वीराङ्गना झांसी की रानी लक्ष्मीबाई...
वीराङ्गना झांसी की रानी लक्ष्मीबाई...
भारत के घोर शत्रु लार्ड मैकाले का कथन है--
“ 𝑨 𝒑𝒆𝒐𝒑𝒍𝒆 𝒘𝒉𝒊𝒄𝒉 𝒕𝒂𝒌𝒆𝒔 𝒏𝒐 𝒑𝒓𝒊𝒅𝒆 𝒊𝒏 𝒕𝒉𝒆 𝒏𝒐𝒃𝒍𝒆 𝒂𝒄𝒉𝒊𝒆𝒗𝒆𝒎𝒆𝒏𝒕𝒔 𝒐𝒇 𝒕𝒉𝒆𝒊𝒓 𝒂𝒏𝒄𝒆𝒔𝒕𝒐𝒓𝒔 𝒘𝒊𝒍𝒍 𝒏𝒆𝒗𝒆𝒓 𝒂𝒄𝒉𝒊𝒆𝒗𝒆 𝒂𝒏𝒚 - 𝒕𝒉𝒊𝒏𝒈 𝒘𝒐𝒓𝒕𝒉𝒚 𝒕𝒐 𝒃𝒆 𝒓𝒆𝒎𝒆𝒎𝒃𝒆𝒓𝒆𝒅 𝒘𝒊𝒕𝒉 𝒑𝒓𝒊𝒅𝒆 𝒃𝒚 𝒕𝒉𝒆𝒊𝒓 𝒅𝒆𝒔𝒄𝒆𝒏𝒅𝒂𝒏𝒕𝒔 . "
❝ अर्थात् जो लोग अपने पूर्वजों की महान
उपलब्धियों पर गर्व नहीं करते, वे कभी भी
ऐसी कोई उपलब्धि हासिल नहीं कर पाएंगे
जो उनके वंशजों द्वारा गर्व के साथ याद
किए जाने योग्य हो। ❞
झाँसीकी रानी लक्ष्मीबाई के जयंती पर उन्हें कोटि-कोटि नमन, प्रस्तुत है श्रीयुत् दत्तात्रय बलवंत पारसनीस कृत "झाँसीकी रानी लक्ष्मीबाई" के कुश अंश जिससे उनके जीवन से कुछ प्रेरक बातो का मनन कर सकें...
▶️ जन्म आदि...
महाराष्ट्र देश में सताराके समीप कृष्णा नदी के किनारे बाई नामका एक ग्राम है । मोरोपंतकी पत्नीका नाम भागीरथी बाई था । यह स्त्री बड़ी सुशील , चतुर , रूपवान और अनेक गुण सम्पन्न थी । पति और पत्नी में सदैव बड़ा प्रेम रहता था । संसारमें प्रेमसे बढ़कर और कोई पवित्र वस्तु नहीं है ; यदि वह प्रेम सच्चा और शुद्ध हृदयसे किया गया हो । यदि दो मनुष्य प्रेमबद्ध होकर किसी दुस्तरसे दुस्तर कार्यको करना चाहें तो वह सरलता पूर्वक किया जा सकता है । किसी कवि ने ठीक कहा है कि 'अगर दो दिल मिल कर चाहें तो पहाड़ भी तोड़ सकते हैं ।' फिर यदि पति और पत्नी परस्पर सच्चा प्रेम हो तो यह बताने की आवश्यकता नहीं जान पड़ती कि संसार- यात्रा किस प्रकार उत्तम रीतिसे निर्वाह हो सकती है । ऐसा ही सच्चा प्रेम मोरोपंत और उनकी पत्नी में था । इस पतिव्रता स्त्रीका वर्णन करते - करते हमें नीचे लिखी हुई पक्तियोंका स्मरण होता है : - " पत्यनुकूला चतुरा प्रियंवदा या सुरूपसंपूर्णा । सहजस्नेह रसाला कुलवनिता केन तुल्या स्यात् || "
ऐसे शुद्ध और पवित्र प्रेम बीजके फल भला क्यों कर मीठे और उत्तम न होंगे ?
