It is my personal life कहना अवैज्ञानिकता व अज्ञानीपण के लक्षण है..
कोई भी पापकर्म कथित निजी वस्तु नहीं है...
कोई भी अधर्म पाप या तामसिक राजसी वस्तु को निजी या वैयक्तिक रूप से साझा करके आप बच नहीं सकते। ऐसा तो कम पढ़ा जाता है या जो अज्ञानी है, राष्ट्र या अपनी सभ्यता के इतिहास से अनाभिज्ञ हैं, विज्ञान और अध्यात्म का एक हिस्सा भी नहीं पता तीन पीछे, औपनिवेशिक दास और तंत्र है वही लोग ये कहते हैं हमारे देश में पाए जाते हैं। फिल्मी भांडवर्ग विशेष रूप से ये कहा गया है। पश्चिम में अविद्या आदि दोषों से कुसंस्कारित है। अधिकांश भारतीयों में आत्मा की भावना, राष्ट्र के आयमो में मित्रता की भावना नहीं। आज़ादी का दर्शन नहीं। जिनको ये सब है ही नहीं, बंदर से भी ज्यादा चंचल, जानवरों से हिन दीन, मुर्ख लेवल के ये लोग होते हैं, पहचान के तौर पर जो स्टैप चड्डी पर सच्चाई ढूंढते हैं, वे अक्सर ये व्यक्तिगत वाली बातें कहते पाए जाते हैं। ये कटु सत्य है। अस्तु
(1) कथित निजीपन का वैज्ञानिक दृष्टि से खंडन
(2)उसेवाली हानियाँ या परिणाम
(3) समाधान व निष्कर्ष या चर्चा
💥निजी जीवन का वैज्ञानिक विश्लेषण खंडन :
वैश्याचारी हो, वैश्या, तामसिक आहार वाले, कामी वैश्य कामांध मदांध नर-नारी हो,आत्मव्याभिचारी, व्यवहार वाले, दुष्टों को फैलाने वाले भी बैल हो चिजो के निर्माता ही नहीं दर्शक भी, मंदिर पर्वत तक में चढ़ी घूमती हुई निर्लज्ज बालाएं हो, दुषित विचार: अब्रह्मचर युक्त मानसिक मुक्ति करने वाले भी, परमार्थ शराब से अपवित्रता उत्पन्न करने वाले हो, वे वर्तमान में एक बचकाना कुतर्क स्थापित करेंगे कि ये मेरी निजी स्वतंत्रता है। प्रश्न है कि ये सदस्यता निजी है। समझीए...
विश्व में शक्ति के उपकरण भी हैं उनकी विचारधारा की शक्ति सबसे तीव्र और प्रबल है। विचार की रचना परमाणुमयी है। ये आकाश में व्याप्त ईथर तत्व के सूक्ष्म कण समूह हैं। संरचनात्मक रचना मन के अदृश्य स्तर में होती है। 'ईथर' तत्व समग्र विश्व में प्रचुरता से व्याप्त है। इसी माध्यम के अनुसार एक स्थान से दूसरे स्थान तक भेजा जा सकता है। हम दृढ़ इच्छा शक्ति एवं अनुशासन द्वारा अपने विचार अन्य मस्तिष्कों में फेंक सकते हैं। 'ईथर' का अदृश्य माध्यम विचार ऑपरेशन क्रिया में सबसे बड़ा सहायक सिद्ध हुआ है। प्रकाश की सूक्ष्म तरंगों की तरह की लहरें भी संचरित होती हैं। प्रत्येक परमाणु दूसरे परमाणु को गति प्रदान करता है, दूसरे तीसरे को, तीसरे चौथे को, इस प्रकार विचार की तरंगें ईथर माध्यम में अमित वेग से चलती हैं। प्रकाश की गति एक मिनट में लाखों मील की है दूसरा विचार की गति और भी अधिक है। चैतन्य वहि होने के कारण उसकी गति अप्रतिहत है। दुनिया का कोई भी संवैधानिक आईसीएस वेग अवरूद्ध नहीं कर सकता। यह एक प्रचलित बात है कि जो वस्तु इतनी ही सूक्ष्म या चेतन होती है उसका बल भी उतना ही अधिक होता है। जल से वाष्प, वायु से वायु, वायु से आकाश, आकाश से प्रकाश और प्रकाश से विद्युत में जड़ता कम और चैतन्य अधिक है। इसी प्रकार एक ही प्रतियोगिता दूसरा अधिक शक्तिमान है।
