भारशिव नागवंश का इतिहास
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हिन्दू साम्राज्य का पुनर्गठन चौथी शताब्दी में गुप्तकाल के आरम्भ से नहीं माना जा सकता है और न वाकाटकों से ही , जो उनसे सौ साल पहिले हुए थे वरन् भारशिव नागों से माना जायगा जो उनसे भी पचास साल पहिले हुए थे । यदि भारशिव नाग न होते तो वाकाटक कहाँ से आते और यदि भारशिव नाग और वाकाटक न होते तो गुप्त साम्राज्य कल्पनातीत होता । ताम्रलेखों , शिलालेखों और सिक्कों से इन दोनो साम्राज्यों का इतिहास भली भांति प्रमाणित है । प्रचुरता से उपलब्ध पौराणिक सामग्री द्वारा भी इस काल की ऐतिहासिकता पुष्ट होती है ।
प्रसिद्ध इतिहासकार ब्रिटिश विसेन्ट स्मिथ ने वाकाटको और भारशिवों पर एक पंक्ति भी नही लिखी । उनकी यह धारणा कि भारतीय इतिहास मे आंध्रवशीय राजाओ के बाद और गुप्तो के उदय के बीच का समय अन्धकार पूर्ण है एकदम निराधार और भ्रान्तिपूर्ण है । तथ्य तो यह है कि इस समय पर बडा विस्तृत इतिहास मिलता है । लगभग विक्रम संवत् प्रवर्तक सम्राट विक्रमादित्य भी इसी युग के (दक्षिणोत्तर) है। यह वह युग है जब रोम के शासक को परास्त कर विक्रमादित्य प्रमर ने उज्जयिनी के गलियारों में घुमाकर छोड़ दिया था। यह वह युग है जिसे उन्होंने अंधकारमय कहा, यह वह युग है जब कभी शालिवाहन ने विश्व विजय किया, इस युग का वर्णन करने यवन अंग्रेजो म्लेच्छों शको की औलादो को शर्म या लज्जा तो जरूर आएँगी ही... तभी तो मालवगणमुख्य विक्रमादित्य पर भी कुछ नहीं लिखा स्मिथ ने....
भारत का साम्राज्य समुद्रगुप्त से पहिले -६० वर्ष - तक वाकाटकों के हाथ मे रहा परन्तु वाकाटको को यह साम्राज्य भारशिवो से मिला था । वाकाटक सम्राट प्रवरसेन के पुत्र गौतमी - पुत्र का विवाह भारशिव सम्राट भवनाग की , पुत्री के साथ हुआ था । यह वैवाहिक सम्बन्ध उस , इतिहास को बड़ी महत्वपूर्ण , घटना थी । इससे दो राजबसो को मैत्री परिषद हुई और तज्जन्य सम्मिलित प्रयास के -आगे अहिन्दू कुषाण , साम्राज्य अपने आपको सम्हाल न सका और छिन्न - भिन्न हो गया । इस विवाह - सम्बन्ध का उल्लेख सभी वाकाटक राजवंश के लेखो मे उपलब्ध होता है । भारशिव लोग मूलतः बुंधेलखण्ड के निवासी थे ।
कौशाम्बी और काशी के मध्य किसी स्थान से इनका निकास था । वाकाटक लोग वागाट या वाकाट से जो बुन्देलखन्ड में भोछड़ा के उत्तरी भाग में एक ग्राम है निकले समय के प्रतीत होते हैं । अतः इनको भारशिवों का पड़ोसी ही समझना चाहिये । भारशिव लोग यपेलवण्ड से विन्ध्याचल होकर गंगातट पर पहुंचे । वहां उन्होंने काशी में दरा अश्वमेध यज्ञ किये । अश्वमेघ या तो हिन्दूशास्त्रों के विधान के अनुसार राजनीतिक विजयो के उपलक्ष में होते हैं । भारशिवों ने कुपाणी पर मार्मिक प्रहार किये और उनका आर्यावर्त से उन्मूलन कर दिया , इसी उपलक्ष में उन्होंने काशी में गंगातट पर दस अश्वमेघ यज्ञ किये थे और अपना राज्या भिषेक गंगा के पवित्र जल से किया था । जहाँ पर भारशिवों के यज्ञ संपन्न हुए थे वह स्थान उसी समय से दशाश्वमेध घाट कहलाता है ।
