स्त्रियाँ घर की लक्ष्मी हैं.....
स्त्रियाँ घर की लक्ष्मी हैं.....
प्रजनार्थं महाभागाः पूजा गृहदीप्तयः ।
स्त्रियः श्रियश्च गेहेषु न विशेषोऽस्ति कश्चन ॥ २६ ॥
[[ स्त्रियां ( प्रजनार्थम् ) सन्तान को उत्पन्न करके वंश को आगे बढ़ाने वाली हैं , ( महाभागाः ) स्वयं सौभाग्यशाली हैं और परिवार का भाग्योदय करने वाली हैं , ( पूजार्हा : वे पूजा अर्थात् सम्मान की अधिकारिणी हैं , ( गृहदीप्तयः ) प्रसन्नता और सुख से घर को प्रकाशित = प्रसन्न करने वाली हैं , यों समझिये कि ( गेहेषु ) घरों में ( स्त्रियः च श्रियः कश्चन विशेष : न अस्ति ) स्त्रियों और लक्ष्मी तथा शोभा में कोई विशेष अन्तर नहीं है अर्थात् स्त्रियां घर की लक्ष्मी और शोभा हैं ॥ २६ ॥]]
ऋषि अर्थ – ‘ ‘ हे पुरुषो ! सन्तानोत्पत्ति के लिए महाभाग्योदय करने हारी , पूजा के योग्य , गृहाश्रम को प्रकाशित करती , सन्तानोत्पत्ति करने - कराने हारी , घरों में स्त्रियाँ हैं , वे श्री अर्थात् लक्ष्मीस्वरूप होती हैं , क्योंकि लक्ष्मी , शोभा , धन और स्त्रियों में कुछ भेद नहीं है । "
( सं. वि. , गृहाश्रमप्रकरण ) -
अनुशीलन – स्त्रियाँ लक्ष्मी रूप हैं – मनु ने जो स्थान तथा महत्त्व स्त्रियों को दिया है , वही समस्त प्राचीन साहित्य में है । इन भावों की तुलना की दृष्टि से ब्राह्मण ग्रन्थों का निम्न लिखित प्रमाण द्रष्टव्य हैं " "
“ श्रियै वा एतद्रूपं यत्पत्न्यः ( शत ० १३.२.६.७ )"
💥 गृहलक्ष्मी vs नौकरानी
वर्तमान में गृहलक्ष्मी का कुछ वामपंथ प्रेरित छद्म नारीवादी तत्व बडा अपमान कर रहे हैं, मानो गृहलक्ष्मी बनना गृहस्थाश्रम सम्हालना हेय हो। गृहलक्ष्मी देवी, श्रीमती, कुलवधू के विरूदो से भारतीयता मे घर कि लक्ष्मी रूप में प्रतिष्ठित है.! आदर की वरिष्ठ अधिकारी है। वेद काल से लेकर इतिहास में स्त्री आयुर्वेद विदुषी जैसे रूपा, गुरूकुल विश्वविद्यालयो कि उपाध्याया जैसे महाराज भोजदेव कि भार्या लिला , गणित में भी लिलावती , युद्ध मे सहभागी जैसे कैकयी, वेद विदुषी जैसे लोपामुद्रा, अपाला, घोषा, न्याय करने वाली जैसे मंडन मिश्र कि पत्नी भारती, साम्राज्ञी या शासिका जैसे शची, प्रभावती और रूद्रमादेवी आदि भारतीयता कि पहचान रही है। लेकिन इन सब के साथ वो गृहिणी, अर्धांगिनी, माता और कुलवधू के धर्म में भी अग्रगामी रही है। इसके लिए उसे गृहलक्ष्मी का विरूदविमुख नही होना पडा ये हमारे महान इतिहास का उदाहरण है। हम यहा केवल वामपंथियों को इसका प्रति उत्तर ही दे रहे हैं...विवाह परंपरा पर वामपंथी कोठा अपने काले कारनामे दिखा रहा है।
1️⃣ देवसम्राज्ञी शची देवताओं के राजा इन्द्र की पत्नी थीं।
2️⃣ शाकल्य देवी महाराज अश्वपति की पत्नी थीं। एक बार अश्वपति महाराज ने ऋषियों से कहा कि मैं राष्ट्र में कन्याओं का भी निर्वाचन चाहता हूं। देश में ऐसी कौन महान वेदों की विदुषी है जो देवकन्याओं को वेदों की शिक्षा प्रदान करे। ऋषियों ने बताया कि आपकी पत्नी से बढ़कर वेदों की विदुषी और कोई नहीं है। तो राजा ने अपनी पत्नी शाकल्य देवी को वनवास दे दिया, ताकि वे वनों में रहकर कन्याओं के गुरुकुल स्थापित करें, आश्रम बनाएं और उसमें देश की कन्याएं शिक्षा पाएं। उन्होंने ऐसा ही किया। शाकल्य देवी ऐसी विदुषी थी , जिन्होंने कन्याओं के लिए शिक्षणालय स्थापित किए थे।