जिस यंत्र द्वारा मन से विचार निकाला गया है वह मस्तिष्क एक प्रकार का बड़ा शक्तिशाली 'डायनेमो' है। मूलतः केन्द्रस्थान में विचार की गति अत्यंत तीव्र है। यह प्रबल वेग से विचारधारा की लहरें ईथर के वायुमंडल में फेंकी जाती है अर्थात् विचार से कम्पन और उसकी तरंगें उत्पन्न होती हैं। प्रत्येक विचार एक विशिष्ट प्रकार की तरंग उत्पन्न करता है और मनुष्य के मस्तिष्क में अपने विभिन्न तरंगों को ग्रहण करता है। जैसे कोई व्यक्ति भयातुर या वास्तविक है या क्रोधावेश में है तो सूक्ष्म जगत में फोटो उठे हैं भय और क्रोध की तरंगें खानदानकर उसके मस्तिष्क से खंडित हैं, इसके विपरीत यदि कोई स्नेह और सहानुभूति के विचार में भरा रहता है और निश्शंक है और इन दिशाओं में दृढ़ हैं तो यथार्थवादी विचार तरंगें उन्हें स्पर्श अशोक।
साधारण लोगों के मन की कोई निश्चित गति नहीं होती। तालाब के पानी की तरह जिधर से हवा चली इधर से, वैसे ही कम-ज्यादा वेग वाली लहरें उठेंगी। रिलिजन लोग अपने से बड़े, पास-एजुएट और उस समाज के लोगों के आचरणों का ही अनुकरण करते हैं और समुदाय के ही क्षेत्र में विचार रखते हैं। इससे मनुष्य के जीवन में कोई सुविधा नहीं आती। यदि मन को संकल्प करने के लिए किसी विशेष लक्ष्य की पेशकश की जाती है तो इसमें समुद्री ज्वार भाटे की तरह ऐसी शक्ति भर दी जाती है कि कठिन दिखने वाला इम्प्रेशन वाला कार्य भी आसानी से पूरा हो जाता है। लोगों की सफलता पर आश्चर्य प्रकट होता है, यह सब उन्हें चमत्कार-सा लगता है। पर चमत्कार - सी दिखने वाली यह सफलता एकाग्र मन की संरचना शक्ति के परिणाम से और कुछ और नहीं होता। मन की तन्मयता में वह शक्ति है जो बड़े से बड़ा काम आसानी से पूरा कर सकती है। मन में रिवायत देने वाली इन विचार तरंगों को अंतिम विचरण न करना चाहिए। क्योंकि निरंतर निरंतरता वाले विचार अच्छे - बैल जैसे भी होंगे वैसे ही तत्व वे सूक्ष्म जगत से आकर्षित करते हैं और वह विचार स्वभाव में परिणत होते रहते हैं। यदि कुविचारों में ही मन रस ले रहा हो तो बाह्य रूप से चिकित्सीय परिवर्तन का लाभ न मिले। इस शाश्वत में मनुष्य अपना नैतिक पतन ही करता है और लोगों को भी पथभ्रष्ट करने का एक सजीव केंद्र सा बन जाता है। इस तरह के विचार वाले मनुष्य की निकटता, जो भी उनके भी दुष्ट और दुराचारी हो जाने की संभावना बनी रहती है।
मनःशक्ति के इस ठोस पक्ष को देखकर ही उसे भूखाचारी न देने की सलाह दी जाती है। शास्त्रकारों ने निरंतर अभ्यास को अपने नियंत्रण में रखते हुए शिक्षा दी है। उन्हें यह दिखाई दिया कि दृश्य जगत के संपर्क में रहने के कारण संवाद की भावना और तृष्णा परक दृश्यों का उठना स्वाभाविक है। उन्हें जिधर आकर्षण दिखाई देते हैं उधर ही दौड़ेंगी। मन को स्थूल भोगों में ही अधिक सुख मिलता है, मूलतः उसकी इच्छाएँ, विचार, कल्पनाएँ और विचार भी पूर्ण ही अधोगामी होते हैं। हीन दर्शन के कारण मनुष्य के जीवन में चंचलता, परमाणु, क्षुद्रता और निक्कमपन आता है यह जीवन अनेक कष्टों एवं उद्वेगों में भरा रहता है। उस उजाले में न किसी तरह की कोई भौतिक प्रगति होती है, न कोई आध्यात्मिक लक्ष्य पूरा होता है।