भारशिवों ने जो कार्य उठाया वह अत्यन्त गौरवपूर्ण था । वे हिन्दू साम्राज्य के पुनसंस्थापक थे । उस समय हिन्दुओं पर शकों का राज्य या जिसको इतिहास में कुषाण साम्राज्य वोलते है । उस समय हिन्दूधर्म त्रस्त था । कुछ इतिहासकारों का मत है कि आरम्भ में शकों ने हिन्दुओं पर बड़े अत्याचार किये , उन्होंने अनेक ब्राह्मणों की हत्या की , मन्दिरों को ध्वस्त किया । उनकी पाकशाला मे सांडो को पकाया जाता था ।
अल्बेरुनी का कहना है कि कुषाण लोग कहा करते थे कि हम लोग देवपुत्र हैं , हिन्दुओं पर राज्य करने का हमें ईश्वर की ओर से अधिकार मिला हुआ है । वे लोग मध्य एशिया के तुखार थे । ये बड़े नृशंस थे और इनका शासन भी कठोर था । कुषाण साम्राज्य उस समय उस सारे प्रदेश पर था जिसको आजकल हम उत्तर - प्रदेश और बिहार कहते हैं । उस पर उनको सत्ता और अधिकार सुदृढ़ था । इस प्रदेश में भारशिवो ने कुषाणों पर जो चोट लगाई उससे वे वहाँ से हटने को बाध्य हो गये ।
दक्षिणापथ के सातवाहन सम्राट पश्चिम शक - शक्ति से युद्धरत रहे परन्तु वे भी उतनी सफलता प्रास न कर सके थे जो भारशिवों ने उत्तरी भारत में की थी । भारशिवो के आराध्यदेव शिव थे । जिस प्रकार शिवजी का जीवन योगियों और सन्यासियों का सा था उसी प्रकार भारशिवों का शासन योगियों का सा सरल था , उनके शासन - सूत्र अथवा रहन - सहन में किसी प्रकार की दिखावट न थी । उन्होंने संहारकर्ता शिव को अपना इष्ट माना । उनको सर्वत्र शिव ही शिव दिखाई देते थे । उन्होंने अपनी गतिविधियों से देश के राज नीतिक वातावरण को शिवमय कर दिया । उन्होने एक शक्ति सम्पन्न अहिन्दू साम्राज्य को ध्वस्त किया । दस अश्वमेघ यज्ञ किये । कुषाणो की सिक्का पद्धति की अवहेलना करके हिन्दू रीति से सिक्कों का निर्माण स्वय किया और दूसरों से कराया । उन्होने हिन्दू प्रजातन्त्रो को स्वतन्त्र किया । भारत केप्राचीन गणराज्यों को उनकी स्वाधीनता प्राप्त कराई । उन्होंने गणराज्यों को प्रत्येक प्रकार की सामथ्र्य और क्षमता प्रदान की जिसके कारण वे चाहे जिस प्रकार अपने सिक्के चला सकते थे । उन्होने अपने चारो ओर गणराज्य स्थापित किये । जिस प्रकार शिवजी अपने गणों से घिरे रहते हैं उसी प्रकार यत्र - तत्र बिखरे हिन्दू प्रजातन्त्र इनके गण थे और ये उनके सघ मुख्य अथवा संघनेता थे । वे स्वतन्त्रता का प्रचार और उसकी रक्षा करते थे । इनका जीवन योगियो और सन्यासियों जैसा था । उनके समय में बौद्ध धर्म पतनोन्मुख हो गया था । अब भिक्षुओं को अत्याचारियों के रूप में देखा जाता था ।