कार्त्तिक बदी १४ संवत् १८९१ को मोरोपंतके घर में कन्या का जन्म हुआ । संतान की उत्पत्ति का जो आनंद मनुष्यको होता है वह संसार में सब लोगोंको विदित ही है ; इसी प्राकृत रीत्यनुसार मोरोपंत को भी आनंद हुआ | उनके सब मित्र , स्नेही , बंधुओंने भी इस आनंद में उनको बधाई दी । सब लोगोंने मिलकर आशीर्वाद दिया कि 'ईश्वर आपकी इस संतानको चिरायु करे और भविष्यत् में यह बड़े यश और पराक्रमको प्राप्त करे ।'
यद्यपि यह आशीर्वाद केवल वर्तमान समयके विचारों पर दृष्टि देकर साधारण रीतिसे दिया गया था , तथापि यही वाक्य समय पाकर सार्थक हुआ । काशीजीके विख्यात ज्योतिषियोंने जातकादि का विचार कर यह भविष्य कथन किया था कि "यह बालिका राजलक्ष्मीसे अलंकृत होकर अत्यंत शौर्यशालिनी स्त्री होगी " । उस समय उसके कोमल अंग और शांत मुखको देखकर किसीको स्वप्न मे भी यह अनुमान न था कि यह बालिका इस प्रकार शूरवीर होगी और अपने पराक्रमी कामो से अँग्रेजों को भी चकित कर देगी ! "
▶️ एक अच्छे शासक के सभी गुण :
हिबर्ट ने यह भी जिक्र किया है कि बहुत से अंग्रेज अफसर उन्हें गलत नजरिए से देखा करते थे.लिकन सर रॉबर्ट हैमिल्टन की निगाह में वे बहुत ही विनम्र और चुतर युवा महिला थीं जिसमें एक अच्छा शासक होने के सभी गुण मौजूद थे. हिबर्ट ने यह भी जिक्र किया है कि पहले रानी विद्रोह में शामिल नहीं होना चाहती थीं. लेकिन बाद में उन्होंने पूरे दिल से विद्रोह में शामिल होने का मन बना लिया. बताया जाता है कि ब्रिटिश अफसरों के साथ उनका नम्र व्यवहार ही था. और अफसर भी उनका भरपूर सम्मान करते थे. लेकिन लॉर्ड डलहौजी की जिद के चलते अंततः रानी की अंग्रेजों से खिलाफत करनी पड़ी और फैसला किया कि वे अपनी झांसी नहीं देंगे. रानी का यह फैसला बहुत से अंग्रेजों के लिए चौंकाने वाला था. इसके बाद झांसी और ग्वालियर में हुए युद्ध के बाद कई अंग्रेज सैन्य अफसर रानी की बहादुरी के कायल हो गए थे.