विलक्षण मन प्रयोजन के रूप में अनेक सिद्धाँत रचनाएँ - बनी रहती हैं। कभी वह धन प्राप्त करने की इच्छा रखता है, कभी विद्वान होने का सपना देखता है। पद पर बने रहना, नेता बनना, प्रतिष्ठा पाना, धनी होना, भोग भोगने की दृष्टि से उसने अनेक काम किये हैं। यह चीजें स्थिर नहीं हैं। औरों के जीवन की प्रतिक्रिया स्वरूप ही वह इन लालची सपनों के पीछे अंधी दौड़ का अनुमान लगाती है। उसका कोई भी परमाणु हथियार नहीं होता। हृदय की पहचान के कारण वह हर स्तर पर आपको ही ठीक बताता है, पर इन अनेक इच्छाओं का वह समन्वय नहीं कर पाता। एक ही समय पर कोई समय बर्बाद न होना और स्थायित्व बनना असंभव है। एक बार में एक ही क्रिया को अधिक सुविधा और आराम से पूरा किया जा सकता है। अभी खाना, अभी पानी, अभी घर, अभी दुकान, अभी रेल, अभी मोटर - सब बातें एक साथ नहीं होतीं। उन्हें वास्तुशिल्प रूप से पूरा करने से ही कोई व्यवस्था बन जाती है। इनका क्रम किस प्रकार हो ? कौन सी जांच किस सीमा तक संजोकर राख हो जाएगी? उसकी सुरक्षा मजबूत हो ? इन सब पर भली विचार करने से ही जीवन-दशा को सुव्यवस्थित रखा जा सकता है।
हम लोग नामकरण करते हैं कि जब तक हम कोई बुरा कर्म नहीं करते तब तक मन में यदि कोई समष्टिगत विचार आ गया तो कोई विशेष हानि नहीं होती। यह गलत धारणा है। प्रत्येक विचार जो मन में उत्पन्न होता है, बिजली के समान प्रचंड शक्ति से पूर्ण होता है। इसलिए मनुष्य यदि कोई भी क्षुद्र विचार मन में आता है तो न केवल वह अपने मन को, दुर्बल करता है और अपने काम को बढ़ावा देने का बीज बोता है बल्कि विश्व के प्रत्येक जीव के जीवन को भी अपराध करता है। ।। कोई भी मनुष्य दर्शन से एक क्षण भी रिक्त नहीं रह सकता। वह रोजाना अपने मस्तिष्क के निजी केंद्र से अगणित विचार तरंगें बाहर भेजती है और ग्रहण भी करती है। इससे आप उस नुकसान का कुछ अनुमान लगा सकते हैं जो बैल, दीन, दुर्बल, लकड़ी और एक कल्याण कारक विचार वाला व्यक्ति अपना और पूरी दुनिया का काम करता है। इसी प्रकार अपना विचार अच्छा रखा तो वह और विद्वान का कल्याण साधन कर सकते हैं, इसका अनुमान लगाना कठिन नहीं है।
छायाचित्र की परिभाषा एवं प्रभाव प्रत्यक्ष अन्य शक्तियों से कहीं अधिक है। जीवन से उनका आखिरी संबंध है। विकास या पतन में उनका महत्वपूर्ण योगदान है। परा वैज्ञानिकों के अनुसार भौतिक जगत की पिरामिड तरंगों से विचार तरंगों की गति एवं शक्तियाँ गुणी हैं। जिस विज्ञान के तरंग तरंग विचारों का स्वरूप एवं प्रभाव ज्ञात होता है उसे योग दर्शन में विचार वागिकी कहते हैं। तत्व दर्शनों का मत है कि संसार में शुभ एवं अशुभ विचार तरंगों का सांकेतिक प्रसारण होता है जिसमें त्रिविधि गुण विकार मिश्रित होते हैं। जिस rauradaurauta प r त rir तीव r तीव rurauta, rur दै rircath आवृत kaytaurah है है प प प प प प प प प प प है है है वे सूक्ष्म अंतरिक्ष में घूमते रहते हैं और चैतन्य संसार को प्रभावित करते हैं।
