भारतीयता व नारी...
वर्तमान शिक्षा का एक बड़ा दोष यह है कि स्त्रियोंमें नारीत्व और मातृत्वका नाश होकर उनमें पुरुषत्व बढ़ रहा है और उधर पुरुषों में स्त्रीत्वकी वृद्धि हो रही है ! नारी नियमित व्यायाम करके और भाँति - भाँतिके अन्यान्य साधनोंके द्वारा ' मर्दाना ' बनती जा रही है , तो पुरुष अङ्ग लालित्य , भाव - भङ्गिमा , केश - विन्यास और स्वर - माधुर्य आदि के द्वारा ' जनाना ' बनने जा रहे हैं । स्त्रियोंमें मर्दानगी अवश्य आनी चाहिये ! उनको रणचण्डी और दशप्रहरण - धारिणी दुर्गा बनना चाहिये । परंतु बनना चाहिये पति - पुत्रका अहित करनेकी इच्छा रखनेवाले दुष्ट आततायीको दण्ड देनेके लिये ही । यह तभी होगा , जब उनमें पत्नीत्व और मातृत्वका अक्षुण्ण भाव स्थिर रहेगा ।
भारतवर्ष में तो नारीकी रणरङ्गिणी मुण्डमालिनी कराली कालीके रूपमें और सिंहवाहिनी महिषमर्दिनी दुर्गाके रूपमें पूजा की जाती है । परंतु वहाँ भी वह है मां ही । स्नेहमयी माता , प्रेममयी पत्नी यदि वीराङ्गना बनकर रण - सज्जा - सुसज्जित होकर मैदान में आवेगी तो वह आततायियोंके हाथसे अपनी तथा अपने पति पुत्रकी रक्षा करके समाज और देशका अपरिमित मङ्गल एवं मुख उज्ज्वल करेगी । परंतु इस हृदय - धनको खोकर , मनकी इस परम मूल्यवान् सम्पत्तिको गँवाकर केवल देहके क्षेत्र में स्वतन्त्र होनेके लिये यदि नारी तलवार हाथमें लेगी तो निश्चय समझिये , उस तलवारसे प्यारी संतानोंके ही सिर धड़से अलग होंगे , प्राण प्रियतम पतियोंके ही हृदय बेधे जायेंगे और सबके मुखौंपर कालिमा लगेगी !!
स्त्रियोंको रणरङ्गिणी बननेके पहले इस बातको अच्छी तरह सोच रखना चाहिये । अत्याचारी , अनाचारीका दमन करनेके लिये हमारी मां - बहिनें रणचण्डी बनें , परंतु हमारी रक्षा और हमारे पालनके लिये उनके हृदयसे सदा अमीरस बहता रहे । वहाँ तलवार हाथमें रहे ही नहीं । अतएव इस भ्रमको छोड़ देना चाहिये कि ' वर्तमान यूरोप अमेरिकामें यौन स्वच्छंदता के कारण भौतिक प्रगति हुई है। ' भौतिक विकास भ्रष्टाचार मुक्त व्यवस्था व बौद्धिक संपदा परिश्रम व यत्नशील वैज्ञानिक अनुसंधानक इंजीनियर्स आदी विद्यावान वर्ग के इंद्रिय निग्रह का ही परिणाम होता है। फिर यदि मान भी लें कि किसी अंश में लाभ हुआ भी हो तो वहाँका वातावरण , वहाँकी परिस्थिति , वहाँके रस्मोरिवाज , वहाँकी कल्चर, कथित सभ्यता और वहाँका लक्ष्य दूसरा है तथा हमारा बिल्कुल दूसरा । वहाँ केवल भौतिक उन्नति ही जीवनका लक्ष्य है ; हमारा लक्ष्य है सर्वांगीण विकास, आध्यात्मिक विकास, परमात्माकी प्राप्ति । परमात्मा की प्राप्तिमें सर्वोत्तम साधन है विलास - वासनाका त्याग और इन्द्रियसंयम । इसका खयाल रखकर ही हमें अपनी शिक्षा पद्धति बनानी चाहिये । तभी हमारी नारियाँ आदर्श माता और आदर्श गृहिणी बनकर जगत्का मङ्गल कर सकेंगी ।
कहा जा सकता है कि क्या स्त्रियाँ देशक़ा , समाजका कोई काम करें ही नहीं ऐसी बात नहीं है । करें क्यों नहीं , करें , पर करें अपने स्वधर्मको बचाकर । अपने स्वधर्मकी जितनी भी शिक्षा अशिक्षित बहिनोंको दी जा सके , उतनी अपने उपदेश और आचरणोंके द्वारा वे अवश्य दें । सच्ची बात तो यह है कि यदि पति , पुत्र , पुत्रियाँ सब ठीक रहें , अपने - अपने कर्तव्य - पालनमें ईमानदारीसे संलग्न रहें , तो फिर देश में , समाजमें ऐसी बुराई ही कौन - सी रह जाय , जिसे सुधारनेके लिये माताओंको घरसे बाहर निकलकर कुछ करना पड़े ? और पुरुषों को सत्पुरुष बनानेका यह काम है माताओंका । माताएँ यदि अपने स्व - धर्ममें तत्पर रहें तो पुरुषोंमें उच्छृङ्खलता आवेगी ही नहीं ।
अतः भारतकी आदरणीय देवियोंसे हाथ जोड़कर प्रार्थना है कि वे अपने स्वरूपको सँभालें । अपने महान् दायित्वकी ओर ध्यान दें और पुरुषोंको वास्तविक स्वधर्मपरायण पुरुष बनावें । पुरुषोंकी प्रतिमाका वैसा ही निर्माण होगा , जैसा सर्वशक्तिमयी माताएँ करना चाहेंगी आज जो पुरुष बिगड़े हैं , इसका उत्तरदायित्व माताओंपर ही है । वे उन्हें बना सकती हैं । यदि माताएँ पुरुषों की परवा न करके , अपने पति - पुत्रों की कल्याण - कामना न करके अपनी स्वतन्त्र व्यक्तिगत कल्याण - कामना करने लगेंगी , तो पुरुषोंका पतन अवश्यम्भावी है और जब पति - पुत्र बिगड़ गये तो गृहिणी और माता भी किसके बलपर अपने सुन्दर स्वरूपकी रक्षा कर सकेंगी ।
पुरुषोंको बचाकर अपनेको बचाना - पुरुषोंको पुरुष बनाकर अपने नारीत्वका अभ्युदय करना— इसीमें सच्चा कल्याणकारी नारी - उद्धार है । पुरुषको बे - लगाम छोड़कर नारीका उसकी प्रतिद्वन्द्वी होकर अपनी स्वतन्त्र उन्नति करने जाना तो पुरुषको निरङ्कुश , अत्याचारी , स्वेच्छाचारी बनाकर उसकी गुलामीको ही निमन्त्रण देना है और फलतः समाजमें दुःखका ऐसा दावानल धधकाना है , जिसमें पुरुष और स्त्री दोनोंके ही सुख जलकर खाक हो जायँगे !!
ईश्वरकी कृपासे नारीमें सुबुद्धि जाग्रत् हो , जिसमें वह अपने उत्तरदायित्वको समझे और स्वधर्म परायण होकर जगत्का परम मङ्गल करे ।
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