कौन है महाराज गर्दभिल्ल और गर्दभिल्ल वंश...
#कौन_है_महाराज_गर्दभिल्ल_और_गर्दभिल्ल_वंश...
अवन्तिकाधीश सम्राट मालवगणमुख्य विक्रमादित्य प्रमार के मालव शाखा "गर्दभिल्ल वंश" में भिल्ल शब्द को देखते हुए वामपंथियों ने राजा गंधर्वसेन या गर्दभिल्ल को भीलवंशी घोषित कर दिया है। विकिपीडिया पेज पर यह कुप्रचार दो पुस्तकों के संदर्भ में डाला गया है। उसका मूल साक्ष्य केवल इतना है कि मालवा में भी भील बसते हैं दुसरा #गर्दभिल्ल शब्द में "भिल्ल" आया हुआ है। प्रस्तुत है इस लेख में वे सभी तथ्य जो इस वृथा भ्रम को दुर करते हुए वामपंथ का खण्डन करेंगे और सत्य को उजागर करेंगे।
(1) पुस्तक : "विक्रमादित्य: संवत्-प्रवर्तक . (Chaukhambā Vidyābhavana, 1960. इतिहासविद डाॅ. राजबली पांडेय.)
#अध्याय : उत्पत्ति तथा माता - पिता (पृ. ६८ - ७०)
(i) गर्दभिल्ल :
बृहत्कथामंजरी तथा कथासरित्सागर जैसे हिन्दुओं के ग्रन्थ विक्रमादित्य की उत्पत्ति तथा माता - पिता पर कुछ भी प्रकाश नहीं डालते । उनमें विक्रमादित्य के जन्म की कहानी उज्जयिनी के शासक महेन्द्रादित्य से आरम्भ होती है । जैन पट्टावलियों तथा जीवनवृत्तात्मक ग्रन्थों से इस समस्या पर कुछ प्रकाश पड़ता है । उनके अनुसार विक्रमादित्य के पिता का नाम गर्दभिल्ल था । गर्दभिल्ल व्यक्तिवाचक नाम नहीं वरन् यह वंश - नाम है । यह बात पुराणगत साक्ष्यों से प्रमाणित होती है । पुराणों के अनुसार सात ( या दस ) राजाओं का एक गर्दभिल्ल ( गर्दभिन ) वंश आन्ध्रों के समकालीन राज वंशों में एक था । इसकी पुष्टि जैन ग्रंथ हरिवंश से भी होनी है जिसके तिथि सम्बन्धी इतिहास में रासभ ( गर्दभिल्ल ) शासकों का उल्लेख है । उनका शासनकाल कुल मिलाकर एक सौ वर्ष था । हमने जो कुछ कहा उससे यह स्पष्ट हो जाता है कि विक्रमादित्य का वंश गर्दभिल्ल कहलाता था । वंश का यह अभिधान क्यों था , कहना कठिन है । प्रभावकचरित में यह वर्णन प्राप्त होता है कि गर्दभिल्ल रासभी विद्या ( गदहों का खेल ) जानता था जिससे वह शत्रुओं में खलबली मचा देता था । यह विद्या कोई सैनिक - यन्त्र - न्यास या सैनिक व्यवस्था थी जिसके लिए गर्दभिल्ल इतने प्रख्यात थे और बाद में उसी नाम से जाने गये । यह भी संभव है कि उनकी सेना का वेसर महागुल्म ( खच्चरों का रेजीमेंट ) बड़ा प्रवल था जिसके नाम पर उस परिवार का नाम पड़ गया ।
(ii) गर्दभिल्ल मालवों की एक शाखा :
जैन विद्वान् मेरुतुङ्ग की विचारश्रेणि से ज्ञात होता है कि गर्दभिल्ल एक बहुत बड़े समुदाय की एक शाखा थी ' । यह ग्रंथ विशाला उज्जयिनी ) का राजवंशिक इतिहास देते हुए विक्रमादित्य को ' मालवराय ' बताता है । यहाँ ' मालय ' शब्द जनता के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है , यह इस बात से सिद्ध होता है कि विशाला क्षेत्र का , जिस पर विक्रमादित्य शासन करते थे , पहले ही उल्लेख हो चुका है । हम दूसरे साधनों से भी जानते हैं कि मालवों की ऐसी शाखायें थीं भी । नंदसा - यूप - अभिलेख के अनुसार ' इक्ष्वाकुओं द्वारा स्थापित और प्रथितयश राजर्षियों के मालव वंश में उदित विजय पर नृत्य करनेवाले , जयसोम के पुत्र , प्रभारवर्धन के पौत्र , सोगियों के नायक सोम ने कई शत सहस्र गार्यों को दक्षिणा ( रूप में दिया ) । ' यह अभिलेखात्मक प्रमाण इस बात की पुष्टि करता है कि सोगी मालवों की एक उपजाति थी । उसी प्रकार गर्दभिल्ल को भी मालवों की उपजाति माना जा सकता है । विक्रमादित्य भारतीय इतिहासप्रसिद्ध मालवों की गर्दभिल्ल शाखा में उत्पन्न हुये थे ।
(iii) मूलवंश : सूर्यवंश
हम इस प्रश्न का अन्वेषण और आगे करते हैं कि गर्दभिल्ल - मालव भारतवासियों के किस संजाति के थे । साहित्यिक ग्रंथों को इस प्रश्न से कोई सम्बन्ध नहीं । नंदसायूप - अभिलेख मालव जाति को '' इक्ष्वाकुप्रथित राजर्षिवंश " कहता है । इक्ष्वाकु अयोध्या के राजवंश के संस्थापक थे । नंदसा - अभिलेख यह संकेत करता है कि मालव सूर्यवंशी क्षत्रिय थे ।
मालवों का प्रारम्भिक इतिहास महाभारत में प्राप्त होता है । उसके अनुसार मालव तत्कालीन प्रमुख क्षत्रिय राजवंशों से सम्बन्धित थे । विराट के श्यालक कीचक की माता मालव - राजकुमारी थी । ' मद्रराज अश्वपति की रानी - सावित्री की माता - भी मालव - राजकुमारी थी । महाभारत के विशाल युद्ध में मालव कौरवों की ओर से लड़े थे । मालवों का मत्स्यों और मद्रों से वैवाहिक सम्बन्ध यह सिद्ध करता है कि मालव महाभारत काल की प्रमुख क्षत्रिय जातियों में समझे जाते थे । यूनानी लेखक , जिन्होंने सिकन्दर तथा मालव - तुद्रकों के बीच घोर युद्ध का वर्णन किया है , मालवों की सामाजिक स्थिति पर प्रकाश नहीं डालते । वे केवल इनकी शक्ति तथा गर्व का स्पष्ट संकेत करते हैं । यूनानियों के द्वारा मालवों का गर्व आक्रान्ताओं के लिए कभी उद्धत और प्रायः भयङ्कर समझा गया है । वर्णन क्षत्रियों के लिए उपयुक्त है जो कि वीरता और साहस के लिए विख्यात थे ।
(iv) मल्लों से उनका सम्भावित सम्बन्ध हमने अब तक गर्दभिल्ल मालवों की उत्पत्ति इस संदिग्ध सुझाव के साथ पंजाब के मालवों से दिखाई है कि राजपूताना के मालव अपने को इच्वाकु के सूर्यवंश की सन्तान मानते थे ।
इस प्रकार उपरोक्त पुस्तक में गर्दभिल्ल शब्द का अर्थ और गर्दभिल्ल वंश के क्षत्रिय होने के प्रमाण इतिहासविद डाॅ. राजबली पांडेय द्वारा सिध्द किए हुए हैं। आगे और इन वामपंथी इतिहासकारों के लिए प्रमाण देंगे कि गंधर्वसेन और गर्दभिल्ल कौन थें। यहां इतने विवरण से पता चलता है कि गर्दभिल्ल कोई व्यक्ति विशेष नहीं थे। बल्कि सुर्यवंशी मालवों की उपजाती थें। प्रसिद्ध इतिहासकार सुर्यमल्ल मिश्रण के अनुसार सुर्यवंशी ही बाद में अग्निवंशीय क्षत्रिय कहलाएँ।
(2) राजस्थान के इतिहास की पुस्तक - "Māravāṛa Rājya kā itihāsa. By Jagadish Singh Gahlot. Mahārājā Mānasiṃha Pustaka Prakāśa, 1991." में दंत कथाओं के परंपरा के आधार पर लिखा है -
"दन्तकथाओं से जाना जाता है कि गंधर्वसेन उज्जैन के पंवार राजा और विक्रमादित्य के पिता थे ।"
(3) पुस्तक : विक्रमादित्य : तथ्यों के आलोक में...
