राम ही राष्ट्र है....
राम ही राष्ट्र है...
धर्मगुरु वाल्मीकि जी लिखते हैं -
न चास्य महतीं लक्ष्मी राज्यनाशोऽपकर्षति ।
लोककान्तस्य कान्तत्वाच्छीतरश्मेरिव क्षयः ॥ ३२ ॥
श्रीराम अविनाशी कान्ति से युक्त थे , इसलिये उस समय राज्य का न मिलना उन लोककमनीय श्रीराम की महती शोभा में कोई अन्तर न डाल सका ; जैसे चन्द्रमा का क्षीण होना उसकी सहज शोभा का अपकर्ष नहीं कर पाता है ।॥ ३२ ॥
न वनं गन्तुकामस्य त्यजतश्च वसुंधराम् ।
सर्वलोकातिगस्येव लक्ष्यते चित्तविक्रिया ॥३३ ॥
वे वन में जाने को उत्सुक थे और सारी पृथ्वी का राज्य छोड़ रहे थे ; फिर भी उनके चित्त में सर्वलोकातीत जीवन्मुक्त महात्मा की भाँति कोई विकार नहीं देखा गया ॥ ३३ ॥
ऐसे थे राम और इस राष्ट्र की अभिव्यक्ति का एक उच्छ्वास मे किया गया उच्चारण है रामनाम। भगवान राम अयोध्या से चित्रकूट पहुंचे थे। इसके बाद उनके वनवास का निकटम डेढ़ वर्ष चित्रकूट में व्यतीत हुआ और उसके पश्चात वे आगे मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ की ओर बढ़े। सत्यतः यह कहा जाता है कि भगवान राम ने वनवास का पर्याप्त समय दंडकारण्य में व्यतीत किया था और ये आज का छत्तीसगढ़ है। इसलिए यही रामनाम (राम का नाम ) पृथ्वीपति राजारामचंद्र के इन वनवासीयो के शरिरभर उनके नाम के कलान्यास के रूप में आज भी अभिव्यक्त होते दिखाई देता है तो यह उसी इतिवृत्त और रामत्व का प्रस्तोतव्य है।
वैदिक संस्कृति तो विश्व वैदिक सभ्यता है, जिसका उदय अपौरुषेय वेद से इस आर्यावर्त के धरा पर हिमालय मे हुआ। कालांतर से ये भग्न हुई। वर्तमान में खंडित व भग्न ये आर्य संस्कृति मूल स्वरूप वैदिक व पौराणिक, शैव- लिंगायत-वैष्णव, बौद्ध जैन आदिवासी जैसे भग्न स्वरूपों मे अभिव्यक्त हुई। इसी पर डॉ. बी. आर आंबेडकर लिखते हैं -
" पंथों और सिद्धांतों का मिश्रित समूह ( सबका साथ ) हिंदुत्व है । एकेश्वरवाद , बहुदेववाद , सर्वेश्वरवाद ( कण कण में ) , महिलाओं की , प्रकृति की पूजा करने वाला हिंदू है । पंथों और सिद्धांतों का मिश्रित समूह ही हिन्दुत्व है । इसकी छत्रछाया में पलते हैं एकेश्वरवाद , बहुदेववाद और सर्वेश्वरवाद ; महान देवता शिव और विष्णु के उपासक अथवा उनके नारी प्रतिरूप , साथ ही दैवी मातृ शक्तियों , वृक्षों , चट्टानों और जल - धाराओं में बसी हुई आत्माओं और संरक्षक ग्राम्य देवताओं के उपासक हैं।
[ बाबासाहेब डॉ . अम्बेडकर सम्पूर्ण वाङ्मय , खंड 8 , पेज 9 ]
आज राष्ट्र मे सांस्कृतिक पुनर्जागरण का समय गतिमान है। मूर्तिभंजक जिहादीपुरुषों ने गाजी बनने के लिए भंजन किया, वो इस राष्ट्र की भव्य एतिहासिक सांस्कृतिक विरासत पर प्रहार था, हमारे राष्ट्रभाव सभ्यतागत स्वाभिमान पर हुआ प्रहार था। आर्य शिरोमणि श्रीराम का मंदिर भव्य होना इसी पुनरुद्धार का अमृतकाल है।
सभी वानर या वनवासियों से श्रीराम का प्रत्यक्ष परिचयस्थल अरण्य है। रामनामी जनो को श्रीराम से कोई आज भी दुर नही कर पाया। उन्हे बस केवल प्रभु श्रीराम से लेना-देना है, न कोई जातिवादी घृणा न अहं, अभाव हो, अकाल हो जीवन हो या मरण हो, युग बीत गये लेकिन इन्होने कभी रामनाम नही छोडा। आज तो विखंडन के विषैले वायुमंडल में भगवान को भी विभाजित करने वाली ओछी परिकल्पना सहज ही कुछ लोगों में परिलक्षित होती देखी जा सकती है ।
रामकथा को लोकभाषा मे सरल करने वाले लोकप्रिय महाकवि तुलसीदास जी का लिखा रामचरितमानस का यह कथन -
पुत्रवती जुबती जग सोई।
रघुपति भगतु जासु सुतु होई॥
नतरु बाँझ भलि बादि बिआनी।
राम बिमुख सुत तें हित जानी॥
अर्थात् संसार में वही युवती स्त्री पुत्रवती है, जिसका पुत्र श्री रघुनाथजी का भक्त हो। नहीं तो जो राम से विमुख पुत्र से अपना हित जानती है, वह तो बाँझ ही अच्छी। पशु की भाँति उसका ब्याना (पुत्र प्रसव करना) व्यर्थ ही है॥
... एक प्रासंगिक राष्ट्र निर्माण का लक्ष्य बनाने मे मंत्र के भांति उतारने वाला पथ प्रदर्शक सुत्र है। रामायण में है अथवा नहीं? किसने कहाँ, कहा कहाँ आदि छोड़ दिया जाय । और जो लिखा है उसपर दृष्टि केंद्रीत करे., वो अपना विचार बना ले, उसको लक्ष्य बनाकर संस्कार बीज बोये., तब संस्कृति पथगामी वंशश्रेणी का निर्माण एवं उसके निर्माण से राष्ट्र का निर्माण होगा। उक्त विचार सुमित्रा लक्ष्मण के संवाद से लिया गया है.!
यही तो है राष्ट्र व भक्ति का प्रत्यक्ष, अपनी पद्धति.. राम वा रामत्व की सांस्कृतिक एकात्मकता जो अक्षुण्ण राष्ट्र का स्वरूप है। रामनामी वनवासियों को न तो मंदिर से लेनादेना रहा है न मूर्ति से। लेकिन इतिहास साक्षी है इनके केंद्रबिंदू मे बस रामनाम है। इन्हे राम से कोई दुर्विकार दुर न कर सका...
जय श्री राम 🙏🚩❤️
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