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पाश्चात्य कल्चर असभ्यता का परिचायक...

 " जब हमारे पूर्वज पशुओं का शिकार और परस्पर एक दूसरे की हत्या करते रहते थे तब भारत में परिपक्व दर्शन ग्रंथ रचे जा चुके थे । कला , कविता , साहित्य सभी दिशाओं में वह इंग्लैंड से आगे था । "        [[ संदर्भ : न्याय धारा समाचार पत्र - ( काव्य विवेक और निबंध लालित्य : डॉ . जीतेन्द्र पांडेय )]]     पाश्चात्य जंगली ही थे इसका प्रमाण है कि वे पशु के समान अब भी है। पाश्चात्यो तक सभ्यता- ज्ञान - विज्ञान - चरित्र- मणुष्यता आदि की स्थापना भारत से ही वहा पहुंची। लेकिन कालांतर में वो फली फुली फिर भग्न हो गयी, और वेद से अनभिज्ञ तथा फिर जंगली हो गयी। ये जंगलीयत अब भी उनके असभ्यता कि परिचायक है। जैसे रखैल परंपरा अर्थात् कुत्ता कुत्ती पशु परंपरा। यदि कुत्ते या पशुओं का ध्यानपूर्वक निरीक्षण किया जाय तो स्वयं को बंदरपुत्र मानने वाले और पेड पौधे को निर्जीव मानने वाले तथा गैलीलीयो को मारने वाले दो कौड़ी के फटे वस्त्र डालने वाले गंवार असभ्य पाश्चात्य आपको न हिरो लगेंगे न आदर्श न civilized, इतिहास पढ लो या वर्तमान देख लो वे ९९% कुत्ते या पशु ही लगेंगे । वहा यही पशुता/हा...

विज्ञान के नामपर अथेस्टवादी षड्यंत्र...

 सन् 1968 में डा . वी . इन्यूशिन , बी . ग्रिस , चेको , एन . नोरोवोव एन . केरारोवा तथा गुवादुलिन आदि रूसी वैज्ञानिकों ने लम्बे समय तक अनुसंधान और प्रयोग करने के बाद घोषित किया कि जीव - जन्तुओं का शरीर मात्र भौतिक अणु - परमाणुओं से ही नहीं बना है बल्कि इसके अतिरिक्त एक ऊर्जा शरीर भी है । वैज्ञानिकों ने इस शरीर को ' द बायोलॉजिकल प्लाज्मा बॉडी ' नाम दिया है । इस शरीर के सम्बन्ध में यह बताया गया है कि यह केवल उत्तेजित विद्युत अणुओं से बने प्रारम्भिक जीवाणुओं के समूह का योग भर नहीं है वरन् एक व्यवस्थित तथा स्वचालित घटक हैं जो अपना स्वयं का चुम्बकीय क्षेत्र निःसृत करता है । अध्यात्म विज्ञान ने चेतना को स्थूल की पकड़ से सर्वथा परे बताया है उसे केवल अनुभव ही किया जा सकता है । फिर भी प्राणियों का शरीर निर्मित करने वाले घटकों का जितना विवेचन , विश्लेषण अभी तक हुआ है , उससे प्रतीत होता है कि आज नहीं तो कल विज्ञान भी इस तथ्य को अनुभव कर सकेगा कि चेतना को स्थूल यन्त्रों से नहीं , विकसित चेतना के माध्यम से ही अनुभव किया जा सकेगा । ' द बायोलॉजिकल प्लाज्मा बॉडी ' का अध्ययन करते हुए वैज्...