निद्रा...
#निद्रा...
अन्तर्यात्रा विज्ञान की प्रत्येक कड़ी आपको अपनी सम्भावनाओं से परिचय कराती है । इन्हें साकार और सम्भव करने की विधियाँ सुझाती हैं । इस योग कथा के पाठकों से योगसूत्र का महर्षि पतञ्जलि का कहना है कि सम्भावनाएँ केवल विभु में ही नहीं अणु में भी है । पर्वत में ही नहीं राई में भी बहुत कुछ समाया है । जिन्हें हम तुच्छ समझ लेते हैं , क्षुद्र कहकर उपेक्षित कर देते हैं । उनमें भी न जाने कितना कुछ ऐसा है जो बेशकीमती है । जागरण के महत्त्व से तो सभी परिचित हैं । महर्षि कहते हैं कि निद्रा भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं है । इस सूत्र में योग सूत्रकार ने मन की तीसरी वृत्ति ' कल्पना ' के बारे में बताया है । इन कल्पनाओं का यदि कोई ढंग से सदुपयोग करना सीख जाय तो जीवन की डगर में बढ़ते हुए हर कदम पर नए खजाने मिल सकते हैं । अब महर्षि चौथी वृत्ति के स्वरूप और सत्य को समाधिपाद के दसवें सूत्र में उद्घाटित करते हैं
❛ अभावप्रत्ययालम्बना वृत्तिर्निद्रा ❜ ॥ योगसुत्र1/10 ॥
शब्दार्थ - अभाव - प्रत्यय - आलम्बना = अभाव की प्रतीति को आश्रय करने वाली , वृत्ति = वृत्ति , निद्रा = निद्रा है ।
❝अर्थात् मन की यह वृत्ति जो अपने में किसी विषय वस्तु की अनुपरिस्थिति पर आधारित होती है - निद्रा है । यही निद्रा ही सार्थक और यथार्थ परिभाषा है । ❞
नींद के अलावा हर समय मन अनेकों विषय वस्तुओं से भरा रहता है । भारी भीड़ होती है मन में विचारों की रेल पेल , अन्तर्द्वन्द्रों की धक्का मुक्की क्षण - प्रतिक्षण हलचल मचाए रहती है । कभी कोई आकाँक्षा अंकुरित होती है तो कभी कोई स्मृति मन के पटल पर अपना रेखा चित्र खींचती है , यदा - कदा कोई भावी कल्पना अपनी बहुरंगी छटा बिखेरती है । हमेशा ही कुछ न कुछ चलता रहता है । यह सब क्षमता तभी होती है जब सोये होते हैं गाढ़ी नींद में । मन का स्वरूप और व्यापार मिट जाता है , केवल होते हैं आप अपने क्षुद्रतम रूप में बिना किसी उपाधि और व्याधि के ।
नींद के क्षण बड़े असाधारण और आश्चर्य जनक होते हैं , कोई इन्हें समझले और सम्हाल ले तो बहुत कुछ पाया जा सकता है । ऐसा होने पर साधकों के लिए यह योगनिद्रा बन जाती है , जबकि सिद्ध जन इसे समाधि में रूपांतरित कर लेते हैं । दिन के जागरण में जितनी गहरी साधनाएँ होती हैं , उससे कहीं अधिक गहरी और प्रभावोत्पादक साधनाएँ रात्रि की नींद में हो सकती है ।
ऋग्वेद के रात्रि सूक्त में रात्रि की महिमा का बड़ा ही तत्त्वचिंतन पूर्ण गायन किया गया है । इस सूक्त के आठ मंत्र निद्रा को अपनी साधना बनाने वाले साधकों के लिए नित्य मननीय है । इनमें से छठवें मंत्र में ऋषि कहते हैं -
❝ यावयावृक्यं वृकं यवय स्तेनभूर्म्ये ।
अथा नः सुतरा भव ॥ ❠
~ ऋ. १०-१२७-६
❛ हे रात्रिमयी चित्शक्ति ! तुम कृपा करके वासनामयी वृकी तथा पापमय वृक को अलग करो । काम आदि तस्कर समुदाय को भी दूर हटाओ । तदन्तर हमारे लिए सुख पूर्वक तरने योग्य बन जाओ । मोक्षदायिनी एवं कल्याणकारिणी बन जाओ । ❜