(रचनाविद इतिहासकार डाॅ. भगवतीलाल राजपुरोहित।)
डॉ. भगवतीलाल राजपुरोहित के अनुसार सम्राट विक्रमादित्य पँवार का वंश गर्दभिल्ल अथवा प्रमर है। पिता का नाम गंधर्वसेन है जिन्हें गर्दभ वेश में गंधर्व, महेन्द्रादित्य या गर्दभिल्ल भी कहा गया है।
(4) क्या है गर्दभिल्ल शब्द का अर्थ?
वामपंथियों के पास कोई सबुत नहीं है कि मालवा के शासक भील थे। अपितु इसका आधार केवल इतना है कि गर्दभिल्ल शब्द में भिल्ल शब्द आया है। तो हम दो प्रामाणिक एतिहासिक साक्ष्य देकर गर्दभिल्ल का अर्थ बताते हैं कि क्यों इन राजाओं को या शुरूआती प्रमर वंश के राजा को गर्दभिल्ल कहा गया। इनसे उनके इस षड्यंत्र और मिथ्या मिथक का खण्डन हो जाता है----
"मालवा (मगध) देश में गन्धर्व के स्थान पर श्वेताम्बर मान्यता के अनुसार गर्दभिल्ल का नाम आता है अथवा गर्दभी विद्या जानने के कारण यह राजा गर्दभिल्ल के नाम से प्रसिद्ध हो गया था।" (संदर्भ - i, ii)
(i) समय–वी०नि० 345-445 (ई०पू०182-82)।– देखें - इतिहास / 3 / 4 ।
(ii) ↑ गन्धर्वसेन (हिंदी) jainkosh.org। अभिगमन तिथि: 25 अप्रॅल, 2018।
इन साक्ष्यों के अनुसार इन राजाओं को गर्दभी विद्या प्राप्त थी इसलिए वे गर्दभिल्ल कहलाएँ न कि वे भील थे इसलिए गर्दभिल्ल कहलाएं। अपितु अब तक कोई भील यह दावा भी नहीं कर रहा है लेकिन दावा वामपंथी कर रहे हैं जिनका उद्देश्य हिंदू समाज को खण्ड खण्ड करना और भारत के तुकडे तुकडे करना है। और इनका दल विकिपीडिया पर इडिटींग करता है। इन्हीं के लिखे पुस्तकों के संदर्भ वहां होते हैं। परमार पँवार समाज इस षड्यंत्र का शिघ्र विरोध करे या सतर्क रहकर इतिहास की रक्षा करें।
(5) पुस्तक : VIKRAMA AND THE VAMPIRE BY RICHARD FRANCIS BURTON, 1870. के अनुसार (हिंदी अनुवाद) :
" चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य के बड़े भाई राजा भर्तृहरि ने अपने साथ हुए पत्नी के धोखे से उत्पन्न वैराग्य के चलते आत्मकल्याण हेतु संन्यासाश्रम के पथ का अनुगमन कर श्रीमहायोगी गोरक्षनाथ जी से दिक्षीत होकर नाथ संप्रदाय का मार्ग अपनाया और मोक्ष प्राप्ति को अपना लक्ष बनाकर राजपाठ छोड़कर महान और आदर्श योगी बनें । उनकी लिखी नितीशतक , वैराग्य शतक और श्रृंगार शतक विश्व विख्यात हैं । भर्तृहरि महान नितीकार होने के साथ ही महान वैरागी हुए । कई अंग्रेज इतिहासकारों ने इन्हें जाति से पोवार (powar) या पुवार (puar) बताया है ।"
(6) The history of india : Akbar nama of abul fazl . BY : Sir Henry Micrs elliot . Sushil Gupta private , India 1953 . के ( P. 34 ) पर लिखा है - -
" Reign of Raja Bhoj- This Raja also belonged to the tribe of Powar . In justice and liberality he vied with Bikramjit ."
आएन-ए-अकबरी में अबुल फजल के अनुसार भी गर्दभिल्ल वंशीय राजा विक्रमादित्य, एवं उनके वंशज राजा भोज सभी पँवार क्षत्रिय है। आएन-ए-अकबरी का कोई भी translation किसी भी author का आप पढें वहां विक्रमादित्य और राजा गर्दभिल्ल वंश का विस्तृत उल्लेख मिलेगा एवं यह वंश पँवार क्षत्रिय ही उल्लिखित मिलेंगा ।
(7) पं . कोटा वेंकटचलम् अपने शोध - प्रबन्ध ' द हिस्टिरियोसिटी ऑफ़ विक्रमादित्य एण्ड शालिवाहन ' में लिखते हैं-
"So , it is impossible that western scholars should be ignorant of the accounts of Vikrama and Shalivahana in Bhavishya Mahapurana . They purposely ignored the four dynasties of the Agni Vamsa which coverd over a period of about 1300 years from 101 BC to 1195 AD i.e. from the time of Vikramaditya to the time of Prithiviraja taking Bhojraja alone from the list of Panwer dynasty leaving the era - founders Vikramaditya and Shalivahana in the intervening period . The Chronology of ancient Indian history right from the time of Mahabharata War ( 3138 BC ) flown to the beginning of Gupta Dynasty ( 327 BC ) has to be compressed by 1207 years so as to suit the contemporaneity of Alexander and Chandragupta . Vikramaditya and Shalivahana were historical persons who extended their empires from the Himalayas to caps Comorin ."
