शोभनीय वस्त्र धारण करने वाली पत्नी का शरीर पति ही देखते हैं...
शोभनीय वस्त्र धारण करने वाली पत्नी का शरीर पति ही देखते हैं , दूसरे लोग केवल वस्त्र देखते हैं...
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उ॒त त्व॒: पश्य॒न्न द॑दर्श॒ वाच॑मु॒त त्व॑: शृ॒ण्वन्न शृ॑णोत्येनाम् ।
उ॒तो त्व॑स्मै त॒न्वं१॒॑ वि स॑स्रे जा॒येव॒ पत्य॑ उश॒ती सु॒वासा॑: ॥
~ ऋग्वेद १०/७१/४
" लिपि का ज्ञान न होने से कोई एक लिपिरूप वाणी को आँख से देखता तो है लेकिन देखते हुए भी मानो वो नही देख रहा , कोई एक इस शब्दरूप वाणी को सुनता तो है लेकिन अर्थज्ञान न होने से वो न सुनने वाले के ही भांति है। और ये वाणी किसी एक के लिए अपने आत्मा को खोल देती है - प्रकट करती है , ज्ञान के कारण से। वैसे ही जैसे अच्छे शोभनीय वस्त्र धारण किये हुए पत्नी , गृहस्थ धर्म की कामना करती हुई केवल अपने शरीर को पति के समक्ष प्रकट करती है। शोभनीय वस्त्र धारण करने वाली पत्नी का शरीर पति ही देखते हैं , दूसरे लोग केवल वस्त्र देखते हैं । "
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💥 दुसरे शब्दो मे -
लिपी का ज्ञान न रखने वाला बस लिपी को देखता है,
पर उसे यथार्थ मे नही देखता, न ही जानता है।
मानो अंधा...
किसी भाषा से अनजान बस उसको सुन पाता है,
उसका अर्थ बोध नही समझ पाता।
मानो बहरा....
कोई किसी लिपि या भाषा का ज्ञाता हैं,
तो उस भाषा की वाणी का मानो अपने आप
को उसके समक्ष पूर्णतः प्रकट कर लेती है।
यानी वो उसका अर्थ समझ पाता है।
उदाहरण के लिए जैसे :
सभी लोग शोभन वस्त्र युक्त परस्त्री के
केवल वस्त्र को देखते हैं , गृहस्थी की कामना
करती हुई पत्नी का स्वशरिर केवल
पति के ही समक्ष प्रकट होता है।
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संपूर्ण विश्व वेद को अखिल विश्व का
सबसे प्राचीन ग्रंथ मानता है। वेद विश्व वैदिक
मानव सभ्यता काआदि ग्रंथ है, अपौरुषेय वाणी है।
वेद भारतीय संस्कृति का संविधान है.,
भारतीय संस्कृति की मूल संरचना है।
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