3️⃣ सती शतरूपा स्वायम्भुव मनु की पत्नी थीं। वे चारों वेदों की प्रकाण्ड विदुषी थी।ये योगशास्त्र की भी प्रकाड विद्वान और साधक थीं।
4️⃣ विदुषी अरून्धती ब्रहर्षि वसिष्ठ जी की धर्मपत्नी थीं। ये भी वेदों की प्रकाण्ड विद्वान थी।
5️⃣ ब्रह्मवादिनी अपाला भी अत्रि मुनि के वंश में ही उत्पन्न हुई थीं। अपाला को भी कुष्ठ रोग हो गया था, जिसके कारण इनके पति ने इन्हें घर से निकाल दिया था। ये पिता के घर चली गई और आयुर्वेद पर अनुसंधान करने लगी। सोमरस की खोज इन्होंने ही की थी। इन्द्र देव ने सोमरस इनसे प्राप्त कर इनके ठीक होने में चिकित्सीय सहायता की। आयुर्वेद चिकित्सा से ये विश्वसुंदरी बन गई और वेदों के अनुसंधान में संलग्न हो गईं।
6️⃣ ब्रह्मवादिनी वाक् अभृण ऋषि की कन्या थी। ये प्रसिद्ध ब्रह्मज्ञानिनीं थीं। इन्होंने अन्न पर अनुसन्धान किया और अपने युग में उन्नत खेती के लिए वेदों के आधार पर नए-नए बीजों को खेती के लिए किसानों को अनुसंधान से पैदा करके दिया।
7️⃣ ब्रह्मवादिनी रोमशा बृहस्पति की पुत्री और भावभव्य की धर्मपत्नी थी। इनके सारे शरीर में रोमावली थी, इससे इनके पति इन्हें नहीं चाहते थे। लेकिन इन्होंने ज्ञान का प्रचार-प्रसार किया, ऐसी बातों का प्रचार किया, जिससे नारी शक्ति में बुद्धि का विकास होता हो।
8️⃣ ब्रह्मवादिनी गार्गी के पिता का नाम वचक्नु था, जिसके कारण इन्हें वाचक्नवी भी कहते हैं। गर्ग गोत्र में उत्पन्न होने के कारण इन्हें गार्गी कहा जाता है। ये वेद शास्त्रों की महान विद्वान थी। इन्होंने शास्त्रार्थ में अपने युग में महान विद्वान महिर्ष याज्ञवल्क्य तक को हरा दिया था।
9️⃣ विदुषी मैत्रेयी महर्षि याज्ञवल्क्य की पत्नी थीं। इन्होंने पति के श्रीचरणों में बैठकर वेदों का गहन अध्ययन किया। पति परमेश्वर की उपाधि इन्हीं के कारण जग में प्रसिद्ध हुई, क्योंकि इन्होंने पति से ज्ञान प्राप्त किया था और फिर उस ज्ञान के प्रचार-प्रसार के लिए कन्या गुरुकुल स्थापित किए।
🔟 विदुषी सुलभा महाराज जनक के राज्य की परम विदुषी थी। इन्होंने शास्त्रार्थ में राजा जनक को हराया एवं स्त्री शिक्षा के लिए शिक्षणालय की स्थापना की।
💥 विदुषी लोपामुद्रा महिर्ष अगस्त्य की धर्मपत्नी थीं। ये विदर्भ देश के राजा की बेटी थी। राजकुल में जन्म लेकर भी ये सादा जीवन उच्च विचार की समर्थक थी, तभी तो इनके पति ने इन्हें कहा था- तुष्टोsअहमस्मि कल्याणि तव वृत्तेन शोभने, अर्थात् कल्याणी तुम्हारे सदाचार से मैं तुम पर बहुत संतुष्ट हूं।
💥 विदुषी उशिज, ममता के पुत्र दीर्घतमा ऋषि की धर्मपत्नी थी। महर्षि काक्षीवान इन्हीं के सुपुत्र थे। इनके दूसरे पुत्र दीर्घश्रवा महान ऋषि थे। वेदों की शिक्षा इन्होंने ही अपने पुत्रों को प्रदान की थी। ऋग्वेद के प्रथम मंडल के ११६ से १२१ तक के मन्त्र पर अनुसंधान आदि किया।
💥 विदुषी प्रातिथेयी महर्षि दधीचि की धर्मपत्नी थी। ये विदर्भ देश के राजा की कन्या और लोपामुद्रा की बहिन थीं। इनका पुत्र पिप्पललाद बहुत बडा विद्वान हुआ है।
💥 ममता दीर्घतमा ऋषि की माता थी। ये बहुत बडी विदुषी एवं ब्रह्मज्ञानसम्पन्ना थीं।
💥 विदुषी भामती वाचस्पति मिश्र की पत्नी थी। ये वेदों की प्रकाण्ड विद्वान थी और इनके पति भी।
