विराङ्गना नीलदेवी
वीराङ्गना नीलदेवी...
भारत में ही नहीं , अपितु सारे विश्व में नारी शक्ति समझी गयी है । नारीत्व के इतिहास ने ही वीरता का मुख उज्वल कर रक्खा है । देश , कुल और आत्मसम्मान की रक्षा के लिये नारियों ने समय - समय पर अपने कुसुमवत् जीवन की बलि दे दी है ।
म्लेच्छो के आक्रमण व संघर्षकाल की बात है , पंजाब प्रान्त के नूरपुर राज्य में राजा सूरजदेव की तूती बोल रही थी । उनकी रानी नीलदेवी अपनी सुन्दरता और संगीत - निपुणता के लिये प्रसिद्ध थी । पंजाब उस समय यवन - सेनापति अब्दुलशरीफ खाँ के द्वारा आक्रांत हो रहा था । छलपूर्वक आक्रमण व कब्जे के अनन्तर हिन्दुओं को मुसलमान बना लेना उनकी बहू - बेटियों को धर्मभ्रष्ट कर देना आदि उसकी रणयात्रा का किताबी G-हादी उद्देश्य था । वह बढ़ते - बढ़ते नूरपुर तक आ गया राजा सूरजदेव ने अपनी छोटी - सी सेना लेकर बड़ी शूरता से उसका सामना किया , यवनाधिपति अथवा उक्त मलेच्छ की हार - पर - हार होने लगी ।
किंतु अन्त में उसने एक दिन धोखे से राजा को कैद कर पिंजरे में डाल दिया । राजपूतों में खलबली मच गयीं । राजकुमार सोमदेव ने प्रण कर लिया कि या तो वह अपनी वीर सेना के साथ वीर गति को प्राप्त करेगा या यवन - सेना को धूलि में मिला देगा । पतिव्रता नीलदेवी ने उसे ऐसा करने से रोका और ' शठे शाठ्य ' समाचरेत् ' की नीति से काम निकालना चाहा । उसने अपनी संगीत - कला का उपयोग किया । एक नाचनेवाली का भेष बना कर और साजिदों के रूप में सैनिकों को साथ लेकर वह यवनसेनापति के खेमे में पहुँच गयी । उसने चोली के भीतर दुधारी कटार रख ली थी । मदिरापान चल रहा था , यवन नशे में झूम रहे थे । कला की साक्षात् सजीव मूर्ति ने यवन सेनापति अब्दुलशरीफ का चित्त काम वासना से चञ्चल कर दिया । वह उन्मत्त हो उठा । रानी नाचने लगी । वह गाती जाती थी और साथ - ही - साथ खान को प्याले - पर - प्याला शराब भी पिलाती जाती थी । उस मनचले ने अपनी कीमती अंगूठी उतार कर रानी को देनी चाही ; परन्तु उस छद्मवेशा करालवदना काली ने यह कहकर लेने से इन्कार कर दिया कि ' सब इनाम एक साथ ले लूँगी । '
पिंजरे में बंद राजा सूरजदेव विस्मित हो उठे । उन्हें रानी का नाच देखकर बड़ा क्रोध आ रहा था । वह उसे कुलटा समझकर पागल हो उठे । उन्हें वास्तविकता का कुछ भी ज्ञान नहीं था । इधर खान की कामज्वाला बढ़ रही थी ।
उसने रानी को खींचकर पास बैठा लिया और चुम्बन के लिये ज्यों ही हाथ - पैर डुलाये कि रानी ने कटार निकाल कर उस नराधम की छाती में भोंक दी और फिर उसी रक्तरञ्जित कटार को उसके मुख में डालकर बोली - ' पापी ! नीच ! ले , पहले इसका चुम्बन कर । '
साजिंदे के भेष में आये हुए उन क्षत्रियों ने तबले , सारंगी और सितार पटककर तलवारें निकाल लीं । कुमार सोमदेव ने भी बाहर से हमला कर दिया । राजा पिंजरे के लोह - छड़ तोड़कर बाहर निकल आया और दुश्मनों को यम के हवाले करने लगा । घमासान युद्ध छिड़ गया , पर थोड़ी ही देर में धोखे से एक यवन ने राजा का सिर काट लिया ।
रानी ने झटपट पति का सिर उठा लिया और शत्रुओं पर प्रहार करती हुई खेमे के बाहर चली आयी । पति का सिर गोद में लेकर अनल अधिन हो गयी । लेकिन राजकुमार सोमदेव ने शत्रुओं पर विजय पायी । आगे रानी के पुत्र का राजतिलक किया गया । इस प्रकार वीराङ्गना नीलदेवी जैसी आदर्श मलेच्छक्षयकारी,प्रेरक नारीशक्ती के सतीत्व का अक्षुण्ण तेज, क्षात्र धर्म व बलिदान इतिवृत मे अमर हो गया।
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