श्रीमद्भागवतगीता के वैज्ञानिक मनोवैज्ञानिक विश्लेषण से ओशो खंडन..
न्याय दर्शन के ज्ञाता जानते हैं कि सत्य तर्क तो वही है जो सर्वकालिक सार्वभौमिक हो। किसी एक स्थिति पर लागू तो हो लेकिन अन्य पर नही इस प्रकार का कोई सिद्धांत सत्य नही बैठता। अंग्रेज़ी में एक टर्म होता है यूनिवर्सल ट्रुथ अर्थात सार्वभौमिक सत्य, जिस पर कोई उँगली नहीं उठा सकता। किंतु, हम जिस वर्तमान में जी रहे हैं, यहाँ तो कोई भी सत्य तब तक ही सार्वभौमिक है जब तक वह अपनी कथित विचारधारा से मेल खाता हो। वैदिक दर्शन परस्पर विरूद्ध भी नहीं और एकमात्र सिद्धांत है जो सार्वभौमिक सर्वकालिक सनातन शाश्वत सत्य है। चाहे वो वैज्ञानिक अनुसंधान में देखा जाए, या मनोवैज्ञानिक धरातल पर।
कोई मूर्ख आए, परस्पर विरूद्ध दोहरी बातें करे , शराब सेवन करे , व्यभिचार का पंथ खडा करें , व्यभिचार नग्नता अब्रह्मचर्य पर लेक्चर दे, व अपने लेक्चर का प्रवचन का नाम गीता उपनिषद योग आदि रख दे फिर भी दुर्भाग्य से उसे अद्भुत भगवान मानने वाले अविवेकी लोग है ही । क्योंकि उनकी बुद्धि व विवेक भी गीता के अध्याय 2 के इन दो श्लोकों के अनुरूप ही भ्रष्ट हो चुकी है। तभी तो ऐसो को भगवान बनाने वाले चेले अवश्य विद्यमान है , भले ही कथित गुरू जेल मे हो, है ना आश्चर्य...! यथा हम बात कर रहे हैं कुख्यात अपराधी ओशो की, जिसके अनुसार विषयों का अत्यधिक भोग विषयों में आसक्ति से मुक्त कर समाधि तक पहुंचा देता है। यानि शराब से विरक्त होना है तो अत्यधिक शराब पीना चाहिए। बोलो ये कोई तर्क है? सृष्टि कब बनी, वेदो की उत्पत्ति कैसे हुई, कब मणुष्य हुआ, सभ्यताओं की जननी कौन? विज्ञान चरित्र मानवता की जननी कौन? ये ओशो जैसे वाममार्गी व्यभिचारी पंथ चलाने वाले लम्पट तनिक भी नहीं जानते। उन्हे इन सब से मतलब भी क्या? (स्मरण रखे, जिसने सृष्टि को नही जाना उसने स्रष्टा को भी नही जाना।)) और ये वाममार्ग इस कलियुग में ही उत्पन्न हुआ। इसका अस्तित्व भी वैदिक राज्य में नही। ये पंथ चलाने वालो ने ही तो विश्व वैदिक सभ्यता के तुकडे किये। अन्यथा पुरे ब्रह्मांड का धर्म सनातन शाश्वत वैदिक धर्म ही था व यथार्थ मे वैदिक धर्म ही सत्य सनातन धर्म है। लेकिन इतने सारे पंथ जो करोडो वर्षों की इस सभ्यता की भूमि पृथ्वी पर आज हुए वे वैदिक चक्रवर्ती राज्य व सभ्यता के भग्नावस्था के पूर्व लेशमात्र न थे। ये व्यभिचारी पैदा हुए, यहां वहां से असत्य असत्य बकैती किए, चेले चपाटे मत्थे पर बिठा दिए, धरती पर बोझ, और व्यभिचार कदाचार दुराचार का पंथ बनाकर स्वयं अय्याशी करते हुए मर गये। उसके मानने वाले इन दरिंदों को "भगवान" की उपाधि देने लगे। "विद्वान" की उपाधि देने लगे।
आज हम ऐसे तमाम पंथाधिशो का खंडन गीता के श्लोक से करेंगे। योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं -
ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते
सङ्गात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते॥
(द्वितीय अध्याय, श्लोक 62)
अर्थ: विषय-वस्तुओं के बारे में सोचते रहने से मनुष्य को उनसे आसक्ति हो जाती है. इससे उनमें कामना यानी इच्छा पैदा होती है और कामनाओं में विघ्न आने से क्रोध की उत्पत्ति होती है।
▶️ इस पर कुछ अभिमत...
