भारत की सांस्कृतिक व्याख्या...

भारत की सांस्कृतिक व्याख्या....

आर्यावर्त अथवा भारतवर्ष नामक राष्ट्र कि सांस्कृतिक व्याख्या करनी हो तो ऐसी कर सकते हैं - " जिस राष्ट्र का दर्शन कहता हो मानहानिपूर्ण जीवन से अपनी तेजस्विता और मान मर्यादा के साथ मर जाना ही अच्छा है, वह राष्ट्र भारतवर्ष है।"

    भारतीय कवि-विद कहते हैं -   

ज्वलितं न हिरण्यरेतसं चयं आस्कन्दति भस्मनां जनः ।

अभिभूतिभयादसूनतः सुखं उज्झन्ति न धाम मानिनः ।।

                        ~ किरातार्जुनीयम् 2/20.

    अर्थात् मनुष्य राख की ढेर को तो अपने पैरो आदि से कुचल देते हैं किन्तु जलती हुई आग को नहीं कुचलते । इसी कारण से मनस्वी लोग अपने प्राणो को तो सुख के साथ छोड़ देते हैं किन्तु अपनी तेजस्विता अथवा मान-मर्यादा को नहीं छोड़ते ।

भारत के विषय में कहा गया है - -

       गायन्ति देवाः किल गीतकानि धन्यास्तु ते भारतभूमिभागे । अर्थात भारत जैसे देश में जन्म लेकर भी जो अपने मानव जीवन का सदुपयोग - न करे , उससे बड़ा आत्मघाती और कौन होगा !

भारतीय वाङ्मय के गम्भीर अध्येता स्टीफन नेप ने मैकाले प्रणीत शिक्षा पद्धति पर टिप्पणी करते हुए लिखा है -

This form of education indoctrinates the children to doubt their own culture , and disrespect their own history and traditions . As a result of this form of education , the Hindu population is slowly forgetting the unique history and lofty culture of their homeland .

क्या आज सचमुच ऐसा ही नहीं हो रहा है ?

 आगे बढ़ने से पूर्व थामस मुनरो , जो ईस्ट इण्डिया कम्पनी में एक अधिकारी थे तथा राजनेता थे उन्होंने अपने अनुभव के आधार पर क्या लिखा है उसे उद्धृत करना चाहेंगे ' यदि यूरोप और भारत के बीच सभ्यता का व्यापारिक रूप से आयात निर्यात होना सम्भव हो तो मुझे विश्वास है कि भारत से यूरोप को बहुत कुछ आयात करना होगा यही दशा हमारे देश इंग्लैण्ड की भी होगी । भारतीय सभ्यता की इससे बड़ी क्या प्रशंसा होगी । उधर मुम्बई के गवर्नर रहे एल्फिन्स्टन लिखते हैं ‘ इस समय भारतीयों में ईमानदारी की काफी कमी आ गई है । परन्तु यह बुराई उन्हीं लोगों तक सीमित है जो हमारी सरकार से सम्बन्धित हैं । ' अर्थात् वे मानते हैं कि मूलरूप से हिन्दुओं का चरित्र सत्य और ईमानदारी से परिपूर्ण है परन्तु जो लोग हमारे सम्पर्क में आये हैं उनमें कमियाँ आ गयीं हैं । पर हम लोग ऐसी स्पष्ट राय का सम्मान नहीं करते। 

 पाश्चात्य उत्कृष्टता के प्रति गहन सम्मोहन को इंगित कर स्वामी विवेकानन्द लिखते हैं--

' रुढ़िवाद को सत्य की कसौटी पर कसने के स्थान पर सत्य की कसौटी ही यह हो गई कि ( इस विषय में ) पाश्चात्य क्या कहता है । '

    और यही बात हम कहना चाहते हैं कि पाश्चात्य का अन्धानुकरण हमारी दुर्गति का मुख्य कारण है । किसी भी प्रकार का प्रतिबन्ध चाहे वह आपके कल्याणार्थ हो निषिद्ध होना चाहिए , यह मानसिकता कहाँ से आयी है ? ऐसी स्वच्छन्दता कि आत्मसंयम और आत्मनियंत्रण की शिक्षा ही महत्वहीन हो गयी ।

    आज कोई सच्चरित्रता की बात करता है तो हम moral policing कहकर उसकी निन्दा करते हैं और सारे बुद्धिजीवी इस आवाज में आवाज मिलाने लगते हैं । ऐसी स्थिति में हमारी दुर्दशा तो होनी ही थी । आज दरिंदगी की हद को छू चुका है यह देश । मोमबत्ती मार्च तो कभी - कभी आँखें खोलते हैं , अन्यथा कोई दिन ऐसा नहीं जाता जब समाचार - पत्रों में दुष्कर्म की कोई सूचना न हो । आज हम त्रस्त तो हैं पर कारण और समाधान अभी ओझल ही हैं ।

