पाश्चात्य कल्चर असभ्यता का परिचायक...

 " जब हमारे पूर्वज पशुओं का शिकार और परस्पर एक दूसरे की हत्या करते रहते थे तब भारत में परिपक्व दर्शन ग्रंथ रचे जा चुके थे । कला , कविता , साहित्य सभी दिशाओं में वह इंग्लैंड से आगे था । "

       [[ संदर्भ : न्याय धारा समाचार पत्र - ( काव्य विवेक और निबंध लालित्य : डॉ . जीतेन्द्र पांडेय )]] 

   पाश्चात्य जंगली ही थे इसका प्रमाण है कि वे पशु के समान अब भी है। पाश्चात्यो तक सभ्यता- ज्ञान - विज्ञान - चरित्र- मणुष्यता आदि की स्थापना भारत से ही वहा पहुंची। लेकिन कालांतर में वो फली फुली फिर भग्न हो गयी, और वेद से अनभिज्ञ तथा फिर जंगली हो गयी। ये जंगलीयत अब भी उनके असभ्यता कि परिचायक है। जैसे रखैल परंपरा अर्थात् कुत्ता कुत्ती पशु परंपरा। यदि कुत्ते या पशुओं का ध्यानपूर्वक निरीक्षण किया जाय तो स्वयं को बंदरपुत्र मानने वाले और पेड पौधे को निर्जीव मानने वाले तथा गैलीलीयो को मारने वाले दो कौड़ी के फटे वस्त्र डालने वाले गंवार असभ्य पाश्चात्य आपको न हिरो लगेंगे न आदर्श न civilized, इतिहास पढ लो या वर्तमान देख लो वे ९९% कुत्ते या पशु ही लगेंगे । वहा यही पशुता/हास्यास्पद असभ्यता चरम पर थी तब हमारे यहा सभ्यता अपने शिखर पर थी। हमारी सभ्यता का विनाश तो हमारे महायुद्ध महाभारत और यादवों के युद्धरत होने के द्वारा जनमेजय पश्चात हुआ। आज भारतीयों की माईंड लिंचींग इतनी बड़ी मात्रा में कर दी गई है कि उन्हें अपने इतिहास के बारे में गौरवशाली जानकारी और सत्य तथ्यों को पढकर आश्चर्य होता है... जबकी आश्चर्य नही होता यदि हम सत्य इतिहास अपने पाठ्यक्रमों में ही पढ लेते। स्वयं कुत्ते होकर भारतीय और कुत्ते not allowed का बोर्ड लगाने वालों के आज भी भारतीय व्यवस्थाएं एवं परिणामस्वरूप अधिकांश भारतीय युवावर्ग दास ही है। पशुता को धारण करके 36 तुकडे कर लेते हैं, वेश्यावृत्ति, अवैध पाश्चात्य कुकर्म इसी गुलामी का और शिक्षा संस्कार विहिन होने और व्यवस्था धर्म विहिन होने का परिणाम है। 

   #सामयिकी #भारतीयसंस्कृति #धर्म #इतिहास #स्वदेशी

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