जननायक महाराणा प्रताप और महाराणी अजबदे पँवार

जननायक महाराणा प्रताप और महाराणी अजबदे पंवार

व्यक्तिगत , पारिवारिक हो या फिर सार्वजनिक जीवन , प्रत्येक मानव दोनो ही स्तर पर समन्वय साध्य कर जीवन - यापन करने का यत्न करता है । यह शाश्वत सत्य और कटुसत्य भी है । सार्वजनिक जीवन मे जितने भी महापुरुष हुए है , उनके जीवन में किसी न किसी आदर्श महिला का योगदान अवश्य रहा है । चाहे वह माता , बहन , धर्मपत्नी , पुत्री या फिर किसी अन्य रूप मे सहयोगी की भूमिका में रहा हो । इसी तरह प्रातः स्मरणीय , जन नायक महाराणा प्रताप के जीवन में भी दो निकट संबंधी आदर्श महिलाओं के त्यागमय जीवन का महायोगदान रहा है ।

प्रथम प्रताप के जन्म से लेकर युवावस्था तक , उनकी माता जैवन्ता बाई का जिन्होंने मानवीय नैतिक मूल्यो के मध्यनजर उच्चकोटि के संस्कारों के साथ अपने पुत्र का लालन पालन कर पुरुषार्थी , धैर्यवान मानव के रूप में प्रताप जैसे आदर्श व्यक्तिव को निखारा ।

दूसरा युवा अवस्था के बाद गृहस्थ जीवन मे धर्मपत्नी के रूप मे युवरानी अजबदे ने अपने पारिवारिक दायित्व को बखूबी निभाते हुए , प्रताप के सार्वजनिक जीवन में आनेवाले प्रत्येक संघर्ष और संकट की घड़ी में छाया की तरह उनके साथ चलती रही । प्रतापसिंह को प्रगाढ आत्मविश्वास के साथ मानव धर्म और राजधर्म के मार्ग पर आगे बढ़ने के लिए सदैव प्रेरित कर सहयोग करती रही । महाराणी अजबदे , आजीवन माता सिता की तरह प्रताप के जीवन के कठीन युद्ध और संघर्षकाल के दौरान भी प्रताप के साथ छाया की तरह जंगलों में भटकती रही , लेकिन प्रताप के मनोबल को तनीक भी कर्तव्य एवम् न्याय के मार्ग से विचलित नहीं होने दिया ।

अब मैं महाराणी अजबदे के वास्तविक चरित्र के विषय मे चर्चा करना उचित समझता हूँ । अजबदे पंवार बिजोलियां के राव मामरख की पुत्री और राव आसखन की पोती ।

अजबदे और युवराज प्रतापसिंह का विवाह 1557 ई . में सम्पन्न हुवा और 1559 ई . में मेवाड़ की वंशबेला पर भँवर अमरसिंह का जन्म हुआ । कृष्ण भक्ति का अंकुरण तो उनकी बाल्यावस्था में ही अंकुरित हो गया था , लेकिन भक्ति पथ पर अग्रसर होने का मार्ग शादी होकर चितौड़ दुर्ग पर आने के बाद प्रस्फुटित होने लग गया था । क्योंकि आप की शादी के महज बाईस वर्ष पूर्व ही वैराग्यमूर्ति मीराबाई चितौड़ दुर्ग छोड़कर गई थी । चितौड़ दुर्ग के राजमहल , लोक वार्तालाप , मीरा के भक्ति स्थल , मीरा मंदिर का कण -कण , पल -पल युवरानी अजबदे को मीरा के कृष्ण प्रेम का आभास करा रहा था । इसी प्रकार के चिंतन और पारिवारिक जीवन के चलते 9 वर्ष अंतराल के बाद , अक्टूबर - नवंबर 1566 ई . में एक समय ऐसा आया कि ब्रज से गोसाई श्री विठ्ठल नाथ जी , गुजरात यात्रा पर मेवाड़ के मार्ग से पधारे तब महाराणा उदय सिंह जी , पुत्री किकाबाई और युवरानी अजबदे के साथ दर्शन करने पधारे । उस समय गौसाई जी से अजब दे ने ब्रह्म संबंध ( कृष्ण भक्ति ) की दीक्षा लि थी । उस समय सिंहाड़ जैसे रमणीय स्थल को देखकर गौसाई जी ने बाबा हरिवंश जी को आज्ञा की , कि इस रमणीय स्थल पर श्री नाथ जी किसी समय यहां पधार कर बिराजेगें , लेकिन हमारे सामने तो गिरिराज छोड़कर नही पधारेंगे । दुसरे दिन जब गौसाई जी प्रस्थान करने वाले थे , तब अजब दे दर्शन करने पधारे , उस समय , अजबदे को गौसाई जी में कृष्ण के दर्शन होने लगे , अजब दे की मनोदशा को समझते हुए गौसाई जी ने कहा कि श्री नाथ जी आप को नित्य दर्शन देंगे । और ऐसा ही होता रहा । नित्य दर्शन के समय अजब दे ने श्री नाथ जी से आग्रह किया कि आप यहां , मेवाड़ कब पधारेंगे , तब बताया कि जब तक श्री विठ्ठलनाथ जी पृथ्वी पर है , तब तक नही ? बाद में कभी , और जब गौसाई श्री विठ्ठलनाथ जी पुनः जन्म लेगें तब मै वापस मेवाड़ छोड़कर गोवर्धन पर्वत के लिए प्रस्थान करूंगा । इस घटना के ठीक 116 वर्ष बाद महाराणा राजसिंह के समय 1672 ई . में श्री नाथ जी मेवाड़ पधारे और युवरानी अजब दे के साथ वचन बद्धता को सार्थक किया ।

आज प्रभू श्री नाथ जी सिंहाड़ गांव ( श्री नाथद्वारा ) में

महाराणी अजब दे पंवार के भक्ति स्थल पर बिराज मान है ।

एक दुसरे उदाहरण के साथ मै पाठकों को यह विश्वास दिलाना चाहूँगा की आध्यात्मिक विश्वास और चेतना के सामने दुनिया के बड़े से बड़े संकट संघर्ष के साथ ढेर हो जाते है । महाराणी अजबदे के कारण प्रताप के सामने आनेवाली हर कठिनाई का दौर धैर्यपूर्वक संघर्ष के साथ गुजर गया ।

इसी आत्म विश्वास के चलते , हल्दी घाटी युद्ध 1576 ई . के बाद 1578 ई . में झाला मान उर्फ झाला बीदा के नाम पर बसे बदराणा ( अपभ्रंश ) गांव में हरिहर , भगवान विष्णु और भगवान् शिव का चतुर्भुज युगल स्वरूप जो काले पत्थर का साढे चार फीट उंचाई का है , जिसकी मंदिर बना कर प्राण प्रतिष्ठा महाराणी अजबदे पंवार और महाराणा प्रताप के हाथों से संपन्न हुई ।

इस मेवाड़ की पुण्य धरा पर धर्म और अन्याय के विरुद्ध संघर्ष की दोनो धाराएँ वर्षों तक एक साथ बहने को बाध्य हो गई । यही मेवाड़ भूमि की वास्तविक पहचान है ।

चतुर्भुज मूर्ति 

                    

                    एकलिंगी जी का विग्रह 


सनातन संस्कृति के प्रभाव और इन्ही सद्कर्मो की , यहां के मानव की समाजिक अवधारणा एवम् जीवनशैली के कारण मेवाड़ के गौरवशाली इतिहास की पहचान बन पाई ।

पुण्यैन हनन्तै व्याधि , पुण्यैन हनन्तै ग्रहाः ।

पुण्यैन हनन्तै शत्रु , यथौ धर्म स्ततो जयः ॥

✍️जय मां भारती 🚩 🚩 🚩 🚩 🚩 🚩

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