अतः पं. कोटा वेंकटाचलम् के अनुसार पँवार राजा गंधर्वसेन, सम्राट विक्रमादित्य और शालिवाहन का वंश अग्निवंशीय क्षत्रिय कुल है।
(8) डॉ. विनय कुमार शर्मा के अनुसार बृहत्कथा-मंजरी तथा कथासरित्सागर में विक्रमादित्य के पिता का नाम महेन्द्रादित्य, प्रभावकचरित में गर्दभिल्ल और भविष्य पुराण में गंधर्वसेन मिलता है। (पुस्तक : भारतीय इतिहास के शिखर पुरूष विक्रमादित्य)
यदि ये वामपंथी गर्दभिल्ल शब्द से जिसका कही जिक्र नहीं मिलता विक्रमादित्य के इर्द गिर्द भी, उसका अर्थ भील जाती से लगा रहे तो निश्चित ही सभी स्थानों पर भीलवंश लिखा रहना चाहिए था। उसकाल में पृथ्वी पर केवल क्षत्रिय ही शासन करते थे। भील वन में रहते थे। गर्दभिल्ल शब्द का प्रयोग भील जाती से होता तो इस वंश के एक नहीं दो नहीं तिन नहीं बल्कि पुरी वंशावली को क्षत्रिय वंशीय न कहा गया होता। वामपंथियों का उद्देश्य भारत में जातीवाद बढाकर फुट डालना है। महाराज भरथरी का राजपाट छोड़कर संन्यासी होना प्रसिद्ध है। वे यदि भील होते तो हर स्थान पर क्षत्रिय क्यो कहलाते?
(9) आर्य समाज के महान और बेहद प्रसिद्ध इतिहास संशोधक कुलयात आर्य मुसाफिर के अनुसार महाराज भरथरी पँवार वंशीय थे। जिन्होंने शंकराचार्य से दिक्षा लीं थीं। (यह गर्दभिल्ल के पुत्र भरथरी ही है। )
#संदर्भ : 📖 Kuliyata Arya Musafira : Hindi anuvada, On Hinduism according to Arya Samaj, Hindu reform movement. Lekharāma.
Harayana Sahitya Samsthana, 1979.
(10) Ujjayinī kī sāṃskr̥tika paramparā
Pratibhā Prakāśana, 2005 (Cultural history of Ujjain District, India; covers the ancient period to 20th century.) उपरोक्त संदर्भ के अनुसार भी गंधर्वसेन या गर्दभिल्ल वंशीय महाराज विक्रमादित्य, एवं राजा भरथरी सभी क्षत्रिय प्रमार वंशीय राजा थें। यह उज्जयिनी के लोकसांस्कृतिक प्रमाण द्वारा बताया गया है।
(11) Chronology of Ancient Hindu History, भाग 2. By Kota Venkatachelam. अनुसार भविष्य पुराण के आधार पर राजा गंधर्वसेन, विक्रमादित्य और शालिवाहन पँवार या परमार राजवंशी शासक थें।
(12) प्रो. राधाकृष्णन ने लिखा है - - "The Panwar dynasty in which Vikramaditya and Salivahana were born in the most important of the four Agnivamsis. Vikramaditya and Salivahana conquered the whole bharat from Himalayas to Cape Comorin, became emperors and established their eras."
Ref : (Salivahana performed the Ashwamedha sacrifice. Prof. Dr.Radha Krishnan)
(13) इतिहासकार डाॅ. दशरथ शर्मा कृत पँवार वंश दर्पण पृ. १२-१३ में दि गई chronology अनुसार राजा गर्दभिल्ल, सम्राट विक्रमादित्य और शालिवाहन तथा महाराजा भोज आदि महाराज पृथु के वंशज है। उनकी वंशावली वहां राजा पल्ल, राजा वेणु आदि से आरंभ होती है। अतः इस वंशावली के अनुसार गंधर्वसेन या गर्दभिल्ल सुर्यवंशी क्षत्रियों के वंशज है।
राजा पृथु भागवत पुराण अनुसार सुर्यवंशी थे। (प्रमाण #भागवत महापुराण-4.13.20 (सटीक, दो खण्डों में, गीताप्रेस गोरखपुर, संस्करण-2001ई.) तदनुसार गर्दभिल्ल माने गंधर्वसेन, पृथ्वीपती महाराज पृथु के सुर्यवंशी वंशज है।
(14) ग्रंथ - "The historicity of Vikramaditya and Shalivahana" के अनुसार विक्रमादित्य गंधर्वसेन या गर्दभिल्ल के पुत्र पँवार राजवंश के सम्राट थें।
(15) Journal of the Bombay Branch of the Royal Asiatic Society, भाग 9 के अनुसार संवत् प्रवर्तक विक्रमादित्य प्रमर क्षत्रिय थे।
(16) पुस्तक : 📖 औपनिवेशिक इतिहास लेखन की भेंट चढ़ा विक्रमादित्य का इतिहास में रवि शंकर अनुसार भी विक्रम संवत् के प्रवर्तक मालवगणमुख्य विक्रमादित्य के पिता गंधर्वसेन या गर्दभिल्ल थें। यह पँवार /परमार वंशीय क्षत्रिय राजा थें। इन्होंने पं. कोटा वेंकटाचलम् और डॉ. राजबली पांडेय तथा ग्रंथ - "The historicity of Vikramaditya and Shalivahana" का अभिमत समर्थित किया है।
(17) पुस्तक : "सम्राट विक्रमादित्य और अयोध्या" में डाॅ. जितेंद्र कुमार संजय लिखते हैं---
"उज्जयिनी के राजसिंहासन पर आरूढ़ कौण्डिन्यगोत्रीय महाराज प्रमर ( 392-386 ई . पू . ) से क्षत्रिय - वंश के दिव्याकाश में परमार राजवंश का अभ्युदय हुआ । महाराज प्रमर के पश्चात् महामर ( 386-383 ई.पू. ) , देवापि ( 383-380 ई.पू. ) और देवदूत ( 380-377 ई . पू . ) ने तीन - तीन वर्ष राज्य किया । 377 ई . पू . में शक - नरेश ने महाराज देवदूत को अपदस्थ कर उज्जयिनी के राजसिंहासन पर अधिकार कर लिया । उज्जयिनी पर शकों ने 377 से 195 ई.पू. तक शासन किया । इस अवधि में उज्जयिनी के परमार श्रीशैलम् चले गये थे । 182 ई.पू. में महाराज देवदूत के पौत्र महाराज गन्धर्वसेन ने उज्जयिनी पर अधिकार कर लिया । महाराज गन्धर्वसेन ने 182 ई.पू. से 132 ई.पू. तक राज्य किया । तत्पश्चात् उनके पुत्र महाराज शंख ( भर्तृहरि ) उज्जयिनी के राजसिंहासन पर आरूढ़ हुए , किन्तु महाराज शंख के संन्यासी हो जाने के पश्चात् महाराजगन्धर्वसेन को पुनः 102 ई.पू. में राज्य सम्भालना पड़ा।"
