रोम और इजिप्त के वैदिक सम्राट

 रोम_तथा_इजिप्त_के_वैदिक_सम्राट...




टालियन जनता में प्रचलित धारणानुसार भेड़िये के दूध पर पले दो मानवीय शिशु रोमस और रोम्युलस ने रोम नगर का निर्माण किया । इस ऊट - पटांग धौंसबाजी की जितनी भर्त्सना की जाए उतनी कम है ।


      एडवर्ड पोकॉक के ग्रन्थ में पृष्ठ १६६ पर रोम के बारे में Niebuhr का कथन उद्धृत किया है ।


     Niebuhr कहते हैं कि " रोम यह नाम लैटिन भाषा में नहीं आता । उसी प्रकार Tiber , यह वहाँ की नदी का नाम कैसे पड़ा , इसका भी लैटिन भाषा द्वारा पता नहीं लगता । नव अग्नि ( प्रज्वलन ) का जो त्योहार मैक्सिको के लोग मनाते हैं उससे उनका एक नया समय ( वर्ष ) आरम्भ होता है । उससे रोमन लोगों के अर्थात् प्राचीन एट्र स्कन सभ्यता के लोगों के एक त्योहार का स्मरण होता है । उस त्योहार में विशेषत : रोम नगर में मार्च मास के प्रथम दिन Vista के मन्दिर में एक नयी अग्नि प्रज्वलित करने की विधि होती थी । "


#विश्लेषण :


     Niebuhr के Rome नाम के ग्रन्थ में खण्ड १ , पृष्ठ २८१ पर इस पर्व का उल्लेख है । '' राम '' नाम इटली की लैटिन भाषा का नहीं है , यह विशेष ध्यान देने लायक बात है । होगा भी कहाँ से जब वह संस्कृत , वैदिक परम्परा द्वारा आया हुआ नाम है ।


   टायबर नाम भी 'त्रिपुरा' शब्द है यह हम पहले कह चुके हैं । नवाग्नि प्रज्वलन का उल्लेख भी रोम नगर में प्राचीनकाल से मनाए जाने वाले होलिकोत्सव का ही साक्षी है ।


  Vista जो नाम पीछे आया है वह विष्णु का अपभ्रंश है । विष्णु को अर्पण की हुई कुमारियों को रोमन परम्परा में vestal virgins यानी विष्णु उर्फ विष्टु की कुमारीयां कहा जाता था। भारत जैसी ही देवदासी प्रथा रोम में होना भी वहां की प्राचीन वैदिक संस्कृति का और एक प्रमाण है।


#रोम_तथा_ईजिप्ट_के_वैदिक_सम्राट :


पोकॉक के ग्रन्थ में पृष्ठ १८०-१८१ पर लिखा है कि :


         "ईजिप्त की तरह रोम में भी सूर्य और चन्द्रवंशी क्षत्रिय आ बसे थे । अतः दोनों में पुरोहितों के द्वारा बड़े समारम्भपूर्वक विविध धार्मिक विधि - विधान किए जाते थे । वहाँ सूर्य कुमारियों की भी प्रथा होती थी । वे सूर्य को अर्पण की हुई कन्याएँ थीं । उन्हें बाल्यावस्था में ही उनके कुटुम्ब से अलग कर शन्वंत ( Convent ) आश्रमों में रखा जाया करता । वहाँ उनका पालन - पोषण एक प्रौढ़ महिला की देख - रेख में होता रहता । उस पालनकर्बी को Mama Conas ( यानि माता कन्या ) अर्थात् ' कन्याओं की आश्रमी माता ' कहा जाता था । वे प्रौढ़ स्त्रियाँ भी वैसे ही आश्रम में पली होती थीं । कितने आश्चर्य की बात है कि अमेरिका के प्राचीन निवासी , रोम की ईसापूर्व परम्पर । और ( विद्यमान ) कैथलिक ईसाई परम्परा में कितनी गहरी समानता है । "


      अमेरिका खण्डों के मूल निवासियों में भी देवदासी प्रथा होती थी इसका उल्लेख Prescott द्वारा लिखे Peru नामक ग्रन्थ के खण्ड के पृष्ठ १०५ पर आया है । कहाँ भारत , कहाँ रोम और कहाँ पेरू और कहाँ रोम की आधुनिक ईसाई पम्परा ? किन्तु इन सब में देवदासियों की प्रथा होना क्या विश्व भर की वैदिक परम्परा का सशक्त प्रमाण नहीं है ? उन अर्पित कन्याओं की देखभाल करने वाली प्रौढ़ महिला को महाकन्या ( मामा कन्या ) कहा जाना भी सिद्ध करता है कि प्राचीनकाल की जागतिक व्यवहार की भाषा संस्कृत ही थी।


#कॉन्व्हेंट_विद्यालय :


        #Convent शब्द आजकल बड़ा प्रचलित है । कॉन्व्हेंट यानि ( ईसाई ) धर्माधम । उनके चलाए हुए विद्यालयों को कॉन्व्हेंट विद्यालय ( Convent Schools ) कहते हैं । वस्तुत : Convent School यह शन्वत शाला ऐसा संस्कृत शब्द है । Convent शब्द में 'C' का मूल उच्चार ' श ' कायम कर देखें तो वह 'शन्वंत' शब्द 'श ' यानि मंगल । जैसे 'शंकर' यानि 'मंगल करने वाला' । शन्नो देवी यानि " हमारा मंगल करने वाली देवी " । अत : गुणवन्त जैसे ' श न्वंत ' यह शुभ स्थान , मंगल स्थान यानि संन्यासियों के आश्रम का द्योतक संस्कृत शब्द है । किन्तु विकृत यूरोपीय परिपाटी में उसका उच्चार शन्वन्त की बजाय कॉन्व्हेंट किया जा रहा है । इसी प्रकार ' शाला ' इस संस्कृत शब्द को विकृत कर School ( स्कूल ) लिखा जाता है ।


✍️ जय मां भारती 🚩 🚩 🚩 🚩 🚩

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

ओ३म् 🕉️

महाराणा प्रताप के दरबारी पं. चक्रपाणि मिश्र: ज्ञान विज्ञान के एक विस्मृत एक अपरिचित एतिहासिक पात्र......

नशेड़ी ओशो के अनुसार बच्चे खुलकर नशा करें...