ये स्वर हैं उन महासाधकों के जो निद्रा को अपनी साधना बनाने के लिए साहस पूर्ण कदम बढ़ाते हैं । वे जड़ता वे पूर्ण तमस और वासनाओं के रजस् को शुद्ध सत्व में रूपांतरित करते हैं । और निद्रा को आलस्य और विलास की शक्ति के रूप में नहीं जगन्माता भगवती आदि शक्ति के रूप में अपना प्रणाम निवेदित करते हुए कहते हैं - -
❝या देवी सर्वभूतेषु निद्रा रूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥❞
- - श्री दुर्गासप्तशती
अर्थात् जो महा देवी सब प्राणियों में
निद्रा रूप में स्थित हैं । उनको नमस्कार ,
उनको नमस्कार उनको बारम्बार नमस्कार है ।
रहस्यमय स्वप्न जगत स्वप्न के विषय में विचार करने से पूर्व हमें भारतीय संस्कृति के आध्यात्मिक अंग को समझ लेना आवश्यक है जैसा कि आपको ज्ञात होना चाहिए सूक्ष्म जगत भारतीय योगी , साथकों , तत्ववेत्ताओं से प्रभावित प्रायः सभी मर्तो ने किसी न किसी रूप में इस तथ्य को स्वीकार किया है कि दृश्यमान जगत ही सब कुछ नहीं है । इसके बाद भी कुछ ऐसे जगत हैं जो हमारी भौतिक इन्द्रियों के सामने प्रत्यक्ष नहीं होता फिर भी हम उस अभौतिक सत्ता को अस्वीकार नहीं कर सकते हैं । उस सूक्ष्म जगत का संचालन कौन सी अदृश्य सत्ता कर रही है ? क्या हमारे क्रियाकलाप उसी सूक्ष्म जगत के आधार पर चलते हैं अर्थात जो घटना में घटती है वहां भी घटती रहती है या उसका प्रतिबिम्ब मात्र पड़ता है । इसमें देश और काल का कोई निश्चित व्यवधान नहीं होता । जिससे यहां वर्षों लग जाते हैं वहीं सूक्ष्म जगत में क्षणों में हुई रहती है । दूसरा तात्पर्य यह है कि जिसमें यहां अधिक समय लगता है वह वहां कुछ क्षणों में हो सकता है । कहने का तात्पर्य यह है कि सूक्ष्म जगत में घटित घटनाओं का प्रतिबिम्ब हमारी सूक्ष्म इन्द्रियां ग्रहण करती हैं । स्वप्नों की इन्द्रधनुषी और खौफनाक संसार बहुत हद तक मनुष्यों के अवचेतन मन से जुड़ा रहता है । आधुनिक परामनोवैज्ञानिकों का मत है कि अवचेतन मन का एक अज्ञात संसार है जहां से जीवन की प्रक्रिया प्रारम्भ होती है और भौतिक जगत में जन्म लेती या साकार होती है । इस प्रकार अवचेतन मन का संसार चेतन जगत का मुख्य स्रोत है । उसी अवचेतन ( परम चैतन्य ) के कारण प्रत्येक जीवित प्राणी में गति होती है और वह सक्रिय होकर कार्य करता है । अवचेतन में प्रकृति अपने आप खिलती है । चेतन मन में असहजता के कारण विकार ही नाना रूप से ग्रहण करके स्वप्नों के भाव जगत में प्रतिबिम्बित होते हैं । कहने का तात्पर्य है अवचेतन मन सहज है निर्दोष है वह प्रकृति के साथ एक लय है । वैज्ञानिकों के शोध से यह प्रमाणित हो चुका है । कि चेतन तत्व और अवचेतन तत्व में जितना द्वन्द होगा उतनी ही स्वप्नों की भरमार होगी । अवचेतन तत्व नैसर्गिक है ।
मानवीय संस्कारों की अभिव्यक्ति अवचेतन तत्व के माध्यम से स्वप्नों में अधिक होती है । वैज्ञानिक अध्ययन से यह सिद्ध हो चुका है कि स्वप्नों का रहस्यमय संसार निर्मित होता रहता है हर नब्बे मिनट के अन्तराल के बाद मनुष्य नींद में स्वप्न अवश्य देखता है । आपको ज्ञात होना चाहिए कि अवचेतन मन भाव जगत में संचरण कर रहा होता है तब चेतन मन सक्रिय नहीं रहता वह सुप्तावस्था में चला जाता है । कभी - कभी स्वप्न की अवस्था