विज्ञान के नामपर अथेस्टवादी षड्यंत्र...

 सन् 1968 में डा . वी . इन्यूशिन , बी . ग्रिस , चेको , एन . नोरोवोव एन . केरारोवा तथा गुवादुलिन आदि रूसी वैज्ञानिकों ने लम्बे समय तक अनुसंधान और प्रयोग करने के बाद घोषित किया कि जीव - जन्तुओं का शरीर मात्र भौतिक अणु - परमाणुओं से ही नहीं बना है बल्कि इसके अतिरिक्त एक ऊर्जा शरीर भी है । वैज्ञानिकों ने इस शरीर को ' द बायोलॉजिकल प्लाज्मा बॉडी ' नाम दिया है ।

इस शरीर के सम्बन्ध में यह बताया गया है कि यह केवल उत्तेजित विद्युत अणुओं से बने प्रारम्भिक जीवाणुओं के समूह का योग भर नहीं है वरन् एक व्यवस्थित तथा स्वचालित घटक हैं जो अपना स्वयं का चुम्बकीय क्षेत्र निःसृत करता है । अध्यात्म विज्ञान ने चेतना को स्थूल की पकड़ से सर्वथा परे बताया है उसे केवल अनुभव ही किया जा सकता है । फिर भी प्राणियों का शरीर निर्मित करने वाले घटकों का जितना विवेचन , विश्लेषण अभी तक हुआ है , उससे प्रतीत होता है कि आज नहीं तो कल विज्ञान भी इस तथ्य को अनुभव कर सकेगा कि चेतना को स्थूल यन्त्रों से नहीं , विकसित चेतना के माध्यम से ही अनुभव किया जा सकेगा ।

' द बायोलॉजिकल प्लाज्मा बॉडी ' का अध्ययन करते हुए वैज्ञानिकों ने उसके तत्वों का भी विश्लेषण किया । बायोप्लाज्मा की संरचना और कार्यविधि का अध्ययन करने के लिए सोवियत वैज्ञानिकों ने कई प्रयोग किये और इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि बायोप्लाज्मा का मूल स्थान मस्तिष्क है और यह तत्व मस्तिष्क में ही सर्वाधिक सघन अवस्था में पाया जाता है तथा सुषुम्ना नाड़ी और स्नायविक कोशाओं में सर्वाधिक सक्रिय रहता है । शास्त्रकार ने इस शरीर की तुलना एक ऐसे वृक्ष से की है जिसकी जड़ें ऊपर और शाखायें नीचे की ओर हैं ।

जिस प्राण ऊर्जा के अस्तित्व को वैज्ञानिकों ने अनुभव किया वह आत्मचेतना नहीं है बल्कि सूक्ष्म शरीर के स्तर की ही शक्ति है जिसे मनुष्य शरीर की विद्युतीय ऊर्जा भी कहा जाता है यह ऊर्जा प्रत्येक जीवधारी के शरीर में विद्यमान रहती है ।

  (📖 book : panch_pran_panch_dev. ch. 2. awgp)

ऐसी कयी चेतना के आसपास भटकती 1968 से पहले व आज तक चेतना पर्यंत का सफर तय करती हुई वैज्ञानिक अनुसंधान व खोजबीन हुई है, जो भौतिकविदो के ईश्वरीय परम चेतना, पुनर्जन्म आदि के सत्य को अन्वेषित करती हुई वेद वेदांत विज्ञान ही नहीं वैज्ञानिक अध्यात्मवाद से लेकर वैदिक विज्ञान को परिभाषित करती है, पुनर्चक्रण करती है । लेकिन भारतीय पाठ्यक्रम में अनिश्वरवादी षड्यंत्रकारी कम्युनिस्ट वामपंथीयो द्वारा इनकी उपेक्षा की गयी व लेशमात्र चेतन सत्ता पर हुए निष्कर्ष की चर्चा नही की जा सकी। उसका कारण यही है कि वेद की प्रतिष्ठा वेदांत की भारतीय अध्यात्म दर्शन की वैदिकविज्ञान की सार्वभौमिकता का उद्घाटन न हो व भारतीय वंशश्रेणीयां इनसे पृथक चले, और एक कल्ट ऐसी बने हिन्दूओ की जो नास्तिकवादी बने कम्युनिस्ट बने भ्रमित रहे, नैतिकता धर्म व भारतीय इतिवृत्त से ही कट जाय, सांस्कृतिक पृष्ठभूमि से हट जाए.. अधिक से अधिक कन्वर्शन का शिकार हो जाए, औपनिवेशिक दास बने, मानसिक गुलाम बने...

हमे पढाई जानेवाली डार्विनवादी थ्योरी मे, वर्तमान भारतीय पाठ्यक्रम में सभी विकासवादी थ्योरीज् मे, Abiogenesis Biogenesis कही भी Origin Of First Organism मे इस चेतन सत्ता का कही उल्लेख है? निर्जीव से जीव पैदा होने की अवैज्ञानिक काल्पनिक गप्प क्यो पढायी जा रही है, पुछिए देश के निती निर्देशकों मे बैठे पिट्ठुओं से..!? 

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