➡️अब वैज्ञानिक मनोवैज्ञानिक मनोभाव भी देख लेते हैं। The Perspective of Indological Studies in Modern Era (2020) (Dr. Anita Sengupta) पृ. 112 पर इस श्लोक के विषय में निम्नलिखित विचार उद्धृत है-
"श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान् श्री कृष्ण ने अर्जुन को निमित्त बनाकर समग्र विश्व को उपदेशित किया है कि विषयों अर्थात् भोग्यपदार्थों का स्मरण करने से उन भोग्यवस्तुओं में आसक्ति हो जाती है । आसक्ति से कामना उत्पन्न होती है , कामनापूर्ति न होने पर क्रोध उत्पन्न होता है , क्रोध से सम्मोह , सम्मोह से स्मृतिविभ्रम हो जाता है , स्मृतिभ्रंश से बुद्धि का नाश हो जाता है और बुद्धि के नष्ट होने पर व्यक्ति मृतवत् हो जाता है । ' अन्दर के इस महाभारत का इतना मनोवैज्ञानिक और प्रामाणिक विश्लेषण पूरी दुनिया के किसी भी ग्रन्थ में नहीं मिलता है ।"
➡️ इसी पृष्ठ पर इंद्रियों की अंतर्मुखता पर लिखा है -
" इन्द्रियों की अन्तर्मुखता : विश्व को वैदिक चिन्तन का एक संदेश समस्त सूत्रों को जीवन में उतारने से इन्द्रियों को अन्तर्मुखी किया जा सकता है तथा बाहर स्थित भयंकर अशान्ति से आन्तरिक शान्ति की ओर जाया जा सकता है । सच्ची शान्ति के प्रेमियों को देर - सबेर इन्द्रियों को अन्तर्मुखी बनाना ही पड़ता है अन्यथा संसार की कोई शक्ति नहीं है , जो उसे शान्ति और प्रसन्नता दे सके । योगसूत्रोक्त सूत्रों को जीवन में उतारने के लिए जंगलों में जाने की आवश्यकता नहीं है अपितु हर देश , काल और परिस्थितियों में इसे उतारा जा सकता है । यह पूर्ण वैज्ञानिक और सार्वभौमिक सूत्र हैं , जो मानवमात्र के कल्याण के लिए कहे गये हैं । योगसूत्रों में महर्षि पतञ्जलि ने अष्टाङ्गयोग के अन्तर्गत प्रत्याहार की अवधारणा देते हुए कहा है कि इन्द्रियों का विषयसन्निकर्ष बाधित करके उन्हें स्वरूपानुमुखी बनाना ही प्रत्याहार है । प्रत्याहार के वैज्ञानिक प्रयोग से इस पृथिवी का कोई भी मनुष्य । अपनी इन्द्रियों को बहिर्मुखता से अन्तर्मुखी कर सकता है । प्रत्येक प्राणी के अन्दर आत्मा की सत्ता है जो मूलतः शुद्ध और चैतन्य है । इन्द्रियों के अन्तर्मुखीकरण के पश्चात् आत्मसाक्षात्कार का मार्ग प्रशस्त किया जा सकता है । यह प्रयोग हमारे ऋषियों ने किया था और उसके पश्चात् अपने अनुभवों को शास्त्रबद्ध किया था और यह सनातन शास्त्र सारे संसार के मनुष्यों का मार्ग प्रशस्त करने के लिए आज भी विद्यमान हैं । "
➡️ साहित्य - भूषण सम्मान से अलंकृत साहित्यकार कुमारी बक्शी ने अपनी कृति" संसार सागर के अनमोल मोती ( प्रश्नोत्तर तरंगिनी विधा )" में इस श्लोक के संदर्भ में लिखा हैं -
शिर्षक है -" बुद्धि की सुरक्षा"
प्रश्नकर्त्री : अज्ञात
उत्तरकर्त्री : स्वयं लेखिका ।
प्रश्न उत्तर : प्राय : यह देखने में आया है कि बुद्धि के भ्रष्ट होने से कभी कभी विद्वान धनीजन भी पथ भ्रष्ट हो जाते हैं । उच्चतम कोटि के राजनैतिक बुद्धि की मलीनता के कारण भयंकर भूल कर देते हैं जिससे सम्पूर्ण राष्ट्र का विनाश हो जाता है । ऐसा क्यों होता है ? बुद्धि की सुरक्षा किस प्रकार की जाये ?
उत्तर : बुद्धि के पतन के सम्बन्ध में श्रीकृष्ण जी ने श्रीमद्भगवद्गीता के निम्नलिखित 2 श्लोकों में वैज्ञानिक विश्लेषण किया है जो अत्यन्त महत्त्वूपर्ण है -
ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते ।
सङ्गात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते । ( 2-62 )
क्रोधाद्भवति संमोहः संमोहात्स्मृतिविभ्रमः । स्मृतिभ्रंशाबुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्पणश्यति । ( 2-63 )
बुद्धि की सुरक्षा के सम्बन्ध में श्रीकृष्ण जी का यह अत्यन्त सुन्दर एवं उत्साहजनक सन्देश है ।
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➡️ मनोवैज्ञानिक नितिज्ञ आचार्य
चाणक्य ने "काम" को नशा बताया हैं।
नैव पश्यति जन्मान्धः कामान्धो नैव पश्यति ।
मदोन्मत्ता न पश्यन्ति अर्थी दोषं न पश्यति ॥
(--चाणक्यनीति )
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क्रमशः ये खंडन जारी रहेगा...

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