बागेश्वर धाम के कथावाचक के बयान पर सामयिक चिंतन
हम बागेश्वर धाम का संपूर्ण समर्थन करते हैं। शास्त्रार्थ की परंपरा सनातन धर्म की प्राचीन परंपरा रही है। तर्क के कसौटी पर यदि कोई मत मानवता व धर्म के विपरीत हो तब उसका खंडन करना सनातन धर्मीयो का परम धर्म है। कोई भी मत व पंथ धर्म के अनुकूल है वा नही इसको तर्क के कसौटी पर परखा जा सकता है। माननीय विधायक जी मानते वा जानते हैं कि अन्य सनातनी हिंदू उनके कथन का विरोध नही करेंगे। व राजनीति कहती हैं कि ये विरोध वा समर्थन विशेष क्षेत्रीय वोट है, तदनुसार वे अपना बयान दे रहे हैं। राजनेता कोई धर्म के मर्मज्ञ नही। इसलिए सनातनी अपने सनातनी व्यास पीठ की आवाज सुने, क्योंकि वहा जो आवाज आ रही है वो हनुमानजी के कृपापात्र श्रीराम भक्त की आवाज है। वो एकता व संगठितता की आवाज है। वो आवाज सत्य की है। वो आवाज धर्म की है।
विडंबना यह है कि वर्तमान में हिंदू अपनी धार्मिक शिक्षा से 800 वर्ष से संघर्षरत होने से कमसेकम 250 वर्षों से अपनी स्वदेशी व्यवस्था शिक्षा पद्धति आदि से वंचित सा है। राम को न मानकर, रामभक्त को उनसे विलग कर देना व विचित्र संप्रदाय खडा कर देना, इसकी आज से पहले कोई कल्पना भी कर सकते थे? यह इतिवृत्त के अनुसार सही है? इतनी समझ व ज्ञान तो हममे है ना? फिर भी हम निष्क्रिय क्यो? यह सब धर्म विमुख होने का, सेक्युलरिज्म की मैकालेइज्म की शिक्षा व तंत्र का परिणाम है। आज क्या क्या हो रहा है...?? लेकिन हिन्दू पर्याप्त सक्रिय नही है! अब इसपर कोई प्रसिद्धतम, हनुमान जी की कृपा से सिद्धी (विद्या) प्राप्त कथावाचक, कुछ बोल रहे हैं तो कमसेकम उनका समर्थन होना चाहिए। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मौलिक है। उन्होंने कोई भडकाऊ बयान नही दिया है।
हमे कोई भी मत पंथ अलग करे इससे विखंडन होगा, हमे विखंडन का समर्थन नही करना चाहिए, मत पंथ विखंडन बढाते है, और समान धर्म सनातन समान मूल पद्धति हमे एक करती है। सत्य एक ही होता है दो नही होते। सही वा गलत पर विमर्श होना चाहिए। तर्क के साथ। शास्त्रों का अर्थ करना शास्त्रार्थ है। प्रेमपूर्वक विमर्श होना चाहिए। विवाद नही। व निष्कर्ष पर पहुंचकर अंधश्रद्धा त्यागकर, सभी सनातनीयो को अपने कन्वर्शन से विराष्ट्रियकरण से बचना चाहिए, व शुद्धिकरण करके सच्चे सनातनी बनने चाहिए। नास्तिकवाद एथेस्टवाद वामपंथ के मिशनरियों के छिपे हुए षड्यंत्र व अभियान से सतर्क रहने की आवश्यकता है। राष्ट्र की आत्मा उसकी संस्कृति होती है।
संसार का सबसे प्राचीन पुस्तक कौनसी है? बीस रूपये के GK के पुस्तक में भी इसका उत्तर वेद (ऋग्वेद) ही मिलेगा, और पुरे विश्व के पुरातत्ववेत्ताओ के निष्कर्षों का सार भी यही वेद है। अतः अपनी जडो की ओर लौटो हिंदूओ। कब तक मत पंथ मे बंटोगे? प्रत्यक्ष को प्रमाण क्या? बागेश्वर की मन की बात जानने की अभूतपूर्व प्राचीन विद्या प्रत्यक्ष प्रमाण है। योगदर्शन के अनुसार सिद्ध पुरुष या ईश्वरीय कृपा भी ऐसे रास्ते है जिनसे सिद्धि प्राप्त होती है। कर्म फल विधान से पाप का दंड भोगने कोई नहीं बचा सकता। क्योंकि ईश्वर न्यायकारी है। इसलिए हर प्राणी को पाप व पुण्य कर्म भोगने पडते ही है। निष्काम कर्म, कर्मफल से मुक्त करता है। उसका फल ईश्वरप्राप्ती है। मोक्ष की प्राप्ति है।
अतः कर्मफल से बचने के लिए अंधश्रद्धा मे फंसकर मत पंथ अब्राह्मीक मजहबो मे वामपंथ में जाना, वेदविरूध्द मतो मे जाना सर्वथा ज्ञान विज्ञान तर्क तथ्य का अभाव ही है। अंततः धर्म के महान रक्षक हमारे राजा, चक्रवर्ती सम्राट महाराज भोज का कथन स्मरणीय है उन्होंने कहा है -
बलवानप्यशक्तोऽसौ धनवानपि निर्धनः ।
श्रुतिवानपि मूर्खश्च यो धर्मविमुखो जनः ॥
अर्थात् वह व्यक्ति बलवान् होते हुए भी शक्तिहीन है , धनवान् होने पर भी निर्धन है , विद्वान होते हुए भी मूर्ख है जो धर्म से विमुख है ।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें