रामायणकालीन अस्त्र शतघ्नी
#रामायणकालीन_अस्त्र_शतघ्नी...
जिस प्रकार वर्तमान के दो प्रबलतम राष्ट्र रशिया और अमेरिका एक - दूसरे को विरोधी समझकर जिस प्रकार एक - दूसरे के विरुद्ध विविध प्रकार के शस्त्रास्त्र निर्माण करने के होड़ में जुटे थे और जुटे हैं उसी प्रकार प्राचीनकाल में देव (यानी 'सुर') और दैत्य ( यानी 'असुर' ) उनकी भी वापस की होड़ थी और शत्रुत्व था । उस समय भी बड़े - बड़े विचित्र आयुध , प्रभावी शस्त्रास्त्र , सारे विश्व का तेजी से भ्रमण कर सकने वाले यान और तुरन्त एक - दूसरे से वार्तालाप करने के माध्यम उपलब्ध थे ।
रामायण , महाभारत और पुराणग्रंथों में उनका उल्लेख है । प्राचीन सागरीयुत का रामायण के अयोध्याकाण्ड के सर्ग ८४ के पाठवें प्रलोक में उद्धृत वर्णन देखें :-
नौवां शतानां पंचान्सं कवर्तानां शतं शतम् ।
सन्नद्धाना तथा यूनां तिष्ठन्त्वत्यभ्यचोदयत् ।।
यानी शत्रु के नौकादल का प्रतिकार करने के लिए सैकड़ों कैवर्त युवक तैयार रहें ।
#आग्नेयास्त्र : रामायणकालीन परिभाषा में तोपों को ' शतघ्नी ' यानी ' सैकड़ों व्यक्तियों का अन्त करने वाली ' कहा करते थे ।
इनका उल्लेख अनेक श्लोकों में पाया है । शतघ्नी लोहे की होती थी । सुन्दरकाण्ड में शतघ्नी का आकार वृक्ष के तने जैसा कहा है । किलों में स्थान - स्थान पर तोपें लगाई जाती या मैदानी रण में तोपगाड़ियां चलाकर लाई जातीं । तो चलती थीं तो उनसे बड़ी गर्जना होती थी । ऐसे वर्णनों से स्पष्ट है कि तोप का ही प्राचीन नाम #शतघ्नी था ।
यूरोपीय शब्द fire arm आग्नेयास्त्र का ही अनुवाद है । प्राचीन संस्कृत ग्रन्थों में ऐसे बमों का वर्णन है जो फेंके जाने के पश्चात् उसमें से कई छोटे बम या राकेट्स बिखरकर शत्रु पर जा पड़ते थे ।
' युद्ध ' इस अर्थ का आंग्ल शब्द ' वार ' (war) करना इस दृष्टि से संस्कृतमूलक ही है ।
पाश्चात्य देशों के यूरोपीय ईसाई और अरब , ईरानी आदि मुसलमान लोगों के पूर्वज महाभारतीय युद्ध के पश्चात् के अंधकार सदृश अज्ञान - युग में संस्कुत - विद्या से वंचित रहने के कारण पिछड़ गए । अत : महाभारतीय युद्ध में जो राकेट आदि प्रक्षेपणास्त्र छोड़े गए तत्पश्चात् सन् १८०७ में कोपनहेगन नगर घेरे में यूरोप में रॉकेट का प्रथम बार प्रयोग किया गया । आजकल पाश्चात्य वैज्ञानिक जो नये - नये शस्त्रास्त्र बना रहे हैं , वह एक तरह से प्राचीन अस्त्र - विद्या का पुनरुत्थान ही है ।
विविध शस्त्रास्त्र बनाने के प्राचीन शास्त्र का नाम धनुर्वेद था । अतः ' धनु ' शब्द का अर्थ केवल वाणक्षेपक धनुष समझना योग्य नहीं । शत्रुओं की धज्जियाँ उड़ाने के लिए जो शस्त्रास्त्र बनाने का तन्त्र और विज्ञान या उसे धनुर्वेद नाम दिया गया था ।
वातारण के विविध स्तरों में विषैली वायु छोड़कर भी शत्रु सैनिकों का दम घुटाया जाता था । उन अस्त्रों से वातावरण में अग्नि , धुप्रां , पानी , विजली , रोगजन्तु , सर्प आदि छोड़कर भी शत्रु को प्राक्रान्त किया जाता था ।
वायुयुद्ध और वायुसन्देश आदि वैज्ञानिक क्षमता रामायण काल में भी उपलब्ध थी । विभीषण जब स्वसैनिकों के साथ रामचन्द्रजी की छावनी पर अपने विमान उतरवाना चाहता था तो उतरने की अनुमति मांगनेवाले उनके सम्भाषण प्राकाशस्थ उड़नेवाले विमानों से , भूमि पर के छावनी के बीच होना तभी सम्भव था जब वर्तमान wireless और electronic आदि माध्यमों से तत्काल सम्भाषण व्यवस्था तब भी संभाव्य थी ।
✍️जय मां भारती 🚩 🚩 🚩 🚩 🚩

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