फिर लिखा है - - - एक वर्ष बाद भगवान् शिव की कृपा से उनके द्वितीय पुत्र विक्रमादित्य का जन्म हुआ । विक्रमादित्य ने 5 वर्ष की आयुसे 12 वर्ष तक तपस्या कर अनेक सिद्धियाँ प्राप्त की । सम्राट विक्रमादित्य 19 वर्ष की आयु में 82 ई.पू. में उज्जयिनी के राजसिंहासन पर विराजमान हुए तथा 19 ई . तक राज्य किये । सम्राट विक्रमादित्य के बल - विक्रम का वर्णन करते हुए महाकवि कालिदास ने लिखा है - -
वर्षे श्रुतिस्मृतिविचारविवेकरम्ये श्रीभारते खधृतिसम्मितदेशपीठे ।
मत्तोऽधुना तिरियं सति मालवेन्द्रे श्रीविक्रमार्कनृपराजवरे समासीत् ॥
" सम्राट विक्रमादित्य के पास अठारह योजन में फैली हुई तीन करोड़ पैदल सेना के अतिरिक्त सुदृढ़ हस्तिसेना और जलसेना भी थी , जिसका वर्णन महाकवि कालिदास ने किया है... "
इस प्रकार इस ग्रंथ में हमें गंधर्वसेन (गर्दभिल्ल) और सम्राट विक्रम का गोत्र, वंश कुल उपरोक्त संदर्भित अनुमानाकूल ही मिलते हैं।
(18) डाॅ. प्रविणकुमार द्विवेदी के अनुसार गंधर्वसेन (गर्दभिल्ल) गंधर्वपुरी (मध्यप्रदेश) के शासक नाबोवाहन के पुत्र थे जिन्हें महेन्द्रादित्य (महेंद्र = महि+इंद्र अर्थात् महि (पृथ्वी) का राजा, आदित्य = सुर्य) भी कहाँ जाता है। उनकी धर्मपत्नी सौम्यदर्शना वीरमती #मदनरेखा थी जिनसे उनके यहाँ भर्तृहरि तथा वीररत्न विक्रमादित्य से दों पुत्र रत्न प्राप्त हुएं। (पुस्तक : भविष्यपुराण में सम्राट विक्रमादित्य)
(19) ग्रंथ : महाकवि श्रीसोमदेवभट्ट विरचित कथासरित्सागर के आलोक में विक्रमादित्य (डाॅ. सदानंद त्रिपाठी दयालु) में उद्धृत संदर्भित साक्ष्बध्द बिंदु व तथ्य :
(i) क . विण्टरनिट्जकृत भारतीय साहित्य का इतिहास , भाग 3 , खण्ड एक ; संस्कृतकाव्य का इतिहास , पृ . 76 , पं . सुभद्र झा ( अनु . ) ; ख . संस्कृत साहित्य का इतिहास , आचार्य बलदेव उपाध्याय , पृ .441 के अनुसार विक्रमादित्य :
" भारतवर्ष के इतिहास में कलिकाल जो पुण्यप्रतापी सम्राट अवतीर्ण हुए हैं , उनमें परम वन्दनीय हैं अवन्ती महाजनपद के गोविप्रसंरक्षक , नीरक्षीरविवेकी , प्रजावत्सल , महान् न्यायप्रिय , महाराजाधिराज सम्राट विक्रमादित्य । ईसापूर्व प्रथम शताब्दी में जिस समय सनातन - वैदिक धर्मपरायण भारतीय हिंदू आर्य जनता म्लेच्छ शकों के दुर्दान्त आतंक से सर्वथा त्रस्त होकर त्राहि - त्राहि कहकर परमपिमा परमेश्वर से आतंत्राण हेतु प्रतिक्षण प्रार्थना कर रही थी , तभी अहैतुककरुणावरुणालय श्रीहरि के अनुरोध तथा भृत्यानुग्रहकातर साम्बसदाशिव के कृपाप्रसाद से आपका प्राकट्य महाराज महेन्द्रादित्य के राजप्रासाद में हुआ । विक्रम अर्थात् पराक्रम में आदित्य ( सूर्य ) के समान परम तेजस्वी होने के कारण दैवज्ञजनों ने लक्षणानुरूप ही आपका नामकरण ' विक्रमादित्य ' अभिधान के साथ किया । मालवगणों के अध्यक्ष होने से ' मालवगणाध्यक्ष तथा शकों ( म्लेच्छ आततायियों ) के परम शत्रु ( अरि ) होने से आप ' शकारि ' आदि विरुदों से समलंकृत हुए ।"
(iii) तैत्रिभिर्मन्त्रिनयैः सह राजपुत्रोऽत्र सः ।
ववृधे विक्रमादित्यस्तेजोवीर्यबलैरिव ॥ 54 ॥
" भगवान् शंकर के अमोघ आशीर्वाद से जन्म होने के कारण उपनयनादिसंस्कार सम्पन्न होने के पश्चात् गुरुजन तो केवल हेतु ( निमित्त ) मात्र थे , राजकुमार विक्रमादित्य तत्तद् विद्याओं को बिना किसी प्रयास के सहज रूप से अर्जित कर लेता था । समस्त विद्याओं तथा कलाओं के साथ ही दिव्यास्त्र - संचालन - विधा में भी सर्वथा निष्णात हो जाने पर प्रजाजन भी राजकुमार को धनुर्धर भार्गव परशुराम से भी अत्यन्त श्रेष्ठ समझते थे । महेन्द्रादित्य के वशवर्ती राजाओं ने सविनयभाव से अपनी सुरूपवती कन्याओं का विवाह राजकुमार विक्रमादित्य के साथ करने हेतु समर्पित कर दी । तब महाराज ने उन अपरा लक्ष्मीस्वरूपा कन्याओं का ब्राह्मविधि से युवराज का विवाह - संस्कार सम्पन्न कराकर उन्हें श्रुतिपरम्परानुसार महाराज पद पर पट्टाभिषिक्त कर दिया । और स्वयं सपत्नीक सचिव को साथ लेकर वृद्धावस्था में अन्ततः काशी जाकर भगवान् श्रीविश्वनाथ ज्योतिर्लिंग के शरणापन्न होकर शिव - समाराधन में प्रवृत्त हो गये । इधर , उज्जयिनी में नवाभिषिक्त महाराज विक्रमादित्य ने अपने पैतृक राज्य को प्राप्त करके उसी प्रकार अपना प्रभावी प्रभाव दिखाना प्रारम्भ कर दिया... "