डाक्टर काशीप्रसाद जी जायसवाल ने अपनी पुस्तक ' अन्धकार युगीन भारत ' में उस समय के बौद्ध धर्म की दशा का बड़ा सुन्दर चित्र खीचा है ।
वे लिखते हैं , " उन दिनों बौद्ध धर्म मानों एक अत्याचारी वर्ग का पोप्यपुत्र बना हुआ था और जब उस वर्ग के अत्याचारों का निर्मूलन हुआ तब उसके साथ - साथ उस धर्म का अवश्य पतन हुआ होगा । बौद्ध धर्म उस समय राष्ट्रीयता के उच्चतल से पतित हो गया था । कुशनो के हाथ मे पडकर बौद्धधर्म ने अपनी आध्यात्मिक स्वतन्त्रता नष्ट कर दी और वह एक राजनीतिक साधन बन गया था । "
नागराज वंश का उत्थान सर्व प्रथम विदिशा में हुआ था । पुराणों मे विदिशा के नाग राजवंश को दो भागों में विभाजित किया गया है ।
( १ ) शुङ्गकालीन नाग राजागण
( २ ) शुङ्गोत्तर कालीन नाग राजे ।
पुष्यमित्र शुङ्ग का राज्यारोहण १५८ ई ० पू ० हुआ था । शुङ्गकाल ११२ वर्ष और कण्व वंश का काल ४५ वर्ष समझा जाता है । इस प्रकार १५७ वर्ष उपरान्त ३१ ई ० पू ० वर्ष तक शुङ्ग दौर कण्व दोनों काल समाप्त हो चुके थे । शुंगकालीन नाग - राजाओं का तिथिक्रम इस प्रकार है ।
(1) शेप ई ० पू ० ११०-६०
(2) भोगिन् ई ० पू ० ६०-८०
(3) रामचन्द्र ई ० पू ० ८०-५०
(4) धर्मवर्मन् ई ० पू ० ५०-४०
(5) वंगर
उक्त ५ नाग राजाओं ने ई ० पू ० ३१ तक विदिशा में राज्य किया । इन नाग - राजाओं को शुंगकालीन कहा जाना चाहिये । सन् ३१ ई ० पू ० के बाद के नाग राजागण ने कदाचित् पद्मावती को अपनी राजधानी बनाया था । इन राजाओं में सर्वप्रथम भूतनन्दी हुआ ।
भागवत के अनुसार भी भूतनन्दी के समय से इस वंश की पुनः स्थापना हुई । शुगोत्तरकालीन नाग राजाओ के नाम के पीछे नन्दी शब्द जुड़ा हुया है । वायु पुराण में इन दश नाग राजाओ को वृष अर्थात् शिव का नन्दी कहा गया है । यही कारण है कि उनके नामों के अन्त मे नन्दी शब्द आया है ।
ऐसा प्रतीत होता है कि भारशिव उपाधि का सम्बन्ध भी वृप और नन्दी आदि उपाधियों पर ही आधारित है । सन् ३१ ई ० पू ० से ७८ ई ० तक शिलालेखों और सिक्कों के आधार पर भूत नन्दी से लेकर भूतनन्दी सहित ८ नाग राजाओं का उल्लेख मिलता है । उनके नाम क्रमशः इस प्रकार हैं-
( १ ) भूतनन्दी
( २ ) शिशुनन्दी
( ३ ) यशः नन्दी
( ४ ) पुरुपदात
( ५ ) उत्तमदात
( ६ ) कामदात
( ७ ) भवदाल
( ८ ) शिवनन्दी या शिवदात ।