में ऐसा आभास होता है कि सपनों का सारा व्यापार इतनी तेजी से होता है कि वहां समय का महत्व ही नहीं रह जाता । अतः शोध से यह बात स्पष्ट होती है चेतन मन से सम्बन्धित जो अतीन्द्रिय ज्ञान शक्ति से अवश्य होता है इसे परा जगत भी कहा जा सकता है । यह परा जगत मनुष्य के अवचेतन मन का भाव जगत है । जहां भविष्य में होने वाली घटनाओं का पूर्वाभास कभी - कभी आकस्मिक ढंग से मिल जाया करता है । साथ ही अतीत में घटित घटनाओं का भी ।
हमारे पुराणों (इतिहास) , ज्योतिष और आयुर्वेद के ग्रन्थों में स्वप्न विज्ञान का पर्याप्त प्रमाण मिलता है । भारतीय योगियों ने स्वप्न की चार अवस्थाएं मानी हैं । जाग्रत , स्वप्न , सुषुप्ति और तुरीय । जाग्रत अवस्था में हमारी प्रायः सारी इन्द्रियां जाग्रत रहती हैं । स्वप्न अवस्था में सुप्त यानि निष्क्रिय रहती है । केवल मन इन्द्रियों से रहित होकर पुरीतनि नामक सूक्ष्म नाड़ी में प्रवेश कर अपना कार्य करता है । इस अवस्था में भौतिक इन्द्रियों से सम्पर्क न रहने के कारण उनके विषयों भौतिक पदार्थों का मन को ज्ञान नहीं रह जाता किन्तु सूक्ष्म नाड़ी में रहने से सूक्ष्म जगत में उसका सम्बन्ध रहता है और वह अपनी सामर्थ्य और के की घटनाओं या दृश्यों का वे भूत हो या भविष्य को साक्षात्कार करता है और सुषुप्ति में मन भी निष्क्रिय हो जाता है अतः उसे किसी प्रकार का आभास नहीं होता शायद यही निद्रा की अवस्था हो ।
भारतीय संस्कृति में पूर्वजन्म एक मान्य सिद्धान्त है अतः कुछ ऐसे होते हैं जो जन्म - जन्मान्तरों से हमारे मन में समाये रहते हैं अर्थात पूर्व जन्मों से हमारे द्वारा दृष्ट , श्रुत , अनुभूत आदि की छाप हमारे मन के पटल पर रहती है अतः वर्तमान जन्म में प्रत्यक्ष अथवा उन्हें वर्तमान में देखने - सुनने आदि में असमर्थ पाते हुए भी हम स्वप्न में उनका अनुभव प्रत्यक्ष कर लेते हैं ।
योग में स्वप्न को दो प्रकार का माना है भविष्य और दोषज भविष्य का अर्थ है भविष्य में होने वाली घटनाओं का पूर्वाभास भविष्य में होने वाली सूक्ष्म जगत में घट जाने से मन को किसी प्रकार का ज्ञान हो जाता है । ऐसी घटनाओं को मन देखता है और किस रूप में यह कहा नहीं जा सकता । जो घटनायें देखी जाती हैं वे कहां तक सत्य होती है यह मनुष्य के स्वप्न देखने पर निर्भर करता है और विश्लेषण करने पर भीं । दोषज स्वप्न वे हैं जो वात , पित्त और कफ इन तीनों के कुपित होने पर स्वप्न दिखते हैं । आयुर्वेद के चरक संहिता में विस्तार से वर्णन मिलता है । दोषज स्वप्न वे हैं जो सोते समय मन का घबड़ाना , डरावने सपने आना , खाई में गिरना जंगल में भटक जाना , जानवरों के दौड़ाने आदि ।
💥 अवचेतन मन- अवचेतन मन की पहुंच केवल मानव शरीर तक ही सीमित नहीं है वह असीमित है । संसार के किसी भी भाग में जब चाहे जा सकती है । भूत , भविष्य और वर्तमान का ज्ञान अवचेतन मन से सम्भव है । अवचेतन मन के इस रहस्य का ज्ञान आदिकाल से ऋषि - मुनियों को पता रहा उनके त्रिकालज्ञ होने का यही रहस्य है । जिनके विषय में अनेक उदाहरण सुनने को मिलते हैं । वे भूत , भविष्य का वर्णन इस प्रकार करते थे मानो वे उस घटना को प्रत्यक्ष देख रहे हों या उस धन को कभी देखा हुआ है । उनकी भविष्यवाणी का अक्षरसः सत्य होने का कारण अवचेतन मन है । ऐसे बहुत सारे रहस्यों को जो अवचेतन मन ग्रहण करने में समर्थ है ।
