भारत में धार्मिक विचार का विकास नहीं , किन्तु ह्रास ही हुआ है..

भारत में धार्मिक विचार का विकास नहीं , किन्तु ह्रास ही हुआ है । उन्नति नहीं , अवनति ही हुई है । इसलिए हम यह परिणाम निकालने में न्याययुक्त हैं कि वैदिक आर्यों के उच्चतर और पवित्रतर ईश्वरादि विषयक विचार एक प्रारम्भिक ईश्वरीय ज्ञान के प्रादुर्भाव का परिणाम था ।

             ~ ' टीचिंग आफ़ दी वेदाज़ ' पृ. 231

                            (मौरिस फिलिप)

  हम रोज अधोगति कि ओर.... असभ्यता की ओर... संस्कार - संस्कृति , धर्म और आध्यात्मिक रूप से हिन.. मानवता, नैतिक - मुल्य आदि से क्षत हो रहे हैं - यही परिलक्षित होता है जब इतिहास का अध्ययन करते हैं..... हमारे पूर्वज हमसे उच्च स्तरीय ज्ञान विज्ञान के मर्मज्ञ थे। इसका जो कारण है ईश्वरीय ज्ञान वेद से दुर होना। पहले भौतिक आत्मिक रूप से अधिक विकसित थे और अब अविकसित.....

         यह अंतर स्पष्ट करता है कि संसार में सर्वप्रथम हर वस्तु का ज्ञान सिधे ईश्वर द्वारा दिया गया। संपूर्ण विश्व वेद को सबसे प्राचीन प्राचीन ग्रन्थ स्वीकार करता है। वेद ही समस्त विज्ञान का जनक सिद्ध होता है। अतः वही ईश्वरीय अपौरुषेय (श्रृति) ज्ञान है।

          कुछ लोग जब भारत की संस्कृति की तुलना कल के जन्मे पाश्चात्यो से करते हैं तो अंतर्मन मे पिडा सी महसुस होती है। भारत आखिर भारत है, आर्यावर्त है.... अतुलनीय है... इस की संस्कृति ही सबसे प्राचीन है और सबसे वैज्ञानिक और अतित मे सबसे उन्नत और पुरे विश्व में व्याप्त रही है...! इसका अतित भी इतिहास भी पुरे मानवता और विश्व का प्राचीन इतिहास कहा जा सकता है.....! ऐसी गौरवशाली संस्कृति के लोग जब अपने से असभ्य पाश्चात्यो की ओर देखते हैं तो हास्यास्पद दुर्गति , माईन्ड लिंचींग युक्त अज्ञान, मैकाले की बौद्धिक दासता के वे परिचायक बन जाते हैं जिसमे कयी हद तक उनका दोष ही नहीं है.....! और महत्वपूर्ण बात यह है कि ये दुर्गति और अविकसित अवस्था कयी विदेशी भी समझ चुके हैं....!     

                ✍️ जय मां भारती 🚩🚩🚩🚩

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