उपरोक्त वर्णन अनुसार गर्दभिल्ल या गंधर्वसेन विक्रमादित्य वंश आर्य नृपों का वंशीय तथा शैव धर्मी था। वें मालवा का वंशीय तथा मालवगणमुख्य थें। भीलवंशी सर्वप्रथम स्वयं को मालव सिध्द करें क्योंकि ही गंधर्वसेन या गर्दभिल्ल सुर्यवंशी मालव थें।
(20) vikram volume (scindia Oriental Institute 1948.) में सम्राट विक्रमादित्य परमार वंशीय तथा गंधर्वसेन या गर्दभिल्ल के पुत्र कहे गए हैं।
(21) इतिहासकार कुमारी सुश्री मनीषा अथवा मणिकर्णिका सिंह ‘आर्या क्षात्रकन्या’ (मेडता, राजपूताना/मरुधर/राजस्थान + कालिकाता, पश्चिम बङ्गाल/गौडदेश + बनारस हिन्दु विश्वविद्यालय, वाराणसी/काशी, पूर्वाञ्चल, आर्यावर्त्त, उत्तरप्रदेश, भारत) की कलम से लिखे गए ग्रन्थ "विश्वविजेता सम्राट् शालिवाहन परमार" में भी गंधर्वसेन या गर्दभिल्ल के वंशज शालिवाहन परमार, परमार वंशीय दिग्विजयी अग्निवंशीय क्षत्रिय सम्राट है। ग्रंथ में कई साक्ष्य एवं अभिलेख ब्योरोवार वर्णित है।
(22) The History of India, as Told by Its Own Historians में John Dowson के अनुसार भी गद्दभिल्ल वंशीय गंधर्वसेन, महाराजा विक्रम, महाराजा भोज का वंश अग्निवंशीय तथा पँवार (powar, panwar) क्षत्रिय गया लिखा है।
(23) पुस्तक : 📖 History of India (REMOTE ANTIQUITY TO The ACCESSION OF THE MOGUL DYNASTY ) में इतिहासकार john c. Marshman (1836) (p. 58) में कहते हैं---
"सम्राट विक्रमादित्य प्रमर वंश के थे, जिस वंश को अब पोवार वंश कहाँ जाता है।"
इतः इस पुस्तक के अनुसार भी गंधर्वसेन एवं श्री विक्रमादित्य महाराज प्रमर क्षत्रिय वंश के मान्य हुए हैं।
जाहिर है कि वामपंथी, अधिकतर वे विदेशी जिन्होंने अंग्रेजो के कहने पर इतिहास लिखा और विकृतीकरण किया, जो पौराणिक इतिहास को मिथक सिध्द करने के लिए नियुक्त किए गए थे, जिन्हें भारतवर्ष और उसके बढते संस्कृत के प्रचार से से ईर्ष्या थी, उन्हें छोड़ उनके अलावा प्रामाणिक और सभी राष्ट्र वादि इतिहासविद विक्रमादित्य के अस्तित्व इतिहास पुरातत्व को एक मत से प्रमाणित करते हैं एवं उन्हें क्षत्रिय प्रमार वंशीय मानते हैं।
(24) सर जॉन मेल्काॅम अपनी किताब "Report of the province of Malwa and adjoining districts." के part-2nd, chapter - "History of Malwa" में लिखते हैं - - -
" मालवा में जब भील राजवंश के राजा पुतराज की निसंतान मृत्यु हुई तब पोवार राजपूत राजवंश के राजकुमार आदित्य पोवार ने मालवा के राजसिंहासन को धारण कर वहाँ भी पोवार राजवंश की स्थापना की। इस राजवंश ने करिब १०५८ वर्ष तक मालवा पर शासन किया। "
इस टिप्पणी पर ध्यान देना चाहिए। इसमें उल्लिखित राजकुमार आदित्य को मेल्काॅम ने पोवार राजपूत राजवंश का कहा है और फिर मालवा पर भी अधिपति होने की बात कही है। तदनुसार आदित्य पोवार एवं उनके राजवंश का राज्य क्षेत्र अवन्तिका के क्षेत्र में कही और रहा होगा ऎसा मेल्काॅम के विवरण से प्रतित होता है। जैसा कि विक्रमादित्य महाराज को कई स्थानों पर माण्डलिक भी कहाँ है वैसे ही मालवगणमुख्य माने गणाध्यक्ष भी कहाँ गया है। एक बात और उद्घाटित होती है कि मालवा पर पँवार वंश का शासन राजा आदित्य पँवार के समय से ही एवं शायद उससे भी ज्यादा प्राचीन काल से था।
(25) इतिहासकार जी. डी. जोशी कि पुस्तक शकारि सम्राट विक्रमादित्य के पृ. १४-१५ अनुसार :
"हरिवंश नामक वंशावलीमें मालव लोगोंको चन्द्रवंशीय क्षत्रिय बताया गया हैं । ये लोग बड़े ही बलवान , पराक्रमी और वैभवशाली लोग कहे जाते थे । कहा जाता है कि जब कौरव पाण्डव ओके बीच महाभारत का युद्ध हुआ था , तब उस समय इन्होंने कौरवपक्ष का साथ दिया था । यह भी कहा जाता है कि जब सिकन्दर ने भारतवर्ष पर आक्रमण किया था तब इस मल्लवंश के बीर उससे भी लड़े थे । इतिहासकी ढूंढखोज करनेसे यह भी ज्ञात होता है कि '' मालव'' शब्द मल्ल शब्द का अपभ्रंश है । यथार्थ में ये मालव लोग मल्लवंशीय क्षत्रिय हैं । अब भी मल्ल तथा शाही वंशके कुछ चन्द्रवंशी राजपूतोंके परिवार नेपाल को तराई तथा कुमाऊं के इलाकों में मौजूद हैं । इतनी शताद्वियाँ बीतने कौम का योद्धा । अतः उक्त पंजाब से जिन मालव वा मल्ल लोगोंका दल अशोक के मरने पर रावी नदी को छोड़कर राजपूताने की ओर होता हुआ अवन्ति प्रदेश पर आया वे लोग विशुद्ध चन्द्रवंशीय क्षत्रिय थे । राजपूताने के नगर अथवा नागरी ग्राम में कुछ प्राचीन शिक्के प्राप्त हुये हैं । इन शिक्कों पर " जय - मालवाणाम् शब्द खुदे हुये हैं । इन पर लिखे हुये शब्दों की बनावट तथा आकार प्रकारादि को देखने से ज्ञात होता है कि ये ईस्वी सन् से पूर्व