हमारे शास्त्रोंमें (आर्ष) नारी-जाति को बहुत आदर दिया गया है । स्त्री की रक्षा करनेके उद्देश्य से शास्त्र ने उनको पिता, पति अथवा पुत्र के आश्रित रहनेकी आज्ञा दी है, जिससे वह जगह-जगह ठोकरें न खाती फिरे, अराजकता या दृष्ट शासन मे विवशाविवश गणिका न बन जाय, शोषित न बन जाय । स्त्री नौकरी करे तो यह उसका तिरस्कार है । उसकी महिमा तो घर में रहने से भी वहीं है, वो गरिमामयी ही है । घर मे रहना हेय नही। श्रेष्ठ संतान कि निर्मात्री, पहली गुरू मां है। वो मानव-समाज कि निर्मात्री है। घर में वह महारानी है, गृहलक्ष्मी है, देवी है, मां है, पर घर से बाहर वह क्या है? नौकरानी (employee) है। employer /संचालिका/व्यावसायिक संस्थापक/मालिकाना हक /shareholder है तो बात कुछ और है, यही भारतीय स्वदेशी दर्शन का कहना है । वो गौरव के अनूकुल ही घर से बाहर हो, अन्यथा नहीं। एक सामान्य भारतीय महिला कि हैसियत इंग्लैंड कि महाराणी के भांति ही थी, कोई परव्यक्ति उससे हाथ नहीं मिला सकता था, ये अंग्रेजों ने इस देश में देखा। घर में तो वह एक पुरुष के अधीन रहेगी, पर बाहर उसको अनेक स्त्री-पुरुषों के अधीन रहना पड़ेगा, अपनेसे ऊँचे पदवाले अफसरों की अधीनता, फटकार, तिरस्कार सहन करना पड़ेगा, जो कि अधिकांश प्रकृति स्वरूप उसके कोमल हृदय, स्वभाव के विरुद्ध है । लेकिन वेद उसको योद्धा या शासिका बनने की आज्ञा देते हैं, अर्थात परिष्कार करना चाहिए, अतः कोमलता भलेही स्वभाव हो लेकिन शरिर को कठोर मन को परिष्कृत बनाने पर वैदिक नारी का गौरव रहा है। नारी आदरके योग्य है, तिरस्कारके योग्य नहीं । पिता, पति अथवा पुत्रकी अधीनता वास्तवमें स्त्रीको पराधीन बनाने के लिये नहीं है, प्रत्युत महान् स्वाधीन बनाने के लिये है । घरमें बूढी ‘माँ’ का सबसे अधिक आदर होता है, बेटे-पोते आदि सब उसका आदर करते हैं, पर घरसे बाहर बूढी ‘स्त्री’ का सब जगह तिरस्कार होता है । आजकल वृद्धाश्रम बढ रहे हैं सो पाश्चात्यिकरण का अपवाद कहो, परंतु भारतीयता मे ऐसा अपमान मां का अकल्पनीय है। नौकरानी बनकर झूठन साफ करना गौरवपूर्ण है? अच्छी नोकरी नारी के लिए उसके गौरव के अनुकूल होनी चाहिए, जैसे प्राचीन समय में उपाध्याया, शिक्षिकाएं होती थी। अन्यथा अन्य नोकरी आपातकालीन परिस्थिति के लिए ही है। चाणक्य लिखते हैं, नोकरी मे सर्वोत्तम नोकरी राजा कि है, माने सरकारी नोकरी, आजकल इस क्षेत्र में privatization जारी किया गया है।
वर्तमान बाजारवाद नारी का अपमान कर रहा है., अनादर कर रहा है, उसको एक भोगवस्तु बनाकर विज्ञापन चिपका रहा है। नारी को बाजारू बनाना बाजार का आर्थिक उद्देश्य है. और उसकी पार्श्वभूमि या वामपंथ कि प्रयोगशाला पंथनिरपेक्ष भारत है जिसे वो अराष्ट्रिकरण द्वारा बिना किसी युद्ध के साफ्ट गतिविधियों से कन्वर्ट करके अपने अधीन करना चाहते हैं यही भारतीय सेना कि आधा मोर्चा (concept) अवधारणा है। पतंजलि जैसी स्वदेशी कंपनी आदर्श है। बिना अश्लीलता के विज्ञापन के एक ब्रांड बनाकर अग्रिम पंक्ति में खड़ा है। वैसे तो स्वदेशी एक दर्शन है। जो कंपनी से ऊपर है, नीजी है, सबके लिए है, नीम कि दातौन भी स्वदेशी दर्शन है तो नवीन यंत्र तकनीक भी, स्वावलंबन और संस्कृति अर्थात् हमारे जडो मे स्वदेशी का दर्शन गहराता हुआ हमे परिष्कृत और अभ्युदयशाली बनाता है ।
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