रामायण मे शल्य प्रसव परिच्छेद का वर्णन...
रामायण मे शल्य प्रसव परिच्छेद का वर्णन...
संपूर्ण विश्व में आचार्य सुश्रुत फादर आफ सर्जरी कहे जाते हैं। आरंभिक अंग्रेजी काल तक भारत में ये सर्जरी नाई समूह के सर्जन कर लिया करते थे ऐसे प्रमाण भी मिलते हैं। भारतीय इतिवृत्त को आयुर्विज्ञान के आलोक में जानने-समझने वाले भलीभांति जानते हैं यहां शल्यक्रिया का आविर्भाव सुश्रुत से ही नही स्वयं आत्रेयादि आचार्यो से भी प्राचीन व अपौरुषेय है। वह परंपरा विलुप्त तो विश्वविद्यालयों के लाखों करोड़ों ग्रंथो के अनल के राख होने के संग, पुरे सनातन शिक्षा व्यवस्था समेत अंततोगत्वा गुरूकुलो को बैन लगाने पर्यंत व 1947 पश्चात से अबतक आयुर्वेद के क्षेत्र में कांग्रेस कालीन दुर्लक्ष व वर्तमान दुर्लक्ष तक कारणीभूत है। शल्य प्रसव परिच्छेद का जनक आयुर्वेद है। शल्यक्रिया सर्जरी, सिजेरियन प्रसव सबकुछ आयुर्वेद के अंग है। मौर्य सम्राट बिंदुसार तो सकुशल उनकी माता के गर्भ से शल्य प्रसव परिच्छेद द्वारा ही जन्मे। उलल है कि उनकी माता को विष दिया गया था, तब ऐसा करना पड़ा। वैसे इसकी आवश्यकता होती नही थी। ऐसे ही आपातकालीन परिस्थिति में होती थी। रामायणकाल मे हमारे भारतीय चिकित्सा पद्धति का विकास कैसा उत्तमोत्तम विकसित था वह वाल्मीकि रामायण में आये वर्णन से विदित होता है। इस वर्णनसे संकेत मिलता है कि तत्कालीन भारतकी चिकित्सा व्यवस्था नितान्त सफल एवं सर्वाङ्गीण थी ।
यथा- -
अनामयश्च मर्त्यानां साग्रो मासो गतो ह्ययम् ॥
जीर्णानामपि सत्त्वानां मृत्युर्नायाति राघव ।
अरोगप्रसवा नार्यो वपुष्मन्तो हि मानवाः ॥
( वा ० रा ० ७ । ४१ । १८-१९ )
[ भरतजी श्रीरामजीसे कहते हैं कि हे राघव ! ]
आपके राज्यमें अभिषिक्त हुए एक माससे अधिक हो गया , तबसे सभी लोग नीरोग दिखायी देते हैं । बूढ़े प्राणियोंके पास भी मृत्यु नहीं फटकती है । स्त्रियाँ बिना कष्टके प्रसव करती हैं । सभी मनुष्योंके शरीर हृष्ट - पुष्ट दिखायी देते हैं ।
लोकनाथे गर्भस्थजन्तोरिव शल्यकृन्तः ।
तस्मिन्ननागच्छति नूनं ममाङ्गान्यचिरादनार्यः शस्त्रैः
शितैश्छेत्स्यति राक्षसेन्द्रः ॥
( वा ० रा ० ५। २८।६ )
अर्थात् लोकनायक श्रीराम यदि समयसे यहाँ नहीं पहुँच पाये तो यह दुष्ट रावण मेरे अङ्गोंको वैसे ही काट डालेगा , जैसे गर्भस्थ शिशुकी ( सुख- प्रसवके लिये ) शल्यक्रिया करनेवाला वैद्य ।
❝ वेदों से हमें शल्यक्रिया - की कला ,
औषधि , संगीत तथा ललित कला
की जानकारी प्राप्त होती है ।
वेद मानव जीवन के प्रत्येक पहलुओं
जैसे - संस्कृति , धर्म , नीतिशास्त्र ,
अन्तरिक्ष ज्ञान , पर्यावरण तथा
वास्तुशास्त्र इत्यादि की सम्पूर्ण
जानकारी देते हैं । ❞
~ विलियम जोन्स ( 1746-1794)
(पुराशास्त्री , भाषा शास्त्री , भारतीय इतिहास
तिथिक्रम विकृतिकरणकर्ता )
❝ चरक और सुश्रुत के इस देश में १८ वीं शती में भी आयुर्वेद का पर्याप्त प्रभाव शेष था । चेचक का टीका लगाने की देशी प्रथा भारत के कई हिस्सों में व्यापक थी जबकि इंग्लैंड में चेचक का टीका १७२० ई . के बाद ही चला । शल्य - चिकित्सा में भी भारतीय ग्रामीण वैद्य १८ वीं सदी में इतने उन्नत बचे रहे थे कि इंग्लैंड की स्थिति की उनसे तुलना ही नहीं हो सकती । ❞
[[पृ. 50.📖भारत का स्वधर्म (प्रो. धर्मपाल)]]
❝ जिस तरह अंग्रेजों ने सुनियोजित ढंग से भारतीय वस्त्रोद्योग एवं कारीगरी को विनष्ट किया , उसी तरह टीका लगाने एवं चिकित्सा कौशलों का भी हनन किया । १८०२ ई . के आसपास से बंगाल प्रेसीडेन्सी में भारतीय तरीके से चेचक का टीका लगाना प्रतिबंधित कर दिया गया । इससे भयंकर महामारी फैली । भारत में परम्परा से इस रोग के निवारक उपाय भी अत्यन्त विस्तृत एवं व्यापक थे । पर साथ ही टीके की भी तकनीक विकसित थी । किन्तु अंग्रेजों ने उसका दमन किया और स्वयं की विकसित हो रही तकनीक के पक्ष में हवा बनाने के लिए उस काम को रोक दिया । अपनी टीका - तकनीक भी सबको सुलभ नहीं करा पाए । फलतः उन्नीसवीं शती और बीसवीं शती के पूर्वार्द्ध में भारत में चेचक महामारी भयंकर रूप से बार - बार फैली । शल्य चिकित्सा में निपुणता भी भारतीय ग्रामीण वैद्यों में १८ वीं शती तक शेष थी । अंग्रेजों ने उनकी विधि को अवैज्ञानिक मानकर भारत में तो उसे दबाया , लेकिन ब्रिटेन में इसी भारतीय विधि के आधार पर यूरोपियन माने वाली शल्य चिकित्सा को विकसित किया ऐसा १७९५ और १८१५ के बीस बरसों में किया गया । गणित एवं ज्योतिष में प्राचीन भारत की श्रेष्ठता विश्व विदित है । किन्तु १८ वीं सदी में हमारी इस मामले में क्या स्थिति थी , इस पर प्रायः अस्पष्टता है । भारतीय गणित - ज्योतिष १८ वीं शती में भी पर्याप्त विकसित थी । ❞
~ प्रो. धर्मपाल [पृ. ५०.📖भारत का स्वधर्म ]
((#इतिहास #रामायण #स्वदेशी #वैदिकविज्ञान #आयुर्वेद))




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