समनी साम्राज्य भारतीय क्षत्रियों का ही था
#समनी_साम्राज्य_भारतीय_क्षत्रियों_का_ही_था....
लीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के प्रोफेसर मोहम्मद हबीब द्वारा लिखित तथा दिल्ली के एस ० चाँद एण्ड कम्पनी द्वारा सन् १९५१ में प्रकाशित " ग़जनी के सुल्तान महमूद के कुछ पद - टीप " समनी साम्राज्य और हिंदू इतिहास के विषय में अत्यन्त उपयुक्त जानकारी प्राप्त कराते हैं । अपनी पुस्तक के १३३ पृष्ठ पर दी गयी पदटीप में प्रोफ़ेसर हबीब ने समनिद राजाओं की तिथियां दी हैं :
(1) अब्दुल मलिक बिन नूह ( ३४५ ३५० ) ,
(2) मनसूर बिन नूह ( ३५०-३६५ ) ,
(3) नूहबिन मनसूर ( ३६५-३८७ ) ।
यह स्मरण रहना चाहिये कि पश्चिम एशिया में #समनिदों का विशाल साम्राज्य था । भारत के विरुद्ध मोहम्मद कासिम तथा अन्य लोगों द्वारा किये गये आक्रमणों का उल्लेख करने वाले अभिलेखों में भारतीयों को तुर्क और समनी कहा गया है । यह प्रदर्शित करता है कि तुर्क और समनी हिन्दू थे । अतः समनी - साम्राज्य भारतीय क्षत्रियों का ही था ।
ऊपर दिया गया ' #नूह ' शब्द भी हिन्दू - शब्द है । यह ' मनु ' का संक्षिप्त रूप है । इसी कारण पश्चिम एशिया में ' जल - प्रलय ' की पौराणिक - कथा में ' नूह ' का नाम वैसे ही अभिन्न रूप में जुड़ा हुआ है जिस प्रकार भारतीय परम्परा में मनु का अभिन्न है । मनु का प्रत्येक नवीन सभ्यता के आदिपुरुष तथा न्याय - प्रदाता के रूप में भारतीय परम्परा में सर्वोच्च सम्मान का स्थान है । अतः भारतीय शासकों की अनेक उपाधियों में उसका नाम संयुज्य था । चूंकि समनी लोग हिन्दू थे , अतः हम उन लोगों में ' नूह ' शब्द पाते हैं ।
प्राचीन अरेबिया में हिन्दू - धर्म ही आस्था का विषय था । इस बात का अन्य प्रमाण इस तथ्य में मिलता है कि इस्लाम की धर्म -शब्दावली का एक बहुत बड़ा भाग अभी भी संस्कृत शब्दों का है ।
१४ वें पृष्ठ पर लेखक का कहना है :
" ईसा युग प्रारम्भ होने से कुछ समय पूर्व बृहतगीन द्वारा संस्थापित साईदी वंश की तुर्कीशाही ( कुशन ) ने विजयों का अभियान प्रारम्भ किया । इसके महानतम सम्राट् कनिष्क के अधीन उत्तरी भारत का एक बड़ा भाग , अफ़गानिस्तान , तुर्कस्थान , तथा मावारौन नहर कुशन साम्राज्य में सम्मिलित था । तुर्को को शीघ्र ही भारतीय सभ्यता में आत्मसात् कर लिया गया ।"
#अलबरूनी का कहना है कि इस वंश में ६० से कम सम्राट नहीं थे । इनमें से अन्तिम लगतुर्मन उसके अपने ही ब्राह्मण वजीर कल्लूर द्वारा सिंहासन से च्युत कर दिया गया था । सिल्क पर लिखी हुई , इन सम्राटों की वंशावली नगरकोट के दुर्ग में संग्रहीत थी , किन्तु अलबरूनी कहता है कि "मैं इसे देख न पाया । "
ऊपर दी गयी जानकारी से अनेक महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष निकलते हैं - - - - - - - -
(1) सर्वप्रथम हमें ज्ञात होता है कि " तुर्क लोग भारतीय सभ्यता में आत्मसात् हो गये थे " अर्थात् उन लोगों ने हिन्दू - धर्म अंगीकार कर लिया था ।
(2) इस निष्कर्ष की सम्पुष्टि इस तथ्य से भी होती है कि जिस प्रकार भारत में सभी क्षत्रिय - सम्राटों के मन्त्री ब्राह्मण हुआ करते थे , उसी प्रकार इन तुर्कों के वजीर भी ब्राह्मण थे ।
(3) तीसरी बात यह है कि प्राचीन भारतीय लोगों के ऊपर लगाया हुआ यह आरोप भी निराधार सिद्ध होता है कि इन लोगों का कोई लिखित आलेख या प्रमाण तथा इतिहास नहीं है ।
यह इतिहास कब पढाया जाएगा? 🤔
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✍️ जय मां भारती 🚩 🚩 🚩 🚩 🚩

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