▶️ पुस्तक से कुछ वर्णनों के अंश :
तारीख १९ जून सन् १८५८ ( जेष्ठ ) शुक्ल ७ सम्वत् १९९ ४ ) के दिन सहस्ररश्मि सूर्यनारायण दोनों सेनाओंके वीरोंका अतुल परा क्रम देखकर उनको अपना मंडल ( सूर्य - मंडल ) भेदकर स्वर्ग द्वारा जीतनेकी आज्ञा देनेके लिए खूब प्रज्वलित हो बैठे थे । दोनों ओरके योद्धा प्राण - परणसे अपने पराक्रमकी हद दिखा रहे थे । थे ब्रिगेडियर स्मिथ , कप्तान हेनेज आदि योद्धा आठवहुर्जास पल टनके शूर सिपाहियों के साथ महारानीके मुक़ाबले में घोर युद्ध कर रहे थे । महारानी लक्ष्मीबाईकी पोशाक मर्दानी होने और चारों ओर आकाश धूल - धूसरित हो जाने के कारण अँगरेज़ वीरोंने उनको प्रत्यक्ष पहचान नहीं पाया । इस समय अँगरेजी सेना चारों ओर दल - बादलकी तरह छाई हुई थी - उसने अब यह प्रतिज्ञा को कि जो सामने पड़े उसको जीतकर फूलबाग़ पर अधिकार करना चाहिए । महारानी अपनी दो - तीन दासियाँ , एक - दो विश्वास पात्र सरदार और कुछ सवारों के साथ अँगरेजी दलके घेरे से निकलकर दूसरी अपनी प्रबलसेनाओं में मिल जानेका प्रयत्न करने लगीं । परन्तु अँगरेजी पलटन के कट्टर हुर्जास सिपाहियोंने महारानी का उद्देश सिद्ध न होने दिया महारानीने बहुत प्रयत्न किया ; पर अँगरेज़ वीरोंसे चारों श्रो घिर जाने से कारण शत्रुओंके घेरेसे उनका इस प्रकार निकलना असम्भव हो गया ! दोनों दलोंके लोग प्राणोंका भरोसा छोड़कर लड़ने लगे और तलवारोंकी चमकसे युद्धस्थल होने लगा । अँगरेज़ वीर - प्रकाशमान गोलियाँ बरसा रहे थे और कितने ही अँगरेज तलवारोंसे विद्रोहियों को स्वाहा कर रहे थे । महारानी लक्ष्मीबाई ने इस घोर संग्राम में अपनी शूरता का अद्वितीय प्रभाव दिखाया ; उन्होंने भी बड़ी चतुरताके साथ अपनी तलवार के हाथ शत्रुओं पर फेरे ।
अँगरेज़ वीर खपाखप कटकर गिरने लगे । अनेक अँगरेज़ वीरोंको उन्होंने अपनी तलवार से कंठ - स्नान कराया ; मौतलवार फेरती हुई एकदम शत्रु- सेना के घेरेसे बड़ी द्रुतगति से अपना घोड़ा बाहर निकाल लिया । इशारा पाते ही घोड़ेने चौकड़ी भनी । इतने हीमें ब्रिगेडियर स्मिथने हुर्जास सेना के कुछ चुने हुए सवारोंको उनके पीछे चीते की तरह छोड़ा । वे गोलियाँ चलाते हुए महारानीके पीछे दौड़े । तीव्र गतिसे चलने वाली तेजस्विनी महारानीकी दुर्दैवके कारण उन सवारोंके आगे कुछ न चली | पीछेसे महारानीके एक गोली लगी ; जिससे वे कुछ शिथि उसी हो गईं । इतने ही में सवार महारानीके पास पहुँच गये । दोनों