उपरोक्त वर्णन से विदित होता है कि सन् ११० ई ० पू ० से ७८ ई ० तक लगभग दो सौ वर्षों मे १३ नाग राजाओ ने राज्य किया जिनमें पहिले पांच ने विदिशा को और दूसरे आठ ने पद्मावती को अपनी राजधानी बनाया । भूतनन्दी के वंशज राजा शिवदात अथवा शिवनन्दी के समय तक और उसके बाद लगभग आधी शताब्दी तक अपनी राजधानी पद्मावती में राज करते रहे । अन्तिम राजा शिवनन्दी के शासनकाल के उपरान्त कुछ वर्ष बाद पद्मावती मे कुषाण क्षत्रपो का शासन स्थापित हो गया । उस काल मे नागों ने विदिशा और पद्मावती मे रहना छोड दिया और वहां से मध्य प्रदेश मे चले गये । उन्होंने वहां की पहाडियो में सुरक्षित रहकर पचास वर्ष तक राज्य किया । उनका उस काल में मध्य - प्रदेश के पुरिका और नागपुर नन्दिवर्द्धन नामक स्थानों में राज्य था । पद्मावती में कुषाण क्षत्रप विन्वस्फाणि का शासन हो गया जो बढा शक्तिशाली था और जिसने अनेक युद्धो के उपरान्त बिहार तक अपना आधिपत्य स्थापित कर दिया था । नागों के इस प्रकार मध्यप्रदेश को निष्क्रमण करने से इतिहास पर बडा प्रभाव पड़ा । इससे मध्यप्रदेश के विन्ध्यवर्ती आर्यावर्त का बुन्देलखण्ड से घनिष्ठ सम्बन्ध हो गया ।
बुन्देलखण्ड का एक भाग और दक्षिणापथ के नागपुर वाला भाग दोनो मिलकर एक हिन्दुस्तानी प्रदेश बने रहे हैं वहाँ के निवासियो की भाषा और संस्कृति पूर्णांश मे उत्तर भारत की हो गई । नागो के साठ वर्ष तक वहां रहने का ही यह ऐतिहासिक परिणाम है । कुषाण कालीन राज्यापहरण के कारण ही नागो को एक प्रकार से निर्वासित होकर यहाँ रहना पड़ा था । उन्होंने एक ओर तो नागपुर से पुरिका होशगाबाद तक अपना सम्बन्ध बराबर स्थापित रक्खा , बघेलखण्ड रीवा से भी बरावर वे मिले ही रहे । इसी बोलवण्ड से होते हुए उनके परवर्ती भारशिव नाग गंगातट पर पहुंचे थे ।
भारशिव नागों को अपने अभियान में बड़ी सफलता मिली । उन्होने कुपाण साम्राज्य पर करारे प्रहार करके उसे हिला ही नही अदपस्थ भी कर दिया । अपनी महान् विजयों के उपलक्ष में उन्होने अश्वमेध यज्ञ भी किये । उनकी सफलताओं का उचित रूप से मूल्याङ्कन करने के लिए भारत की तत्कालीन राजनीतिक स्थिति का कुछ दिग्दर्शन कराना आवश्यक है ।
🔮सन् ७८ ई ० में इस देश में जो शक शासन ( कुषाण राज्य ) प्रचलित था उसकी विशेषता का वर्णन #अल्बेरूनी ने इस प्रकार किया है , "यहाँ जिस शक का उल्लेख है उसने आर्यावर्त में अपने राज्य के मध्य में अपनी राजधानी बनाकर सिन्धु से समुद्र तक के प्रदेश पर अत्याचार किया था । उसने हिन्दुओ को आज्ञा दे दी थी कि वे अपने आपको शक ही समझें और शक ही कहे , इसके अतिरिक्त अपने आपको कुछ न समझें या न कहें । "
🔮#गर्ग_संहिता में भी प्रायः इसी प्रकार की बात कही गई है - -
" शकों का राजा बहुत ही लोभी , शक्तिशाली और पापी था । इन भीषण और असंख्य शको ने प्रजा का स्वरूप नष्ट कर दिया था और उनके आचरण भ्रष्ट कर दिये थे । "
🔮#गुणाढ्य ने कथा-सरित्सागर में कहा है
" ये म्लेच्छ लोग ब्राह्मणो की हत्या करते हैं और यों और धार्मिक कृत्यों में बाधा डालते हैं । भला ऐसा कौन सा अपराध है जो ये दुष्ट नहीं करते । "