प्राचीन काल से मानव स्वप्नों के प्रति जिज्ञासा रखता आया है एक प्रकार है से सत्य भी है शायद आपको ज्ञात हो सम्पूर्ण जगत में केवल मानव मात्र ही स्वप्न देखता है और अपने तरीकों से करता है विश्लेषण । वर्तमान वैज्ञानिक शोध से पता चला है । पशु - पक्षी भी स्वप्न देखते हैं लेकिन मानव की तरह उसका विश्लेषण नहीं कर सकते हैं । कहा जाये तो ईश्वर प्रदत्त स्वप्न मानव की सर्वश्रेष्ठ निधि कही जा सकती है । जिस समय हमारी पांचों ज्ञानेन्द्रियां , कर्मेन्द्रियां कर्म नहीं करती थीं उस समय जो हम देखते हैं वह स्वप्न कहा जा सकता है । हम स्वप्न में उसी प्रकार है हिस्सा लेते हैं जैसे वास्तविक जीवन में प्राचीन योगियों का मत है कि मानव शरीर में बहत्तर हजार नाड़ियां या उससे भी अधिक विद्यमान हैं । खासकर तीन नाड़ियां मुख्य हैं- इड़ा , पिंगला और सुषुम्ना योग में सुषुम्ना नाड़ी की महत्ता है । सुषुम्ना नाड़ी में आकाश तत्व प्रधान है तथा यह प्रकाशमयी भी है । अतः इस प्रकाशमयी नाड़ी को ही ब्रह्माण्ड के रहस्य से मन का सम्बन्ध जोड़ने और व्यापक बनाने वाली है।
प्रसिद्ध वैज्ञानिक जेम्सवाट को शाटगन के लिए शीशे की गोलियां बनाने की एक सरल विधि के रहस्य स्वप्न के माध्यम से हुए थे । आपको विश्वास हो या न हो पर यह सत्य है कि गणित के अनेक जटिल समस्याओं के हल भी सपनों की दुनिया से जन्मे हैं । फ्रांस के प्रख्यात गणितज्ञ हेनरी फोर ने विश्व भर में फैले अपने सहयोगियों से एक प्रश्न किया कि आपको गणित की जटिल समस्याओं को हल करने की प्रेरणा कहां से प्राप्त होती है । मनन - चिन्तन से या अपने साथियों से विचार विमर्श करके । ७६ % लोगों ने उत्तर दिया स्वप्न के माध्यम से ।
प्रसिद्ध वैज्ञानिक आईंस्टीन से एक पत्रकार ने पूछा कि आपके सृजनात्मक प्रक्रिया का रहस्य क्या है ? इस पर महान वैज्ञानिक आईंस्टीन ने कहा- एक स्थिति सुप्तावस्था और स्वप्नावस्था में ऐसी आती है जब बुद्धि एक लम्बी छलांग सी लगा कर बोध के उच्चस्तर पर पहुंच जाती है । संसार के अधिकांश वैज्ञानिक अविष्कार इसी स्थिति में सम्भव हुए हैं । आइंस्टीन का विश्वास था कि गणित और विज्ञान की सहायता से यह सिद्ध किया जा सकता है कि जगत एक स्वप्न है , एक लम्बा स्वप्न । यही बात तो हजारों वर्ष पूर्व हमारे ऋषियों ने कहा- जगत मिथ्या है , जगत एक स्वप्न है ।
अपने मृत्यु पूर्व आइंस्टीन ने लाईफ नामक पत्रिका के एक प्रतिनिधि से बातें करते समय एक वृक्ष की ओर इशारा करते हुए कहा था- कौन पूरी सच्चाई और ईमानदारी के साथ यह कह सकता है कि यह एक वृक्ष ही है यह स्वप्न भी हो सकता है । अनेक वैज्ञानिकों ने स्वीकार किया है कि जटिल वैज्ञानिक समस्याओं के हल उन्हे मात्र चिन्तन या मनोयोग से ही प्राप्त नहीं होते बल्कि नींद के बाद इन समस्याओं का समाधान अवचेतन मन अनायास ही प्रस्तुत कर देता है ।

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