दलोंके थोड़ेसे वीरोंमें एक छोटासा युद्ध फिर छिड़ गया । तीन दिन तक बराबर तुमुल युद्ध करनेके कारण महारानी कुछ थक गई थीं ; परन्तु उनका स्वाभिमान और रणोत्सा इ कुछ विलक्षण ही था । इसी कारण उन्होंने अँगरेज़ोंकी इतनी विस्तृत सेना को भी कुछ नहीं समझा । सर ह्यू - रोज आदि अँगरेज़ो को महारानीकी युद्ध - निपुणता अच्छी तरहसे मालूम हो गई थी । इतना ही नहीं , किन्तु झाँस के प्रबल युद्ध से सब अँगरेज़ो को उनके पराक्रमका बड़ा भारी कुतूहल हो रहा था ; इसलिए ऐसी अलौकिक शौर्य शालिनी स्त्रीको पकड़ लेनेकी इच्छा अनेक अँगरेजोंको थी । परंतु बलवाइयोंके इतने बड़े सैन्य - सागरमें इस ' दिव्य स्त्रीरत्न ' का पता लगना दुघंट था । महारानी का अन्तःकरण स्वाभिमान से पूर्ण था ; उन्होंने निश्चय कर लिया था कि मृत्युहोने पर भी परधर्मियोंके स्पसे अपने पवित्र शरीरको कलुषित न होने दूँगी । उन्होंने अपने साथ की पुरुष वेशधारिणी सुन्दर और काशी नामकीदो दासियों और रामचंद्रराव तथा रघुनाथ सिंह आदि स्वामि - भक्त सेवकोंसे कह रक्खा था कि - - - - -
❝ युद्ध में यदि मेरा पतन हो जाय तो मेरी देह का ऐसा
प्रबंध करना कि जिसमें म्लेच्छों का उसे स्पर्श भी न
हो ; मेरी यह इच्छा जब तुम पूर्ण करोगे तभी तुम
सच्चे स्वामि - भक्त होंगे ! ❞
महारानीके ये शब्द उपर्युक्त सहयोगी साथी सैनिकों दास - दासियोंके रामभक्त प्रजाजनों के हृदय - पट पर खचित हो गये थे ; इसी कारण वे सब युद्ध में सदैव उनके साथ छायाकी भाँति रहते थे । धन्य है ऐसे स्वामि - भक्त वीरों को जो अपनी स्वामिनी के लिये प्राणोंको हथेली पर रक्खे हुए सदा उनके साथ रहे । इस समय भी ये सब स्वाभि - भक्त राजभक्त अपनी प्रिय स्वामिनीके पीछे - पीछे अपने प्राण निछावर किये हुए घोड़ों पर दौड़ रहे थे । बालक दामोदर राव , रामचन्द्रराव देशमुखके घोड़े पर थे । -
हुर्जास सवार महारानी के इस छोटेसे समूह पर भयानक मार कर रहे थे । महारानी पर जो सवार वार कर रहा था उसे उन्होंने बड़ी चतुरतासे अपनी तलवार का स्वाद चखाया और एकदम अपना घोड़ा आगे बढ़ाया । इतने हीमें उनकी दासी सुन्दर करुणस्वरसे एकाएक चिल्ला उठी - " बाई साहब ! मरी ! मरी मरी !! " | इन शब्दोंके कानोंमें पड़ते ही महारानी को इतना दुःख हुआ कि मानों उनके हृदय पर किसीने शस्त्र प्रहार कर दिया हो । वे एकदम झोंक के साथ पीछे लौट पड़ीं और अपनी प्रिय दासी को यमपुरी पहुँचानेवाले उस अँगरेजको उन्होंने उसी दम यमपुरी - का मार्ग दिखा दिया...