🔮#महाभारत के वन पर्व में भारत के शक , पुलिन्द , यवन , कांभोज , वाल्हीक , शूर , आभीर राजाओ के शासन का उल्लेख है । उस वर्णन की बहुत सी बाते शकों के राज्य से मिलती - जुलती है ।
देश की राजनीतिक स्थिति के इस संदर्भ में नाग सम्राट उस आन्दोलन के नेता बन गये थे जो कुषाणों के विदेशी शासन से स्वतन्त्रता प्राप्त करने को उठा था । नाग सम्राटो ने गणराज्यों का संरक्षण और सम्बद्धन किया । इन प्रजातन्त्रों का विस्तार गंगा की तराई के पश्चिम में एक ही विस्तृत क्षेत्र में था । पूर्वी और पश्चिमी मालव प्रदेश , गुजरात , आभीर राजपूताना और पूर्वी पंजाब का एक अंश जो मद्र कहलाता था ये सब भू भाग प्रजातन्त्रों मे स्थित था । इनके अतिरिक्त यौधेय और मालव गण भी महत्वपूर्ण प्रजातन्त्र समझे जाते थे । समुद्रगुप्त के उदय से पूर्व ये सब प्रजातन्त्र स्वतन्त्र थे । ये स्वतन्त्रता उन्हे नागो ने ही दिलवाई थी ।
पुराणों के अनुसार नागो ने पद्मावती कान्तिपुरी और मथुरा मे सात पीढियो तक राज्य किया । नागो की इन शाखाओं के प्रमुख राजाओं का तिथि और वंश क्रमानुगत विवरण इस प्रकार है ।
*️⃣ कान्तिपुरी नाग - शाखा
[1] नव नाग ( भारशिन वंश का संस्थापक ) सन् १४०-१७०ई ०
[2] वीरमेन ( जिसने मथुरा और पद्मावती की शाखाओं को भी संस्थापित किया ) सन् १७०-२१०ई ०
[3] हयनाग सन् २१०-२४५६०
[4] प्रयनाग सन् २४५-२५०ई ०
[5] यहिन नाग सन् २५०-२६.ई .
[6] भीम नाग चरज नाग ( इसके काल में वाकाटकों का प्रभुत्व २८४ ई . में आरम्भ हो गया था ) सन् २६०-२६० ई ०
[7] भवनाग ( इसकी कन्या वाकाटक सम्राट प्रवरसेन के पुत्र गौतमी पुत्र को ब्याही थी ) सन् २६०-३१५ ई ०
[8] रुद्रसेन ( पुरिका में ) सन् ३१५-३४४ ई ०
[9] पद्मावती नाग - शाखा ( टाक वंश ) सन् २१०-२३०ई ० स्कन्द नाग सन् २३०-२५०ई ०
[10] वृहस्पतिनाग सन् २५०-२७० ई ० व्याघ्र नाग ( इसके काल में वाकाटकों का प्रभुत्व आरम्भ हो गया ) सन् २७०-२६०ई ०
[11] देवनाग सन् २६०-३१०ई ० सन् ३१०-२४४ ई ० -मथुरा शाखा के अधिपति नाग राजाओ के नाम अज्ञात हैं । सन् ३४४ ई ० के बाद के नाग राजा वाकाटकों के करद सामन्त एवं प्रतिनिधि रूप शासक थे । उनमें अहिच्छव वंश का अच्युतनन्दी अन्तिम राजा था । अन्तर्वेदी वंश का अन्तिम राजा मतिल था जिसकी राजधानी सम्भवतः इन्द्रपुर ( इन्दौर खेड़ा ) में थी , उसने सन् ३२८ से ३४८ तक शासन किया । तीसरा श्रुघ्न वंश था जिसके दो राजा नागदत्त ( ३२८-३४८ ई ० ) और महाराज महेश्वरनाग ( ३४८ से ३६८.ई ० ) हुए ।
भारशिवों के जीवन दर्शन पर डा ० काशी प्रसाद जायसवाल ने बड़े मुन्दर शब्दों में अपनी पुस्तक ' अन्धकार युगीन भारत ' में इस प्रकार लिखा है ,
