वर्जित का सामान्यीकरण...
ऐसी फिल्मों को justify करनेवाले लोग निश्चित रूप से व्यभिचारी होते हैं अर्थात् व्यभिचारवादी। और शोशल मिडिया पर इस पर अभी एक पोस्ट में देखा, नीचे कमेंट बॉक्स में कथित भद्र स्त्री पुरुष.. हां आलोचकों को देखकर मन संतोष हुआ कि मानव शेष है अभी। अन्यथा इसे प्रेम शब्द का नाम देकर justify करनेवाले व इसे इसहेतू महानायक बताने वाले गुलाम भी दुर्भाग्य से कम नही है। फिर क्या आश्चर्य ऐसे ही लोगों के द्वारा बलात्कार, अश्लीलता, असामाजिकता क्यो न बढे? मनस तत्व ही दुषीत जो हो चुका है। फलतः विवेक नष्ट हो गए हैं ऐसे लोगों का।
ये समाज में अत्यल्प प्रमाण मे कम अधिक होता है इसका अभिप्राय ये तो नही कि जिस घृणित कर्म की कल्पना भी नहीं होनी चाहिए उसको मनोरंजन बनाकर परोसा जाए । उसे प्रेम नाम देकर justify किया जाय। जिसे देखकर दिमाग खराब होता हो वह मनोरंजन? यह वर्जित का सामान्यीकरण करना नही तो और क्या है? मान लिया जनजागृति... वो तो समाचार कर रहे हैं। फिल्म बने लेकिन इससे संदेश क्या जाता है? वर्जित वस्तु को सामाजिक अत्याचार के भांति पेश किया जाता है। वामपंथ आपको नजर नही आएगा इसमे। चालाकी से राष्ट्र की आत्मा पर प्रहार हो रहे हैं।
कदाचार करने से समाज रोके, तो वो यदि सामाजिक अत्याचार है, नीजी जीवन में दखल है तो वही समाज जब किसी का लव जिहाद वश, प्रेमप्रसंगवश बलात्कार हो रहा हो एवं कोई बचाने न भागे तो दोषी कैसे? नीजी जीवन व स्वतंत्रता मे समाज बाधक बने ये उसका हस्तक्षेप था , तो उसके गलत परिणाम मे वो क्यो दखल दे?
चाइल्ड रेप देखना भी मनोरंजन हो जाए तो ऐसा मनोरंजन मानव का नही पशु का होगा। गले व स्तन कांटकर उसकी ढेर लगाना भी कभी किन्ही आक्रमणकारियों का मनोरंजन था। ऐसा ही यह कदाचार देखना दिखाना कुछ लोगों का मनोरंजन है। इसके परिणामस्वरूप समाज नष्ट भ्रष्ट व दुखी हो रहा है।
राष्ट्रं धारयतां ध्रुवम्...
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