▶️ महारानीकी मृत्यु :
महारानीकी मृत्यका हाल उत्तर हिन्दुस्तान के लोग कई तरहसे बत लाते हैं । पर उन्हें काल्पनिक दंत कथाओंके सिवा अधिक महत्व नहीं दिया जा सकता । कुछ लोग कहते हैं कि महारानीने जब देखा कि अपना अन्त नहीं होता तब वे घासके किसी देरमें कूद पड़ीं और सुतलीके तोड़ेसे उसे जलाकर उसमें मर गईं । कुछ लोग कहते हैं कि वे लड़ाईमें मरीं । कोई कहते हैं कि जब उन्होंने अपने मारनेवाले शत्रु का बदला लेकर उसे मारा तब इसी गड़बड़ में उनका भी अन्त हुआ ! सारांश यह कि इस विषय में अनेक लोग अनेक तरहकी आख्यायिकाएँ बतलाते हैं । परन्तु इन बातोंका कोई प्रमाण नहीं । अनेक प्रमाणसे तो यही बात सिद्ध होती है कि जख़्मी होने पर उनके सेवकों ने बड़ी होशियारी के साथ उनकी श्रीज्ञानुसार सब प्रबन्ध किया । कोई यह भी कहते हैं कि उनके मरने पर सब प्रबंन्ध रात्र साहब पेशवाने किया ; पर यह बात तो बिलकुल विश्वास - योग्य नहीं है ; क्योंकि उस समय रावसाहव पेशवा उनके पास ही न थे । खुद दामोदर शव अपने अनुभवसे और रामचन्द्ररावके बतलाने पर जो कुछ बताते हैं वही सबसे अधिक विश्वसनीय है । अब एक यह बड़ा प्रश्न पैदा होता है कि उस गड़बड़ और वैसी आपत्ति के समय महारानी के प्रबन्ध करनेका यह मौक़ा उन लोगोंको कैसे मिला ? पर इसके समाधान के लिए बहुतसी बातोंका आधार मिलता है । पहले तो महारानीकी फ़ौजी और मनी पोशाक होने के कारण अँगरेज़ लोगोंको उनका पता ही नहीं चला । इस कारण इच्छा रखने पर भी वे महारानीको पकड़ नहीं सके । महारानीने " अन्त में जब दो - तीन सिपाहियोंको मारा तब शायद बाकी सवार डरकर पीछे लौट गये । जान पड़ता है कि इसी बीचमें महारानी और रामचन्द्र राव से बातचीत हुई और यह प्रबन्ध हुआ । एक अँगरेज़ी ग्रन्थकारने मृत्युका हाल लिखते हुए इनको फ्रान्स देशकी जान ऑफ़ श्राक नामक शूर स्त्री की उपमा दी है ; उसने तो यहाँ तक लिखा है कि जख्मी होनेके बाद महारानीने अपने लोगोंका जवाहर श्रादि बाँटे है ! यह ग्रन्थकार लिखता है :
• 𝐓𝐡𝐢𝐬 𝐈𝐧𝐝𝐢𝐚𝐧 𝐉𝐨𝐚𝐧 𝐨𝐟 𝐀𝐫𝐞 𝐰𝐚𝐬 𝐝𝐫𝐞𝐬𝐬𝐞𝐝 𝐢𝐧 𝐚 𝐫𝐞𝐝 𝐣𝐚𝐜𝐤𝐞𝐭 𝐚𝐧𝐝 𝐭𝐫𝐨𝐮𝐬𝐞𝐫𝐬 𝐚𝐧𝐝 𝐰𝐡𝐢𝐭𝐞 𝐭𝐮𝐫𝐛𝐚𝐧 . 𝐒𝐡𝐞 𝐰𝐨𝐫𝐞 𝐚 𝐒𝐜𝐢𝐧𝐝𝐢𝐚'𝐬 𝐜𝐞𝐥𝐞𝐛𝐫𝐚𝐭𝐞𝐝 𝐩𝐞𝐚𝐫𝐥 𝐧𝐞𝐜𝐤𝐥𝐚𝐜𝐞 𝐰𝐡𝐢𝐜𝐡 𝐬𝐡𝐞 𝐡𝐚𝐝 𝐭𝐚𝐤𝐞𝐧 𝐟𝐫𝐨𝐦 𝐡𝐢𝐬 𝐭𝐫𝐞𝐚𝐬𝐮𝐫𝐲 . 𝐀𝐬 𝐬𝐡𝐞 𝐥𝐚𝐲 𝐦𝐨𝐫𝐭𝐚𝐥𝐥𝐲 𝐰𝐨𝐮𝐧𝐝𝐞𝐝 𝐢𝐧 𝐡𝐞𝐫 𝐭𝐞𝐧𝐭 , 𝐬𝐡𝐞 𝐨𝐫𝐝𝐞𝐫𝐞𝐝 𝐭𝐡𝐨𝐬𝐞 𝐨𝐫𝐧𝐚𝐦𝐞𝐧𝐭𝐬 𝐭𝐨 𝐛𝐞 𝐝𝐢𝐬𝐭𝐫𝐢𝐛𝐮𝐭𝐞𝐝 𝐚𝐦𝐨𝐧𝐠 𝐡𝐞𝐫 𝐭𝐫𝐨𝐨𝐩𝐬 . 𝐓𝐡𝐞 𝐰𝐡𝐨𝐥𝐞 𝐫𝐞𝐛𝐞𝐥 𝐚𝐫𝐦𝐲 𝐦𝐨𝐮𝐫𝐧𝐞𝐝 𝐡𝐞𝐫 𝐥𝐨𝐬𝐬 .