शुभाशुभ तरंग विचार मनुष्य के मानसिक स्तर में परिवर्तन करने में भी सहायक होते हैं, लेकिन इस बात पर जोर दिया जाता है कि उनके साथ किस स्तर की प्राण शक्ति जुड़ी हुई है। समर्थ प्रभाव क्षमता, प्रबल प्राण शक्ति ही अवलंबित है। प्राण, शक्ति का संयोगवश विचार तरंगें घुटने के भूत होते हैं और विचार प्रवाह का रूप ग्रहण कर लागू होते हैं। प्रवाह बन जाने पर उनकी गति एवं रेटिंग रेटिंग हो जाती है। प्राण घोषण की प्रभाव क्षमता दूसरों की तुलना में कहीं अधिक होती है। अपनी ओर से वे अनगिनत लोगों को आकर्षित करते हैं और अपने साथ पिरामिड दिशा में गतिशीलता को मजबूत कर देते हैं। वह दिशा सृजन और ध्वनि दोनों ही की हो सकती है। महापुरुष अपनी उस शक्ति का उपयोग सृजन में करते हैं जबकि हिटलर, मुसोलिनी जैसे क्रूर अति मानव धन में उस शक्ति को गॉवते देखे गए हैं।
तत्व निर्देशक ऋषियों का मत है कि त्रिगुणात्मक प्रभावों के निर्माता मनुष्य के शरीर से कई प्रकार के रसायन उत्पन्न होते हैं। धर्म ग्रन्थों में अहा मंडल कहा गया है। किरलियन फोटोग्राफी के माध्यम से विचार तरंगों की फोटोग्राफी की संभावना हो गई है। यह पता चला है कि टेम्पलेट संवेगों के संगीतमय प्रचारक मंडलों के रंग रूप में भी परिवर्तन होता है। हर व्यक्ति का अपना अलग प्रभामंडल एवं स्तर होता है। प्रभा मंडल में निबंधों को आकर्षित या विकर्षित करने की सुविधा है। आन्त्रिक संवेगों, दर्शन एवं भावों के बदलाव से प्रभु मंडल भी बदलता रहता है। विचार तरंगों में अगणित प्रकार के रंग रूप होते हैं वे अलौकिक और लौकिक में विभक्त होते हैं। कल्पना, घृणा, द्वेष एवं प्रतिशोध के विचार तरंगें काली होती हैं जबकि भय एवं आतंक के विचार तरंगें भूरे रंग की होती हैं। रंगीन लाल रंग के विचार क्रोध के होते हैं। प्रेम के रंग-बिरंगे विचार गहरे लाल रंग की, सपने - जनित प्रेम के रंग-बिरंगे भूरे लाल रंग की, गहरे लाल रंग की और महत्वकांक्षा के विचार गहरे लाल रंग की, अलौकिक शक्ति और आन्त्रिक पवित्रता का भाव देखने वाले विचार तरंगें पीले रंग की, उच्च आध्यात्मिक भाव प्रकट हुए करने वाली डेमोनिअल नीला रंग की होती हैं। ऐसा विभिन्न विश्लेषण किया गया है। सूक्ष्म तरंगों के स्वरूप का रहस्य रहस्य भी एक ऐसी विधा है जिसमें विशेषज्ञ सिद्धांत के ज्ञाता नहीं, अतिइंद्रिय सिद्धांत सिद्धांत योगी होते हैं।
समर्थ योगी, सिद्ध पुरुष, व्यक्ति की तस्वीर देखकर उसका मनः एवं स्थिति मन में चल रहे विचारों को बिना बताये जान लेते हैं। इसमें उन्हें शामिल किया गया है कि आहा मंडल को देखकर मिल जाता है जो उस व्यक्ति के पोर्टफोलियो - गिर्ड शैडो रहता है जो सामान्यता अन्य भाषाओं को नहीं दिखाता है। योगियों की-सिद्ध पुरुषों की अंतर्दृष्टि उस मार्मन ओरा के आधार पर उसके मन में चल रहे अच्छे विचारों को देखने में सक्षम हो जाती है। उसे कैसे भी बताएं। अन्योन्याश्रय अन्तःकरण निर्मल है उनमें भी विचारधारा के अध्ययन की रेटिंग विकसित हो सकती है। कितनी बार तो मनुष्य की बदली हुई पृष्ठभूमि उसकी मानसिकता का परिचय देती है। क्रोध, भय, आवेश, दु:ख, पतन के भाव मनुष्य के मुखमंडल पर स्पष्ट तैरते रहते हैं जिन्हें पढ़ने में कोई भी विचार शील, सरल प्रयास से सफल हो सकते हैं और आंतरिक स्थिति का चल रहे विचार प्रवाह के स्वरूप का वर्णन करने में सक्षम हो सकते हैं। कितनी बार तो मानवी शीर्षक भी उसकी प्रकृति का स्वरूप प्रस्तुत करता है। मनः चिकित्सक भी इसी आधार पर अपना आयुर्वेदिक निदान शुरू करते हैं।