पहिली शताब्दि के हैं । अतः इन सिक्कों के देखने से यही निश्चित किया जा सकता है कि ये शिक्के इन्हीं मालव लोगों के प्रचलित किये हुये हैं , अतः अनुमानतः राजपूताने के राजाओं को विजय कर के इन के द्वारा अवन्ति में नया राज्य स्थापन करने का काल ईस्वी शताब्दि से पूर्व के आसपास का ज्ञात होता है । यही कारण है कि अपनी विजय के चिरस्मरणार्थ इन्हीं मालव लोगों ने अवन्ति राष्ट का प्राचीन नाम बदलकर मालवा राज्य रख दिया । तब ही से अवन्ति राज्य ' मालवा ' राज्य कहलाने लगा । पंजाबसे मालव लोगोंका जो दल राजपुतानेकी ओर आया और जिसने अवन्तिकाको अपनी राजधानी बनाया वह कौनसा सर्दार था और उसने किस प्रकार यहांपर सफलता प्राप्त की अभीतक इस सम्बन्धमें अधिक छानवीन नहीं हो सकी है परन्तु किम्वदन्ती है कि मालव राज्यका आदि संस्थापक राजा गंधर्वसेन हुआ हैं । उज्जयनीमें मालव जातिका यही पहिला राजा है जिसने राज्यकी सीमाको अपनी भुजाओंके बलपर बढाया । कहते है कि इसके दो लड़के थे । बड़े राजकुमारका नाम भर्तृहरि तथा दूसरे राजकुमारका नाम विक्रम था ।"
जी. डी. जोशी के अनुसार भी गंधर्वसेन मालव तथा गर्दभिल्ल जनजाति के क्षत्रिय वंशी है लेकिन डाॅ. राजबली पांडेय तथा इनके उद्धरण में केवल इतना अंतर है कि इनके अनुसार गर्दभिल्ल या गंधर्वसेन या विक्रमादित्य का प्रमर वंश विशुद्ध चंद्र वंशी है और फिर अग्निवंशीय कहलाया तथा डाॅ. राजबली पांडेय अनुसार ये मलव क्षत्रिय गर्दभिल्ल वंश इक्वाक्षुवंशीय सुर्यवंशीय है जिसका मूल नंदसा अभिलेख है। हम इन दोनों विवादों में नहीं पडना चाहते। दोनों मत एतिहासिक है जिनमें एक बात समान है जिनके हम दो निष्कर्ष लिखेंगे - -
(i) गर्दभिल्ल (प्रमर) वंश ही मालव है।
(ii) मालव मूलतः विशुद्ध क्षत्रिय एवं महाभारत में उल्लेखित प्राचीन आर्य जनजाति है।
(26) जहां जहां भी गर्दभिल्ल वंश मालव जो मालव क्षत्रियों की शाखा है उन्हें सुर्य वंशी कहा गया है स्वयमेव अनल वंशीय समझ लेना चाहिए। क्योंकि आगे यही सुर्यवंशी मालव अग्निवंशीय कहलाएँ । इसे हम युं ही नहीं कहेंगे अपितु सुप्रसिद्ध महाकवि इतिहासकवि सुर्यमल्ल मिश्रण के मत को वंशभास्कर से उद्धृत करते हैं - - -
१६ वीं शती के कविराजा सूर्यमल्ल मिश्रण ने अपने #वंशभास्कर में लिखा है -
'कितने ही लोग अग्नि वंश को सूर्यवंश कहकर वर्णन करते हैं , उनमें तेज तत्व की एकता के कारण विरोध नहीं समझना चाहिये ।'
अनल अन्यवाय हि किते वरनत सौर वखानि ।
तेज तत्व एकत्य करि , नहिं विरोध तहँ जानि ||
आज पँवार परमार वंश अग्निवंशीय कहलाता है इसलिए सुर्य मल्ल मिश्रण अनुसार हम इस वंश को भी सुर्यवंशी कह सकते हैं। मालव या प्रमर वंशीय, नंदसा अभिलेख के अभिव्यक्ति से भी सुर्यवंशी थे और आज अग्निवंश है तो दोनो बातें मेल खाती है। अतः एतिहासिक रूप से यह सही है। दुसरे शब्दों में ये वर्तमान अग्निवंशीय प्रमर पँवार उसकाल के मालव शाखा के सुर्यवंशी ही है।
(27) साहित्यरत्न ईशदत्त शास्त्री श्रीश कृत "विक्रमादित्य और उनके नवरत्न (१९४४ ई.)" में उन्होंने सम्राट विक्रमादित्य और गर्दभिल्ल वंश को मालव वंश ही माना है। और मालव सुर्यवंशी क्षत्रियों के प्रमर कुल या गर्दभिल्ल वंश को भारत का प्राचीन वंश सिध्द करने के लिए महाभारत की कथा उल्लिखित की है। वे लिखते हैं - -
" महाभारत की प्रसिद्ध पुण्य - कथा 'सावित्री - सत्यवान' किसे ज्ञात नहीं है ? सावित्री का पिता अश्वपति और माता ' मालवी ' थी । इसी सावित्री पर प्रसन्न होकर यम ने वरदान दिया था कि ' तुम्हारे पिता से तुम्हारी माता ' मालवी ' को ' मालव ' नाम वाले १०० पुत्र होंगे । वे तुम्हारे सौ भाई देवों के समान तेजस्वी , दीर्घायु और पुत्र - पौत्र - सम्पन्न होंगे । यह एक उदाहरण इसके लिये पर्याप्त है कि मालव जनपद प्राचीन ही नहीं अपितु अति प्राचीन है । "
वे आगे लिखते हैं - - - - -
" स्कन्दपुराण के कुमारखण्ड में इस प्रदेश के ग्रामो की सख्या ११८१८० कूती गई है । भविष्यपुराण के प्रतिसर्ग पर्व , खण्ड १ , अध्याय ६ के एक श्लोक से यह पता चलता है कि ' अवन्ती देश में ४ योजन के विस्तृत भू - क्षेत्र पर अम्बावती पुरी को बसा कर प्रमर भूप सुखपूर्वक रहने लगा । कहा नहीं जा सकता कि इससे क्या अनुमान किया जाय । पर आज कल के ' बुद्धिवादी ' भारत इतिहास के अन्वेषक विदेशी विद्वानों का मत है कि मालववीर , मालवक , मालवगण , कहीं बाहर से आकर यहाँ बस गये और उन्होंने इस वर्तमान मालवा कहलाने वाली भूमि को मालवा का नाम दिया । "
फिर वामपंथी मतों को निम्न बिंदुओं से खण्डित करते हैं - -
(i) (करकोट नगर ( जयपुर ) के सिक्कों से यह प्रमाणित होता है कि मालक लोग ईसवी सन पूर्व १५० या १०० तक अपने निवास स्थान में पहुंच गये । वे लोग भटिंडा ( पटियाला रान्य ) के रास्ते गये थे जहाँ वे अपने नाम के चिह्न छोड़ गये । ( यह चिह्न ' मालवई ' नामक बोली के रूप में है जो फीरोजपुर से भटिंडा वक बोली जा रही है ) और उस प्रदेश का नाम ही मालव पड़ गया । मालव नाम का अवशिष्ट अब तक उस प्रांत के ब्राह्मणों में मिलता है । जो मालवी कहलाते हैं । अब इस शब्द को संस्कृत रूप देकर ' मालवीय ' बना लिया गया है । ये मालवीय ब्राह्मण गौरवर्ण के और सुन्दर होते हैं — विशेष रूप से बुद्धिमान होते हैं । ये लोग बढ़ते - बढ़ते इलाहाबाद तक आकर बस गये हैं ।
(ii) सुप्रसिद्ध संशोधक - विद्वान् राहुल सांकृत्यायन का कहना है कि ' मालव ' देश का पुराने समय में यह नाम नहीं था ।
(iii) बुद्ध के समय और बहुत पीछे तक भी उसे अवन्ती जनपद कहा करते थे । मालव मल्ल का ही दूसरा रूप है । मल्लजन भारत में प्रथम आये । आर्यो के मूल जनों ( कबीलों ) में से एक थे के समय में मल्लो का गण मही ( गंडक ) , गंगा , सरयू नदियों के बीच में उस जगह था , जहाँ कि आज छपग जिला और गोरखपुर जिले का दक्षिणी भाग है । लेकिन मालवा में जो मल्ल गये , वे ये पूर्वी मल्ल नहीं थे । आज कल पूर्वी पजाब के फीरोजपुर आदि जिलों को भी मालवा कहते हैं । और मल्ल वंश वाले वहाँ बहुत से जाट अब भो बसते हैं । लेकिन सिकन्दर के समय ( ई ० पूर्व ४ थी सदी ) जिन मल्लो ने सिकन्दर की सेना के दाँत खट्टे किये थे और खुद सिकन्दर को घायल किया था ' ( यही घाव अन्त में सिकन्दर की मृत्यु का कारण हुआ ) , वे पश्चिमी पंजाब के वर्तमान मंग आदि जिलों में रहते थे ।
(iv) जान पड़ता है यूनानियों और शकों के पंजाब के शासन के समय ( ई ० पूर्व पहली सदी ) में उनमें से कुछ अपने जनपद में परिस्थिति प्रतिकूल देख प्रवास करने पर मजबूर हुए । और अंत में उनका प्रभुत्व इतना जमा कि उसका नाम ही बदल कर मालवा हो गया ? !
(v) जो कुछ भी हो , भारत - जननी के हृदय - स्थानीय इस मालव - प्रदेश की अनादिकाल से प्रतिष्ठा प्रमाणित है । यह जनपद अपनी लोकोत्तर श्रेष्ठता - ज्येष्ठता , वीरता - धीरता , काव्य - कला - कुशलता , वाणिज्य - उद्योगशालिता के लिये गर्वोन्नत - नाम का धारक है । इसी धर्म - भूमि के रण - बंके तरुणों ने अपनी करवाल - लेखनी से यूनान सार्वभौम के दानवाकार और अथक लड़ाके सिपाहियों के वज्र - पुष्ट शरीरों पर अपनी अडिग साहसिकता का अटल कीर्ति लेख अंकित किया । ऐसा ज्ञात होता है कि सम्राट विक्रमादित्य के समय में मालव शुद्ध गणतन्त्र राष्ट्र था और उसके सरक्षक के पद पर स्वयं सम्राट कार्य करते थे ।
(vi) आह ! आज का मालवा तो सिमट कर उज्जैन के इर्द - गिर्द में समाप्त हो गया है । जो मालवा पूर्वकाल में अपनी संगीत - साहित्य महाविद्या के लिये प्रसिद्ध था वह आज की ब्रिटिश सरकार की छत्रच्छाया में ' अफीम ' के व्यापार का सब से बड़ा ' अड्डा ' है । जिस मालवा की कहावत है
'मालव धरती गहन गम्भीर !
पग पग रोटी मग मग नीर !!'
इससे सिध्द होता है कि मालवा जनजाति और सुर्यवंशी प्राचीन और मूल भारतीय है और उनके वंशज गंधर्वसेन या गर्दभिल्ल तथा विक्रमादित्य और शालिवाहन, भरथरी है जिन्हें आगे चलकर अग्निवंशीय कहा गया। इस मालवों को वामपंथी बाहर से आया बतलाकर और मालव गंधर्वसेन या गर्दभिल्ल को भील बताकर क्या दिखाना चाह रहे हैं यह समझ लिजिए। वे दो कार्य कर रहे हैं - -
(i) मालव सुर्य वंशीय क्षत्रिय जनजाति के गर्दभिल्ल (गर्दभ गंधर्व) को भील बता रहे हैं न कि मालव। उज्जयिनी के शासक उनके नुसार मालव नहीं भील थें। और गर्दभिल्ल ही भीलवंश था न कि मालववंश।
(ii) दुसरा वे मालवों को उज्जयिनी या अवन्ति या मालवा में बाहर से आने वाले बता रहे हैं।
लेकिन हमने उपर सिकंदर आक्रमण के समय मालव तथा उनके अवन्ति में स्थानांतरण से और महाभारत एवं नंदसा अभिलेख इतने मूल साक्ष्यों से मालव जाति के बाहर से आने के मतिविहीन सिध्दांत का खण्डन किया। अवन्ति में मालव क्षत्रिय बसे फिर अवन्ति मालवा हुई। मालवगणमुख्य विक्रमादित्य से पूर्व से राजा गंधर्वसेन के समय से मालवा का शासन केवल मालव लोग ही करते थे और इसलिए गर्दभिल्ल वंश ही मालव है पृथक नहीं। वामपंथी इन्हें पृथक सिध्द करने का हर संभव प्रयास कर रहे हैं। विकिपीडिया पर उन्होंने कुप्रचार आरंभ कर दिया है। इनसे सावधान रहें।
(28) मालव जाती क्या है मालवों का इतिहास क्या है?
उपरोक्त लेख में मालवों के लिए अधिक नहीं लिखा गया है इसलिए फिर से इन संदर्भग्रंथो के अनुसार हम मालव कौन थे इस विषय पर कुछ एतिहासिक तथ्य संक्षेप में कह रहे हैं ताकि मालव तथा मालवगण सभी को स्पष्ट हो जाए....
(i) महाभारत में मालवों के उल्लेख मिलते है। अपनी पड़ोसी जाति क्षुद्रकों की तरह मालव के उल्लेख मिलते हैं। अपनी पड़ोसी जाति क्षुद्रकों की तरह मालव भी महाभारत युद्ध में कौरवों की ओर से लड़े थे।
(ii) महाभारत कालिन यही #मालव_क्षत्रिय पंजाब में निवास करते थे जहाँ उनकी तरह अंवष्ट, यौधेय आदि जनों का भी आवास था। उसके बाद कई शताब्दियों तक वे वही बने रहे।
(iii) यूनानी सम्राट सिकन्दर के आक्रमण के समय मालवगण का राज्य मुख्यतया रावी और चिनाव के दोआब में था। क्षुद्रकों का राज्य मालवों के राज्य से लगा हुआ था। अतएव मालवों ने क्षुद्रकों के साथ सुदृढ़ ऐक्य स्थापित किया था। दोनों सेनाओं ने वीरता और दृढ़ता के साथ डटकर सिकन्दर का सामना किया। यूनानी इतिहासकार एरियन के अनुसार पंजाब में निवास कर रही भारतीय जातियों में मालव और क्षुद्रक संख्या में बहुत अधिक तथा सबसे अधिक युद्धकुशल थे। अतः उनकी सेनाओं का सामना करने से यूनानी सेना भी हिचकिचाने लगी थी, जिससे सिकन्दर को स्वयं आगे बढ़ना पड़ा था और उस युद्ध में वह विशेष आहत भी हुआ था। अन्त में मालव पराजित हुए और उन्हें हथियार डालने पड़े।
(iv) पाणिनि के अनुसार मालवगण एक 'आयुधजीवी' संघ थे। युद्धविद्या में निपुणता प्राप्त करना इस संघ के प्रत्येक नागरिक का प्रधान कर्तव्य होता था, अतः वहाँ सभी निवासी योद्धा हुआ करते थे। मालवों का समाज अपनी पूर्ण और विकसित अवस्था को पहुँच चुका था। उसमें क्षत्रिय, ब्राह्मण आदि कई वर्ग होते थे। जो व्यक्ति क्षत्रिय या ब्राह्मण आदि कई वर्ग होते थे और अन्य वर्गो के लोग 'मालव्य' कहलाते थे।
(iv) मालवगणों का अधिकारक्षेत्र बहुत विस्तृत और संगठन अति बलशाली था जिससे उनको पराजित करना कठिन होता था। कात्यायन और पतञ्जलि ने भी क्षुद्रक मालवी सेना का उल्लेख किया है। इसके बाद क्षुद्रकों का कहीं कोई उल्लेख नहीं मिलता, जिससे यही अनुमान होता है कि सिकंदर के आक्रमण के समय स्थापित 'मालव-क्षुद्रक ऐक्य' समय पाकर अधिकाधिक बढ़ता ही गया और अंत में क्षुद्रक मालवों में ही पूर्णतया समाविष्ट हो गए।
(v) मौर्य साम्राज्य के पतन के बाद बाख्त्री (बैक्ट्रियन) और पार्थव (पार्थियन) राजाओं ने जब पंजाब तथा सिन्ध पर आधिपत्य स्थापित कर लिया, तब अपनी स्वतंत्रता तथा स्वशासन को संकटापन्न देखकर ईसा पूर्व की दूसरी शताब्दी में मालवगण विवश हो पंजाब छोड़कर दक्षिण पूर्व की ओर बढ़े। सतलज पारकर पहले कुछ काल तक वे फिरोजपुर, लुधियाना और भटिंडा के प्रदेश में रहे, जिससे वह क्षेत्र अब तक 'मालव' कहलाता है। किन्तु यहाँ भी वे अधिक काल तक नहीं ठहर पाए और आगे बढ़ते हुए वे उसी शताब्दी में अजमेर से दक्षिण पूर्व में टोंक-मेवाड़ के प्रदेश मे जा पहुँचे तथा वहाँ अपने स्वाधीन गणराज्य की स्थापना की। टोंक से कोई २५ मील दक्षिण में स्थित कर्कोट नागर नामक स्थान उनका मुख्य केंन्द्र रहा होगा, वहाँ मालवों के विभिन्न कालों के सैकड़ों सिक्के प्राप्त हुए हैं।
(vi) कुषाण साम्राज्य के उत्थान के साथ ही गुजरात में उनके अधीन पश्चिमी क्षत्रपों ने उज्जैन को जीतकर मालवों पर भी अपना आधिपत्य स्थापित किया था।
(vii) जैन ग्रंथों के अनुसार शकों को वहाँ लाने में कालकाचार्य का विशेष हाथ था। परन्तु स्वातंत्रय प्रेमी मालव निरन्तर विद्रोह करते रहते थे। उत्तम भद्रों के सहायतार्थ महाक्षत्रप नहपाण को उषवदात्त (ऋषिभदत्त) के नेतृत्व में मालवों के विरुद्ध सेना भेजनी पड़ी थी। अंत में मालवों के सहयोग से गौतमीपुत्र शातकणीं ने महाक्षत्रप नहपाण और उसके साथी शकों का पूर्ण संहार किया। नहपाण और गौतमीपुत्र शातकर्णी के सही सन् संवतों के बारे में इतिहासकार एकमत नहीं है।
(vii) कुछ इतिहासकारों के अनुसार इससे भी पहिले मालवगणों की ही एक शाखा के प्रमुख, उज्जैन के पदच्युत अधिपति गर्दभिल्ल के पुत्र, विक्रम ने पराजित कर शकों को उस प्रदेश से निकाल बाहर किया था। यद्यपि बाद में शकों ने उनपर पुन: आधिपत्य स्थापित कर लिया था तथापि तीसरी शती के प्रारंभ में श्री सोम के नेतृत्व में उन्होंने फिर मालव गणराज्य की स्वाधीनता घोषित कर दी।
#संदर्भ_ग्रंथ 📖
(1) पाणिनि कालीन भारत' : डॉ॰ वासुदेव शरण अग्रवाल कृत (हिंदी अनुवाद)।
(2) भारतीय प्राचीन लिपिमाला, डॉ॰ गौरीशंकर हीराचंद ओझा कृत (द्वितीय संस्करण)।
(3) 'दी वाकाटक गुप्त राज', मजुमदार और अल्तेकर द्वारा संपादित।
(4) 'ए कांप्रिहेंसिव हिस्ट्री ऑव इंडिया', खंड २, प्रो॰ नीलकंठ शास्त्री द्वारा संपादित।
(5) 'दि एज ऑव इंपीरियल यूनिटी', मजुमदार द्वारा संपादित, (भारतीय विद्याभवन, बंबई)।
(6) विक्रमादित्य ऑव उज्जयिनी, डॉ॰ राजबली पांडेय कृत।
✍️ संकलनकर्ता एवं लेखक : Aniket Gautam
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