— 𝐂𝐥𝐲𝐝𝐞 𝐚𝐧𝐝 𝐒𝐭𝐫𝐚𝐭𝐡𝐧𝐚𝐢𝐫𝐧 .
महारानीके जख्मी होनेको खबर अँगरेज़ोंको बिलकुल नहीं मिली । इस कारण महारानीकी अन्त्येष्टिकिय उनके सेवकोंने खब प्रबन्धके साथ की " | इस बातका एक और भी सबूत एक अँगरेज़ी ग्रन्थसे मिलता है ।
➡️ मि ० मार्टिन लिखते हैं :
“ 𝓝𝓸 𝓔𝓷𝓰𝓵𝓲𝓼𝓱 𝓮𝔂𝓮 𝓶𝓪𝓻𝓴𝓮𝓭 𝓱𝓮𝓻 𝓯𝓪𝓵𝓵 . 𝓣𝓱𝓮 𝓗𝓾𝓼𝓼𝓪𝓻𝓼 , 𝓾𝓷𝓬𝓸𝓷𝓼𝓲𝓬𝓸𝓾𝓼 𝓸𝓯 𝓽𝓱𝓮 𝓪𝓭𝓿𝓪𝓷𝓽𝓪𝓰𝓮 𝓽𝓱𝓮𝔂 𝓱𝓪𝓭 𝓰𝓪𝓲𝓷𝓮𝓭 , 𝓪𝓷𝓭 𝓼𝓬𝓪𝓻𝓬𝓮𝓵𝔂 𝓪𝓫𝓵𝓮 𝓽𝓸 𝓼𝓲𝓽 𝓸𝓷 𝓽𝓱𝓮𝓲𝓻 𝓼𝓪𝓭𝓭𝓵𝓮𝓼 𝓯𝓻𝓸𝓶 𝓱𝓮𝓷𝓽 𝓪𝓷𝓭 𝓯𝓪𝓽𝓲𝓰𝓾𝓮 𝔀𝓮𝓻𝓮 , 𝓯𝓸𝓻 𝓽𝓱𝓮 𝓶𝓸𝓶𝓮𝓷𝓽 𝓲𝓷𝓬𝓪𝓹𝓪𝓫𝓵𝓮 𝓸𝓯 𝓯𝓾𝓻𝓽𝓱𝓮𝓻 𝓮𝔁𝓮𝓻𝓽𝓲𝓸𝓷𝓼 , 𝓪𝓷𝓭 𝓻𝓮𝓽𝓲𝓻𝓮𝓭 , 𝓼𝓾𝓹𝓹𝓸𝓻𝓽𝓮𝓭 𝓫𝔂 𝓪 𝓽𝓲𝓶𝓮𝓵𝔂 𝓻𝓮𝓲𝓷𝓯𝓸𝓻𝓬𝓮𝓶𝓮𝓷𝓽 . 