तरंगों के विचार - प्रस्तुत या प्रसारित करने की प्रक्रिया द्वारा प्रकाशित उसे मनोवेत्ता 'टेलीपैथी' कहते हैं। इस प्रक्रिया में बिना इंद्रियों का सहारा लेने के लिए तरंगों को एक मन से दूसरे मन तक लेने का विचार किया जाता है। इस क्रिया में देश काल से संबंधित भौतिक सीमाएँ आढ़े नहीं आ महत्वें हैं। टेलीपैथी के सफल सम्प्रेषण में मन की एकाग्रता सबसे महत्वपूर्ण है। उस एकाग्रता का सम्पादन ध्यान के विविध आध्यात्मिक प्रयोगों में अधिक सफलता मिलती है। यथार्थवादी भौतिक चिकित्सा उस उपलब्धि में अधिक सफल नहीं हो सकती। कारण कि जिस वैश्विक स्तर की एकाग्रता विचार सम्प्रेषण के लिए उसे भौतिक प्रयासों से नहीं बनना चाहिए। शरीर एवं बुद्धि से परे भौतिक मन के विचार तरंगों को प्राण - शक्ति के माध्यम से घुटना भूत कर ध्यान साधना के माध्यम से ही संभव हो पाता है। आजकल वैज्ञानिक क्षेत्र में भी विभिन्न प्रकार के प्रयोग टेलीपैथी पर चल रहे हैं। सुप्रसिद्ध रूसी वैज्ञानिक त्सियोलको वोस्की ने 1930 में कहा था कि भविष्य में सफल एवं सुरक्षित अंतरिक्ष यात्रा के लिए विचार सम्प्रेषण का ज्ञान आवश्यक होगा। सन् 1959 में अमेरिकी परमाणु पनडुब्बी नाटिलस का टेलीपैथी द्वारा एक सफल प्रयोग भी किया गया। उस प्रयोग से यह दुर्लभ प्रबलता हो गई है कि मानव मस्तिष्कों के बीच मानसिक विचारों का समावेश - रेडियो संचार व्यवस्था प्रदान करें जहां कहीं भी अधिक मात्रा में गति से चल सकता है। क्योंकि समुद्र के अनमोल अनमोल ताल में रेडियो संचार व्यवस्था भंग हो जाती है, ऐसा कोई मस्जिद मानसिक सम्प्रेषण में नहीं आता। क्योंकि इस संचार व्यवस्था में देशकाल की सीमा का प्रभाव नहीं है।
अमेरिकन साइंटिस्ट डगलस डीन ने 1960 में एक नई खोज का विवरण दिया था जिसका विवरण 1964 में गैजेट ने एक सम्मेलन में प्रस्तुत किया था। एक विशिष्ट यंत्र से यह दर्शाया गया है कि विचार सम्प्रेषण जब विचार तरंगों का प्रसारण होता है तो उसके कोष पर भी प्रभाव पड़ता है और रक्त प्रवाह की गति में भी अंतर दिखाई देता है। डीन का कहना था कि प्रयोग की महत्वपूर्ण बात यह है कि विचार संप्रेषण प्रक्रिया से अधिक सफलता से उनके बीच प्रभाव हो सकता है जो कि सादृश्य संबंधों से अधिक सुस्त रूप से जुड़े हुए हैं। विश्व के मूर्धन्य वैज्ञानिक यह स्वीकार करने लगे हैं कि मानव शरीर टेलीविजन प्रणाली से भी अधिक समर्थित एक अद्भुत इलेक्ट्रॉनिक यंत्र है। शरीर से भी अधिक सूक्ष्म तरंगों को सूक्ष्म तरंगों द्वारा खींचा जाता है। इस प्रक्रिया का संबंध सूक्ष्म शरीर से है, कारण रूप सूक्ष्म जगत और कार्यरूप सूक्ष्म जगत का संबंध है। विचार जगत एवं उसकी समानता के संबंध में अन्यत्र मिले हैं, उसकी तुलना में अविज्ञात का क्षेत्र कहीं अधिक है। जिस दिन उसकी परिभाषा व पूरा परिचय मनुष्य को मिलेगा, वह एक अद्भुत समय होगा। यह उपलब्धि परमाणु के परमाणु शक्ति के आविष्कार से भी बड़ी होगी।