"समाज को फिर से ठीक दशा में लाने के लिए शैव साधुता या विरक्ति एक आवश्यक प्रतिकार बन गई थी । शको ने हिन्दू जनता को निर्बल कर दिया था और इस निर्बलता को दूर करने के लिए शैव साधुता एक आवश्यक वस्तु थी । कुशनों के लोलुपतापूर्ण साम्राज्यवाद का नाश कर दिया गया और हिन्दू जनता में नैतिक दृष्टि से जो दोय आ गये थे , उनका निवारण किया गया । और जब यह काम पूरा हो चुका तब भारशिव लोग क्षेत्र से हट गये । शिव का उद्देश्य पूरा हो चुका था , इसलिये भारशिव लोग आध्यात्मिक कल्याण और विजय के लिए फिर शिव मे लीन हो गये । अन्त तक उन पर कोई विजय प्राप्त नहीं कर सका था और न कभी उन्होने अपने आचरण को भौतिक स्वार्थ से कलकित ही किया था । वे शंकर भगवान और भक्तो के सच्चे सेवक थे और इसलिये वे अपना सेवा कार्य समाप्त करके इतिहास के क्षेत्र से हट गये थे । इस प्रकार का सम्मानपूर्ण और शुभ अन्त क्वचित ही होता और भारशिव लोग ऐसे ही अन्त के पूर्णरूप से पात्र थे । भारशिवो ने आर्यावर्त में फिर से हिन्दू राज्य की स्थापना की थी । उन्होने हिन्दू साम्राज्य का सिंहासन फिर से स्थापित कर दिया था , राष्ट्रीय सभ्यता की भी प्रस्थापना कर दी थी और अपने देश में एक नवीन जीवन का संचार कर दिया था । प्रायः चार सौ वर्षों के बाद उन्होंने फिर से अश्वमेध यज्ञ कराये थे । उन्होने भगवान शिव की नदी माता गंगा की पवित्रता फिर से स्थापित की थी और उसके उद्गम से लेकर संगम तक उसे पापो और अपराधो से मुक्त कर दिया था और इस योग्य बना दिया था कि वाकाटक और गुप्त लोग अपने मन्दिरो के द्वारों पर उसे पवित्रता का चिन्ह समझ कर उसकी मूर्तियां स्थापित करते थे । उन्होंने ये सभी काम कर डाले थे , पर फिर भी अपना कोई स्मारक पीछे नहीं छोड़ा था । वे केवल अपनी कृतियाँ छोड गये और स्वयं अपने आपको उन्होंने मिटा दिया । "
डा ० जायसवाल के उपरोक्त कथन से भारशिवो की महान राष्ट्रीय भावना एवं उत्कृष्ट देश - प्रेम का पता चलता है । वास्तव में उनका समय भारत की राजनीति में स्वर्णयुग था । भारशिव लोग कदापि सत्तालोलुप न थे , उनका उद्देश्य केवल विदेशी शासन का अन्त करके हिन्दू - राज्य का पुनसंस्थापना था । वे अपने उद्देश्य मे सफल हुए । उन्होंने वाकाटकों और गुप्तों से वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित कर एक सुदृढ़ मैत्री के आधार पर हिन्दुओ को संगठित कर दिया । उसी संगठन के आधार पर वे विदेशियों का उन्मूलन करने में सफल हो सके ।
चूँकि उनके उद्देश्य भौतिक स्वार्थों पर आधारित न ये इसलिये उनका मार्ग कभी अवरुद्ध न हुआ और उनके सब अभियान सफल हुए । यदि भारशिव लोग कुछ और काल तक भारतीय राजनीति पर छाये रहते तो हिन्दू जाति एक ऐसी सुसंगठित कौम बन जाती जिसका सामना करना किसी भी विदेशी शक्ति को सम्भव न होता ।
✍️ जय मां भारती 🚩 🚩 🚩 🚩 🚩

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