𝓣𝓱𝓮𝓷 , 𝓲𝓽 𝓲𝓼 𝓼𝓪𝓲𝓭 , 𝓽𝓱𝓮 𝓻𝓮𝓶𝓷𝓪𝓷𝓽 𝓸𝓯 𝓽𝓱𝓮 𝓯𝓪𝓲𝓽𝓱𝓯𝓾𝓵 𝓫𝓸𝓭𝔂 - 𝓰𝓾𝓪𝓻𝓭 ( 𝓶𝓪𝓷𝔂 𝓸𝓯 𝔀𝓱𝓸𝓶 𝓱𝓪𝓭 𝓹𝓮𝓻𝓲𝓼𝓱𝓮𝓭 𝓪𝓽 𝓙𝓱𝓪𝓷𝓼𝓲 ) 𝓰𝓪𝓽𝓱𝓮𝓻𝓮𝓭 𝓪𝓻𝓸𝓾𝓷𝓭 𝓽𝓱𝓮 𝓵𝓲𝓯𝓮𝓵𝓮𝓼𝓼 𝓯𝓸𝓻𝓶𝓼 𝓸𝓯 𝓽𝓱𝓮 𝓡𝓪𝓷𝓮𝓮 𝓪𝓷𝓭 𝓱𝓮𝓻 𝓼𝓲𝓼𝓽𝓮𝓻 . 𝔀𝓱𝓸 𝓭𝓻𝓮𝓼𝓼𝓮𝓭 𝓲𝓷 𝓶𝓪𝓵𝓮 𝓪𝓽𝓽𝓲𝓻𝓮 ,𝓪𝓷𝓭 𝓻𝓲𝓭𝓲𝓷𝓰 𝓪𝓽 𝓽𝓱𝓮 𝓱𝓮𝓪𝓭 𝓸𝓯 𝓽𝓱𝓮𝓲𝓻 𝓼𝓺𝓾𝓪𝓭𝓻𝓸𝓷𝓼 , 𝓱𝓪𝓭 𝓯𝓪𝓵𝓵𝓮𝓷 𝓽𝓸𝓰 𝓰𝓮𝓽𝓱𝓮𝓻 , 𝓴𝓲𝓵𝓵𝓮𝓭 𝓮𝓲𝓽𝓱𝓮𝓻 𝓫𝔂 𝓹𝓪𝓻𝓽 𝓸𝓯 𝓪 𝓼𝓱𝓮𝓵𝓵 , 𝓸𝓻 𝓪𝓼 𝓲𝓼 𝓶𝓸𝓻𝓮 𝓹𝓻𝓸𝓫𝓪𝓫𝓵𝓮 𝓫𝔂 𝓫𝓪𝓵𝓵𝓼 𝓯𝓻𝓸𝓶 𝓽𝓱𝓮 𝓻𝓸𝓿𝓸𝓵𝓿𝓮𝓻𝓼 𝔀𝓲𝓽𝓱 𝔀𝓱𝓲𝓬𝓱 𝓽𝓱𝓮 𝓗𝓾𝓼𝓼𝓪𝓻𝓼 𝔀𝓮𝓻𝓮 𝓪𝓲𝓶𝓮𝓭 𝓐 𝓯𝓾𝓷𝓮𝓻𝓪𝓵 𝓹𝔂𝓻𝓮 𝔀𝓪𝓼 𝓻𝓪𝓲𝓼𝓮𝓭 𝓪𝓷𝓭 𝓽𝓱𝓮 𝓻𝓮𝓶𝓪𝓲𝓷𝓼 𝓸𝓯 𝓽𝓱𝓮 𝓽𝔀𝓸 𝔂𝓸𝓾𝓷𝓰 𝓪𝓷𝓭 𝓫𝓮𝓪𝓾𝓽𝓲𝓯𝓾𝓵 𝔀𝓸𝓶𝓮𝓷 𝔀𝓮𝓻𝓮 𝓫𝓾𝓻𝓷𝓽 , 𝓪𝓬𝓬𝓸𝓻𝓭𝓲𝓷𝓰 𝓽𝓸 𝓽𝓱𝓮 𝓬𝓾𝓼𝓽𝓸𝓶 𝓸𝓯 𝓽𝓱𝓮 𝓗𝓲𝓷𝓭𝓾𝓼 " - 𝓑𝓷𝓽𝓪𝓼𝓱 𝓘𝓷𝓭𝓻𝓪 𝓟 489
((#इतिहास #RaniLakshmiBai #भारतीय_संस्कृति))


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