💥 दुषित कर्म पाप राक्षसी से जो तामसिक विचार तरंगे हैं, दुष्परिणामों से जो तरंगे प्रवाहित होते हैं वो पूरे ब्रह्मांड के आकाश तत्व में संबंध रची गई पृथ्वी पर प्रकृति पर नकारात्मक प्रभाव रोग हानि मानसिक शारीरिक, आपदा सभी को जन्म देने के अतिरिक्त, उस स्थान पर भी पार्श्वीय विद्युत चुम्बकीय प्रभाव पड़ता है। लेख बड़ा होगा इसलिए उनका विस्तार यहां नहीं लिखा है। लेकिन दुषित आचरण के बदलावों से व्यक्ति के मन और बुद्धि पर पुनर्विक्रय प्रभाव पड़ता है। इसलिए ऐसा करना व्यक्तिगत नहीं। काम का नियंत्रण धर्म से हो तो भावना वहां दुषित नहीं होती। अर्थात् जो गृहस्थी ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं, ऋतुकाल में रति करते हैं वे धर्म के पालक हैं। उनका आचरण प्रकृति-अनुकूल और वह सदाचार है। आत्मव्याभिचार गलत आचरण करता है जो अपवित्र उत्पाद अपवित्र परिवर्तन पैदा करता है, पर्यावरण को नष्ट करता है। चोरी करने वाले की भावना अंतरात्मा की आवाज उसे आती है कि ये गलत है,, किसी हार्मोन से प्रभावित होकर वो चोरी नहीं करता है, फिर भी वोट करता है, और उसके अपराध भाव की तरंगे उसके मन में पाप के संस्कार के रूप में अंकित है भूमि में कर्म के रूप में संचित हो जाता है। जब तक उसका फल नहीं मिलता, तब तक वह प्रायश्चित नहीं कर पाता, कर्मफल उसके चित्त में ही रहता है। जिस स्थान पर बुरा काम होता है वहां पर नकारात्मक तरंगों का प्रभाव होता है जिसका उदाहरण कयी एतिहासिक दार्शनिक वैज्ञानिक है। इसका पहला प्रमाण-पत्र के अनुसार निजी एवं पुनर्जन्म के कथन पोस्ट किया गया है।
💥 समाधान : मैं कौन हूँ यह वैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक प्रश्न है। ये पता है वो धन्य हैं। सत्य ये है कि मैं आत्मा हूँ। मेरी इंद्रिया मेरे शरीर में है। इन्द्रिय : आँखे, कान, त्वचा आदि।
मै = आत्मा
शरीर = इंद्रिय (मन)
स्वतंत्रता = स्वयं की प्रेरणा से चलना
परतंत्रता = दूसरी की प्रेरणा चलना
जब आप आत्मा हो, आत्मा की मानोगे अर्थात स्वयं की तब आप बात जो है स्वतंत्र हो।
यदि आप इंद्रिय या शरीर जो अपनी बात मन में रख रहे हैं, उनकी बात मन कर रही है, इंद्रिय जो कहती हैं वो व्यवहारिक स्वच्छंदता से हो रही हैं अर्थात आप दूसरे की बात मन कर रहे हैं, मूलतः आप तंत्र स्वतंत्र नहीं हैं।
इसी तरह आप विदेशियों के साथ चलेंगे तो परतंत्र हो। स्वदेशी दर्शन से उत्थान पर ही स्वतंत्र कहलाते हैं।
मूलतः काम व अर्थ पर धर्म के नियंत्रण का उपाय है। आत्म दीप्त रहते हैं साधना उपासना जप तप ध्यान योग साधना यज्ञ सत्संग स्वाध्याय के बारे में जानें। यह समाधान है. धर्म सम्मत या वेदानुकूल आचरण ही समाधान है।
((ध्यातव्य : वर्तमान में नवीन वैज्ञानिक खोजों के कई तथ्य और भी हैं जो वैज्ञानिक संप्रेषण द्वारा विकृत अमो की वैज्ञानिकता प्रतिपादित करते हैं।))

टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें