संबंधित रही होगी यह निश्चित है।
(4) इनके निर्माण का समय वो समय था जब विभिन्न हिन्दू और बौद्ध स्मारकों का केदु मैदानी इलाके के निकट मैदानी और पहाड़ी क्षेत्रों में निर्माण हुआ। बोरोबुदुर सहित बौद्ध स्मारकों की स्थापना लगभग उसी समय हुई जब हिन्दू शिव प्रमबनन मंदिर का निर्माण हुआ। ७२० ई॰ में शैव राजा संजय ने बोरोबुदुर से केवल 10 कि॰मी॰ (6.2 मील) पूर्व में वुकिर पहाड़ी पर शिवलिंग देवालय को शुरू किया।
[संदर्भ : डब्ल्यू॰जे॰ वान डेर मैलेन (१९७७). "In Search of "Ho-Ling"" ["हो-लिंग" की खोज में]. इंडोनेशिया (अंग्रेज़ी में). २३: ८७–११२. डीओआइ:10.2307/3350886.]
(5) निष्कर्ष यह निकलता है कि जब इस विहार का निर्माण हुआ तो यहा शैव राजा तथा शैलेन्द्र राजवंश भी हिंदू ही था। प्रमुख शासक शायद बौध्द मतावलंबी हुआ और उसी ने इनका निर्माण किया लेकिन इसका कोई सांप्रदायिक विरोध किसी ने नहीं किया। दुसरा यह निष्कर्ष निकलता है कि यह पहले से ही एक हिंदू चण्डी मंदिर था। यदि ऐसा नहीं है तो बौध्द विहार के बनने बाद भी उसे चण्डी शब्द क्यों प्रयोग किया जाता था ? और यह बात तो स्वयं सिध्द है ही कि यहाँ पहले हिंदू साम्राज्य था।
2️⃣ #अंकोरवाट_विष्णु_मंदिर (#कंबोडिया)
(1) (खमेर भाषा : អង្គរវត្ត) कंबोडिया में एक मंदिर परिसर और दुनिया का सबसे बड़ा धार्मिक स्मारक है,[1]
(2) 162.6 हेक्टेयर (1,626,000 वर्ग मीटर; 402 एकड़) को मापने वाले एक साइट पर। यह मूल रूप से खमेर साम्राज्य के लिए भगवान विष्णु के एक हिंदू मंदिर के रूप में बनाया गया था, जो धीरे-धीरे 12 वीं शताब्दी के अंत में बौद्ध मंदिर में परिवर्तित हो गया था।
(3) यह कंबोडिया के अंकोर में है जिसका पुराना नाम 'यशोधरपुर' था।
(4) इसका निर्माण #सम्राट_सूर्यवर्मन_द्वितीय (१११२-५३ई.) के शासनकाल में हुआ था। यह विष्णु मन्दिर है जबकि इसके पूर्ववर्ती शासकों ने प्रायः शिवमंदिरों का निर्माण किया था। मीकांग नदी के किनारे सिमरिप शहर में बना यह मंदिर आज भी संसार का सबसे बड़ा हिंदू मंदिर है जो सैकड़ों वर्ग मील में फैला हुआ है।[2]
(5) राष्ट्र के लिए सम्मान के प्रतीक इस मंदिर को १९८३ से कंबोडिया के राष्ट्रध्वज में भी स्थान दिया गया है। यह मन्दिर मेरु पर्वत का भी प्रतीक है। इसकी दीवारों पर भारतीय धर्म ग्रंथों के प्रसंगों का चित्रण है। इन प्रसंगों में अप्सराएं बहुत सुंदर चित्रित की गई हैं, असुरों और देवताओं के बीच समुद्र मन्थन का दृश्य भी दिखाया गया है।
(6) विश्व के सबसे लोकप्रिय पर्यटन स्थानों में से एक होने के साथ ही यह मंदिर यूनेस्को के विश्व धरोहर स्थलों में से एक है। पर्यटक यहाँ केवल वास्तुशास्त्र का अनुपम सौंदर्य देखने ही नहीं आते बल्कि यहाँ का सूर्योदय और सूर्यास्त देखने भी आते हैं। सनातनी लोग इसे पवित्र तीर्थस्थान मानते हैं।
