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❝ पतिव्रताओं को देखकर वेश्याएँ
ईर्ष्या से भर उठती हैं....
(... द्वेष्या... वाराङ्गना कुलस्त्रीणां... )
~चाणक्य
(ध्यातव्य : आचार्य चाणक्य के समय न तो कोई वेश्या थी न वेश्यालय थे न वेश्यावृति वैध थी। यदाकदा वाराङणाएं थी जो नृत्य गान करने मे जीवन व्यतीत करती थी, इनके अपने स्तर थे। अस्तु... आज वेश्या विस्तृत हो गयी है। ऊनकी कोई आर्थिक विवशता नही है।)
बालीवुड की वाराङणाओ
की ईर्ष्या ही उनकी तिलमिलाहट है
वे वाराङ्गनाएं उनका विलाप आंदोलन नही है...
केवल वामपंथी राक्षसी प्रवृत्तियों की ईर्ष्या है...
जिस आग में स्वयं जल रही होती है वे उसमे
अपने बराबर दुसरो को ले आना लक्ष्य है उनका...
अंततोगत्वा पश्चाताप के अतिरिक्त कुछ भी नहीं होता...
शाश्वत सनातन व्यवस्था पर जड़वाद का प्रहार है ये...
वे जो स्वयं असमाजिक अपराधी तत्व है
आज स्वयं को कोई विदुषी सफल व
समाजशास्त्री दिखाने लगी है...
इसे कहते हैं बाहरी चमक-दमक...
और यथार्थ मे ये सातवी फेल है...
छद्म सम्मान छद्म पुरस्कार धन भी है
लेकिन सम्मान इज्जत आबरु नही होती इनके पास...
सन्मार्ग मे आने का मार्ग सदैव के लिए बंद होता है...
वेश्या दुकानदार है और ग्राहक male है...
दुकानदार को दुकानदार ही कहा जाता है,
ग्राहक को ग्राहक नही कहा जाता...
सुप्रीम कोर्ट वेश्यावृति को मौलिक
व्यावसायिक अधिकार बताकर वैध किया है...
अतःएव..
कुलीन वर्ग की समाज की श्रेणी से इन्हे भीतरी अशांति
भीतरी असंतोष की भावना, भीतरी आसुरी वृत्ती,
भीतरी स्वार्थ की लहरें, सब मिलकर के इनको अंदर से एक इस तरह का स्वरूप देती है ईर्ष्या द्वेष विद्वेष का...
फिर इनकी वामपंथी साझेदारी, बाहरी झूठी दिखावट एक वस्तु के रूप में उपभोग की वस्तु होना, कुल मिलाकर इनके भीतर न कोई लज्जा होती है न मर्यादा होती है...
वामपंथ अपने एजेंडा में इनको सम्मेलित किये रहता है,
इसके इस राक्षसी एजेंडा विखंडन को स्वच्छंदता
निरर्थक पावर पाने की नारीवाद की आड मे
राष्ट्र की सेना तक पर आघात करने की
छ्द्म नारीवाद आदि की ये
फिर नेता बन जाती है।
और मुर्ख फालोवर इनको सेलेब्रिटी सेलेब्रिटी
बोलने वाले जमा हो जाते हैं और 8 वी 9 वी फेल
बालीवुडी कथित हिरोइन या सेलेब्रिटी व जेएनयू
मिलकर बैठकर ज्ञान पेलते रहते हैं... ये गठजोड़ है।
वामपंथ का लक्ष्य है एथेस्ट (नास्तिकवाद) बनाओ.
परिवार ही रूकावट है क्योंकि नही तो आस्तिकता
भरता है,उनको खत्म करो इससे वर्ल्ड आर्डर व
मार्केटवाद का भला ही भला होगा।
परिवार का डिपोजिट कैश
मार्केट में आएगा...
सारी जनता स्टेट पर निर्भर होगी,
वृद्धाश्रम मे वृद्धि होगी...
आदि आदि...
इनकी बडी लंबी गहरी जडे है
सब एक दुसरे को जुडी हुई है...
आक्सफर्ड या हार्वर्ड की डिक्शनरी व वेद सभी के सार मे राष्ट्र संस्कृति से बनाया जाता है। राष्ट्र की आत्मा संस्कृति होती है।
जो आपसे ईर्ष्या करे द्वेष करे वो आपके लिए कितना बडा विखंडन खडा करेगा, धन तो वो कमाएगे, राष्ट्र का तो वो द्रोही हैं ही, सोचिए रखकर देखिए उन लोगो के जगह आप स्वयं को.. वो कितने बडे राष्ट्रद्रोही है वाम तत्व है... इसमे अहित किसका है?
आपका विद्वेषी कभी भी आपका हितैषी
न नीजी स्तर पर हो सकता न राष्ट्र जीवन में...
वामपंथी फेमिनिस्ट महिलाओं की राक्षसी वितृष्णा ईर्ष्या कहती हैं कि जब हम समाज से बाहर है तो कोई भी शेष न रहे। सब भांडवर्ग कोठावर्ग, वेश्यावर्ग, नचनी वर्ग ही बन जाए। सभ्य समाज,भारतीय समाज, राष्ट्रीयता, भारतीय संस्कृति समाप्त हो जाये।
इसके लिए वे धर्म का विरोध करते हैं। चेतना का विरोध करते हैं। क्योंकि धर्म क्या है? लज्जा धर्म है। धैर्य धर्म है। दया धर्म है। आचार धर्म है। अतः को ये नष्ट कररहे है अर्थात् इससे सुख तो समाप्त होगा ही। क्योंकि सुख का मूल धर्म है।
और इसलिए मित्रो, वामपंथ का परिणाम बडा दुखदायी है। समाज में जो अनावश्यक छद्म नारीवाद फैल रहा है, जिसमे एक नारी अनेकानेक सज्जनलोगो पर जानते-बूझते कानूनी दुरूपयोग से असत्य आरोप लगाकर परिवार को तोड रही है, को रोकने व निरपराधीयों को सजा से रोकने के लिए नार्को पोलिग्राफी और ब्रेन मैपिंग संबंधित कानून संसद द्वारा बनाने आवश्यक है। जेंडर न्युट्रल लॉ भी अनिवार्य है।
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