    जहाँ ' बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ ' अभियान के अन्तर्गत बेटियों को सशक्त बनाने की बात कही जा रही हो , भ्रूण - लिंग परीक्षण को इसलिए गैरकानूनी बनाया गया हो ताकि बेटियों के भ्रूण को नष्ट करने के बजाय उसे जन्म दिया जाय , वहाँ यह प्रश्न उठाना स्वाभाविक है कि जहाँ दो वर्ष की बच्ची की अस्मिता रौंद उसे मृत्यु के आगोश में डाल दिया जाता हो और इस बर्बरता में निरन्तर वृद्धि हो रही हो क्या वहाँ वास्तव में माता - पिता बेटी को जन्म देना चाहेंगे ? इसी कारण हमने कुछ वर्ष पूर्व प्रश्न उठाया था कि "क्यों आये । इस देश में लाडो ? ” इस प्रश्न का उत्तर न देश का शासक और न देश के समाज शास्त्री आज तक दे पाए हैं , आज उनका सर सिर्फ शर्म से झुका है ।

     आवश्यकता है इस बात पर गंभीर विचार करने की कि दिन प्रतिदिन दुष्कर्मों , हिंसा तथा क्रूरता की घटनाओं में बढ़ोतरी क्यों होती जा रही है ? विचारना होगा कोई व्यक्ति कर्म कैसे करता है ? उत्तर है जैसे उसके विचार होते हैं । एक ही परिस्थिति में दो भिन्न व्यक्तियों की क्रिया उनके विचारों के कारण भिन्न हो जाती है । जैसे एक सुनसान स्थान पर किसी पथिक की जेब से रुपये गिर पड़ते हैं । दो व्यक्ति वहाँ से निकलते हैं । एक रुपयों को देख कर भी अपने रास्ते निकल जाता है । उसके मन में लालच का लेश भी उत्पन्न नहीं होता परन्तु दूसरा रुपये पड़े देखकर इधर - उधर देखता है और किसी को समीप न पाकर रुपये उठाकर अपनी जेब में डाल लेता है । दोनों के व्यवहार में यह अन्तर क्यों ? एक ने ' परद्रव्येषु लोष्ठवत ' को आत्मसात किया है तो दूसरे को इस सुभाषित के कभी दर्शन भी नहीं हुए । जिस परिवेश में इनका लालन - पालन हुआ उसी के अनुरूप इनके विचार बने हैं । जैसा कुछ हम देखते हैं , जैसा कुछ हम सुनते हैं , वे हमें उस दिशा में धकेलते हैं । अब हम अपने विवेक , स्वभाव , सोच के आधार पर उसे ग्राह्य अथवा त्याज्य मान लेते हैं । परन्तु देखा यह गया है कि धारा की दिशा में प्रत्येक प्रायः बहता ही है , धारा के प्रतिकूल प्रशस्त दिशा में तैरने का साहस तो दयानन्द जैसे विरलों में ही होता है ।

     अंग्रेजों ने जाने से पूर्व ' गौरांग प्रभुता ' की एक दिशा हमें दी और हम उसमें आकण्ठ डूब गए , धारा की दिशा में बहने लगे । हमने यह मान लिया कि जो कुछ पाश्चात्य है श्रेष्ठ है । हम और हमारी पीढ़ी अंग्रेजों से भी अधिक अंग्रेज बन गयी । अंग्रेजियत ने धीरे - धीरे हमारे घरों में पैर पसारने शुरू कर दिए । अंग्रेजी ने हमें मानसिक रूप से ऐसा पराभूत किया कि जब हमारा बच्चा कान्वेंट ( कान्वेंट ही क्यों आज तो सरकारी विद्यालयों को छोड़ दें तो प्रत्येक विद्यालय कान्वेंट बना हुआ है ) से आकर अंग्रेजी में बात करता है तो हमारा सीना ५६ इंच से भी ज्यादा फूल जाता है । 

अंग्रेज या ईसाई ७ वीं शताब्दी तक पढना लिखना या स्कूल जाना भी नहीं जानते थे। भाषा से लेकर लिपि भी उन्होंने आदि सभ्यता वैदिक आर्यावर्त से ही विश्व के विभिन्न देशों के भांति प्राप्त की। इंग्लैंड में पहली स्कूल सन 597 ई . में खुली , वही भारत में लाखों वर्षों का वैदिक इतिहास और प्राचीन रामायण , महाभारत काल छोड दिया जाय, लाखों गुरूकुलो को छोड़ दिया जाय, तथा केवल अकेले “तक्षशिला विश्वविद्यालय” के इतिहास को ही खंगाला जाय तो भी १६ वीं शताब्दी ई . पू . में कौटिल्य तथा चंद्रगुप्त द्वारा मौर्य साम्राज्य की नींव रखी गई और १९ वीं शताब्दी ई . पू . यानी बुद्ध के समकालीन कई लोग वहा पढे , तदनुसार २० वीं शताब्दी ई . पू . में भी तक्षशिला विश्वविद्यालय का विद्यमान होना सिध्द होता है ।

      #अपोलोनियस ने लिखा है कि ग्रीक विज्ञान का जन्मदाता भारत में पढ़ा था । स्वयं अपोलोनियस ठोस ज्यामिति पढ़ने के लिये पहले मिस्र गया था , पर वहाँ इसका कोई शिक्षक नहीं मिलने के उसे “तक्षशिला” आना पड़ा ( हार्वर्ड ओरिएंटल सीरीज़ - अपोलोनियस )


      जातक कथाओं एवं विदेशी पर्यटकों के लेख से पता चलता है कि तक्षशिला के स्नातक | मस्तिष्क के भीतर तथा अंतडिय़ों तक का आपरेशन बड़ी सुगमता से कर लेते थे । वे लोग कितने मुर्ख और दृष्ट है कितने गुलाम मानसिकता के और अज्ञान मे दयनीय है जो कहते हैं कि अंग्रेजो ने आकर हमे पढना लिखना सिखाया । ऐसे अज्ञानी दुर्दशा उनके नादानी और हास्यास्पद मुर्खता की परिचायक है।


#तक्षशिला_विश्वविद्यालय_का_समय :


     एतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार तक्षशिला विश्वविद्यालय जिसमे १९ वीं शताब्दी ईसा पूर्व मे गौतम बुद्ध के समकालीन कुछ प्रसिद्ध व्यक्ति भी वहीं के विद्यार्थी रह चुके थे जिनमें मुख्य थे तीन सहपाठी कोसलराज प्रसेनजित्, मल्ल सरदार बन्धुल एवं लिच्छवि महालि; प्रमुख वैद्य और शल्यक जीवक तथा ब्राह्मण लुटेरा अंगुलिमाल। वहाँ से प्राप्त आयुर्वेद सम्बन्धी जीवक के अपार ज्ञान और कौशल का विवरण विनयपिटक से मिलता है। ई. पू. १५३५ में या १६ वीं शताब्दी विक्रम सं. पूर्व में कौटिल्य और चंद्रगुप्त मौर्य द्वारा मौर्य साम्राज्य की नींव रखी गई थी। अतः तक्षशिला विश्वविद्यालय का समय २० वीं शताब्दी विक्रम पूर्व या ईसा पूर्व था। 

 [[ किसी भी पाठक को बुद्ध के काल पर संदेह हो तो अवश्य हमारे यह लेख पढे : -

 (१)https://www.facebook.com/groups/1750873528336204/permalink/4276697502420448/?app=fbl

(२)https://www.facebook.com/groups/1750873528336204/permalink/4250375665052632/?app=fbl ]] 

     प्राचीन भारतीय साहित्य के अनुसार पाणिनी, कौटिल्य, चन्द्रगुप्त, जीवक, कौशलराज, प्रसेनजित आदि महापुरुषों ने इसी विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त की। तक्षशिला विश्वविद्यालय में वेतनभोगी शिक्षक नहीं थे और न ही कोई निर्दिष्ट पाठयक्रम था। आज कल की तरह पाठयक्रम की अवधि भी निर्धारित नहीं थी और न कोई विशिष्ट प्रमाणपत्र या उपाधि दी जाती थी। शिष्य की योग्यता और रुचि देखकर आचार्य उनके लिए अध्ययन की अवधि स्वयं निश्चित करते थे। परंतु कहीं-कहीं कुछ पाठयक्रमों की समय सीमा निर्धारित थी। चिकित्सा के कुछ पाठयक्रम सात वर्ष के थे तथा पढ़ाई पूरी हो जाने के बाद प्रत्येक छात्र को छरू माह का शोध कार्य करना पड़ता था। इस शोध कार्य में वह कोई औषधि की जड़ी-बूटी पता लगाता तब जाकर उसे डिग्री मिलती थी।

सुप्रसिद्ध विद्वान, चिंतक, कूटनीतिज्ञ, अर्थशास्त्री चाणक्य ने भी अपनी शिक्षा यहीं पूर्ण की थी। उनके शिष्यों में सर्वाधिक प्रसिद्ध हुआ चन्द्रगुप्त मौर्य, जिसने अपने गुरु के साथ मिलकर मौर्य साम्राज्य की स्थापना की। तक्षशिला में प्राय- उच्चस्तरीय विद्याएँ ही पढ़ाई जाती थीं और दूर-दूर से आने वाले बालक निश्चय ही किशोरावस्था के होते थे जो प्रारंभिक शिक्षा पहले ही प्राप्त कर चुके होते थे।

       तक्षशिला विश्वविद्यालय में पूरे विश्व के 10,500 से अधिक छात्र अध्ययन करते थे। यहां 60 से भी अधिक विषयों को पढ़ाया जाता था। 326 ईस्वी पूर्व में विदेशी आक्रमणकारी सिकन्दर के आक्रमण के समय यह संसार का सबसे प्रसिद्ध विश्वविद्यालय ही नहीं था, अपितु उस समय के चिकित्सा शास्त्र का एकमात्र सर्वोपरि केन्द्र था। तक्षशिला विश्वविद्यालय का विकास विभिन्न रूपों में हुआ था। इसका कोई एक केन्द्रीय स्थान नहीं था, अपितु यह विस्तृत भू भाग में फैला हुआ था।

      विविध विद्याओं के विद्वान आचार्यो ने यहां अपने विद्यालय तथा आश्रम बना रखे थे। छात्र रुचिनुसार अध्ययन हेतु विभिन्न आचार्यों के पास जाते थे। महत्वपूर्ण पाठयक्रमों में यहां वेद-वेदान्त, अष्टादश विद्याएं, दर्शन, व्याकरण, अर्थशास्त्र, राजनीति, युद्धविद्या, शस्त्र-संचालन, ज्योतिष, आयुर्वेद, ललित कला, हस्त विद्या, अश्व-विद्या, वेद मन्त्र-विद्या, संगीत, विविद्य भाषाएं, रसायन शास्त्र, शिल्प शास्त्र आदि की शिक्षा विद्यार्थी प्राप्त करते थे।

              भारत में धार्मिक विचार का विकास नहीं , किन्तु ह्रास ही हुआ है । उन्नति नहीं , अवनति ही हुई है । इसलिए हम यह परिणाम निकालने में न्याययुक्त हैं कि वैदिक आर्यों के उच्चतर और पवित्रतर ईश्वरादि विषयक विचार एक प्रारम्भिक ईश्वरीय ज्ञान के प्रादुर्भाव का परिणाम था ।

             ~ ' टीचिंग आफ़ दी वेदाज़ ' पृ. 231

                            (मौरिस फिलिप)

  हम रोज अधोगति कि ओर.... असभ्यता की ओर... संस्कार - संस्कृति , धर्म और आध्यात्मिक रूप से हिन.. मानवता, नैतिक - मुल्य आदि से क्षत हो रहे हैं - यही परिलक्षित होता है जब इतिहास का अध्ययन करते हैं..... हमारे पूर्वज हमसे उच्च स्तरीय ज्ञान विज्ञान के मर्मज्ञ थे। इसका जो कारण है ईश्वरीय ज्ञान वेद से दुर होना। पहले भौतिक आत्मिक रूप से अधिक विकसित थे और अब अविकसित.....  

         यह अंतर स्पष्ट करता है कि संसार में सर्वप्रथम हर वस्तु का ज्ञान सिधे ईश्वर द्वारा दिया गया। संपूर्ण विश्व वेद को सबसे प्राचीन प्राचीन ग्रन्थ स्वीकार करता है। वेद ही समस्त विज्ञान का जनक सिद्ध होता है। अतः वही ईश्वरीय अपौरुषेय (श्रृति) ज्ञान है।

          कुछ लोग जब भारत की संस्कृति की तुलना कल के जन्मे पाश्चात्यो से करते हैं तो अंतर्मन मे पिडा सी महसुस होती है। भारत आखिर भारत है, आर्यावर्त है.... अतुलनीय है... इस की संस्कृति ही सबसे प्राचीन है और सबसे वैज्ञानिक और अतित मे सबसे उन्नत और पुरे विश्व में व्याप्त रही है...! इसका अतित भी इतिहास भी पुरे मानवता और विश्व का प्राचीन इतिहास कहा जा सकता है.....! ऐसी गौरवशाली संस्कृति के लोग जब अपने से असभ्य पाश्चात्यो की ओर देखते हैं तो हास्यास्पद दुर्गति , माईन्ड लिंचींग युक्त अज्ञान, मैकाले की बौद्धिक दासता के वे परिचायक बन जाते हैं जिसमे कयी हद तक उनका दोष ही नहीं है.....! और महत्वपूर्ण बात यह है कि ये दुर्गति और अविकसित अवस्था कयी विदेशी भी समझ चुके हैं....! लेकिन हम नही समझ रहे.....                      

                #इतिहास #भारतीयसंस्कृति  

            ✍️जय मां वेद भारती 🚩🚩🚩🚩

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

ओ३म् 🕉️

महाराणा प्रताप के दरबारी पं. चक्रपाणि मिश्र: ज्ञान विज्ञान के एक विस्मृत एक अपरिचित एतिहासिक पात्र......

नशेड़ी ओशो के अनुसार बच्चे खुलकर नशा करें...