(7) ख्मेर शास्त्रीय शैली से प्रभावित स्थापत्य वाले इस मंदिर का निर्माण कार्य सूर्यवर्मन द्वितीय ने प्रारम्भ किया परन्तु वे इसे पूर्ण नहीं कर सके। मंदिर का कार्य उनके भानजे एवं उत्तराधिकारी धरणीन्द्रवर्मन के शासनकाल में सम्पूर्ण हुआ। मिश्र एवं मेक्सिको के स्टेप पिरामिडों की तरह यह सीढ़ी पर उठता गया है। इसका मूल शिखर लगभग ६४ मीटर ऊँचा है। इसके अतिरिक्त अन्य सभी आठों शिखर ५४ मीटर उँचे हैं। मंदिर साढ़े तीन किलोमीटर लम्बी पत्थर की दिवार से घिरा हुआ था, उसके बाहर ३० मीटर खुली भूमि और फिर बाहर १९० मीटर चौडी खाई है। विद्वानों के अनुसार यह चोल वंश के मन्दिरों से मिलता जुलता है।
(8) दक्षिण पश्चिम में स्थित ग्रन्थालय के साथ ही इस मंदिर में तीन वीथियाँ हैं जिसमें अन्दर वाली अधिक ऊंचाई पर हैं। निर्माण के कुछ ही वर्ष पश्चात चम्पा राज्य ने इस नगर को लूटा। उसके उपरान्त राजा जयवर्मन-७ ने नगर को कुछ किलोमीटर उत्तर में पुनर्स्थापित किया। १४वीं या १५वीं शताब्दी में थेरवाद बौद्ध लोगों ने इसे अपने नियन्त्रण में ले लिया।
(9) मंदिर के गलियारों में तत्कालीन सम्राट, बलि-वामन, स्वर्ग-नरक, समुद्र मंथन, देव-दानव युद्ध, महाभारत, हरिवंश पुराण तथा रामायण से संबद्ध अनेक शिलाचित्र हैं। यहाँ के शिलाचित्रों में रूपायित राम कथा बहुत संक्षिप्त है। इन शिलाचित्रों की शृंखला रावण वध हेतु देवताओं द्वारा की गयी आराधना से आरंभ होती है। उसके बाद सीता स्वयंवर का दृश्य है। बालकांड की इन दो प्रमुख घटनाओं की प्रस्तुति के बाद विराध एवं कबंध वध का चित्रण हुआ है। अगले शिलाचित्र में राम धनुष-बाण लिए स्वर्ण मृग के पीछे दौड़ते हुए दिखाई पड़ते हैं। इसके उपरांत सुग्रीव से राम की मैत्री का दृश्य है। फिर, बाली और सुग्रीव के द्वंद्व युद्ध का चित्रण हुआ है। परवर्ती शिलाचित्रों में अशोक वाटिका में हनुमान की उपस्थिति, राम-रावण युद्ध, सीता की अग्नि परीक्षा और राम की अयोध्या वापसी के दृश्य हैं। अंकोरवाट के शिलाचित्रों में रूपायित राम कथा यद्यपि अत्यधिक विरल और संक्षिप्त है, तथापि यह महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि इसकी प्रस्तुति आदिकाव्य की कथा के अनुरूप हुई है।[3]
#संदर्भ :
[1] "What the world's largest Hindu temple complex can teach India's size-obsessed politicians"https://scroll.in/magazine/855228/what-the-worlds-largest-hindu-temple-complex-can-teach-indias-size-obsessed-politicians
[2]http://in.jagran.yahoo.com/news/opinion/general/6_3_4949236.html
[3]https://web.archive.org/web/20090216195710/http://tdil.mit.gov.in/CoilNet/IGNCA/rktha004.htm
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