व्यभिचारी जनता...

 आज भारत की व्यभिचारी जनता पर बात करेंगे...

लडकी जब मुस्लिम लडके के बहकावे मे आ जाती है तब लव जिहाद का विषय उजागर होता है। ये बहकावे मे आकर उनके द्वारा दुष्कर्म का शिकार हो चुकी लडकीयो के मामले होते हैं। ऐसे मामले बहोत से है। गणना कहा तक करे। इनका मूल कारण जानने की चेष्टा कितने हिन्दू करते हैं?

जो दुष्कर्म अचानक सा व बलात् हो जाएगा यानि कि बलात्कार..., वहा तक तो कह सकते हैं कि इसमे लडकी का कोई वश नही था। लेकिन लडकी जहां स्वेच्छापूर्वक जाती रहे इसका कारण क्या है? तब क्या कहेंगे आप? तब तो समस्या की जड़ जाननी पडेगी। वहां तक वो लडकी यकायक तो नही पहुंची। और हिंदू लडकी मुस्लिम के यहा पहुंची, हो कि हिंदू, जो व्यभिचार है, जो कपडे के भांति भोग-विलास के लिए नित्य पार्टनर बदलने वाली कथित bf gf cult है वो कैसे अनदेखी कर दी जाती है? क्या वो नहीं देखनी चाहिए?

एक समाचार आया, मुसलमान लडके द्वारा हिंदू लडकी दुष्कर्म का शिकार हुई। दुष्कर्म अचानक नही हुआ। पहले व्यभिचार चल रहा था इसपर क्या टिप्पणी करे?

लडकीयां ही व्यभिचारी थी, स्वेच्छा से गयी, ऐसा कुकर्म तो किसी भी religion के लडके के साथ करना दंडनीय अपराध है। ये पहले adultery का मामला है फिर मजहब का और फिर दुष्कर्म का । आज के अभिभावक ही इसके जिम्मेदार हैं। सहशिक्षा जिम्मेदार है। कानून कोलेजियम जिम्मेदार है। संसद सरकार जिम्मेदार हैं। देश के मानसिक दास नागरिक इसके जिम्मेदार हैं। कोचिंग संस्थान और विद्यालय जो व्यभिचार के अड्डे बन रहे हैं जहां लडका लडकी को व्यभिचार करने की प्रेरणा दी जाती है, फुहड कार्यक्रम मनाए जाते हैं, ऐसी व्यवस्था पर गर्व करने वाले अंधे लोग जिम्मेदार हैं। शिक्षा जिसका उद्देश्य ही चरित्र निर्माण नही है वह हास्यास्पद पिछडी असभ्य व्यवस्था जिम्मेदार हैं। 

जिस दिन व्यभिचार को सुप्रीम कोठे द्वारा वैध घोषित किया गया, कोई हंगामा नही हुआ, क्यो? 

क्योंकि देश के नागरिक ही व्यभिचारी हैं बहोत साफ और सरल बात है। जो निर्बल है पेट भरना ही जिनके लिए बहुत है दीन हिन है उनको छोड दिजिए। लेकिन जो आवाज उठाने सक्षम थे जिनके पास समय था अर्थ था, जिनका वह कर्तव्य था वो चुप रहे, वे सभी सक्षम लोग तो व्यभिचार के समर्थक थे तभी तो ऐसा हुआ। 

वह व्यभिचार व्यक्तिगत मामला बन गया जिसपर कोई अन्य समाज गांव लोग जनसमूह न रोक लगा सकता न विरोध कर सकता, क्योंकि मौलिक अधिकार बन गया व्यभिचार तब उस कथित व्यक्तिगत मामलें के परिणामस्वरूप जब कोई दुष्कर्म होगा तो लोगों से परिसर के लोगो से रक्षा करने की आशा क्यो रखना चाहिए? ऐसी दुष्कर्म पिडिता को समाज क्यो बचाए? क्यों रक्षा करे? क्योंकि जो समाज या जन समुदाय व्यभिचार को अनुचित कहता है वो समाज अधिकांश गांव का है नगर का भी हो सकता है, वह विवश है, गरिब मध्यवर्ग से है। भारतीयता से युक्त है। समाज जब व्यभिचार के लिए हस्तक्षेप नही कर सकता, क्योंकि वो व्यक्तिगत मामला है तो व्यक्तिगत मामले में जब दुष्कर्म हो रहा हो तो उसमे वो क्यों हस्तक्षेप करे? जिस कोठे ने व्यभिचार को वैध घोषित किया उसी कोठे के मादरजात काले तिरपालो की ये जिम्मेदारी होनी चाहिए कि नही?

देश के लाखो छुटभैय्ये व बडे नेता, सहस्त्रो vip , सैकड़ों सांसद पूर्व सांसद, सहस्त्रो करोडपति लोग, कयी पद्मश्री से सम्मानित विभूषित लोग, मंत्री पूर्व मंत्री, सक्षम सरकारी अधिकारी, शिक्षाविद्, कोचिंग माफिया, कोलेजियम वाला अरबपति खरबपति वंशवादी ecosystem, देश के समाजसेवी दल, सभा, मंत्रालय आयोग, कार्यपालिका से जुड़े सभी वरिष्ठ वर्गों के लोग, इतने सारे इस देश के लाखो सक्षम नागरिक इनमे से किसी ने भी व्यभिचार के कानून के प्रति कोई धरातल पर विरोध क्यों नहीं किया? राजनीतिक दलों ने भी नही किया? क्योंकि यही कर सकते हैं और कौन करेगा?

इनके समिप समय भी था और धन भी। तब की बहुमत वाली शक्तिशाली सरकार ने भी कुछ नहीं किया। इसका अभिप्राय यही है कि ये सभी लोग व्यभिचार वैध चाहते हैं और स्वयं व्यभिचारी है ।

मान लिया सरकार का असंवैधानिक अलोकतांत्रिक कोलेजियम पर वश नही था न है लेकिन विरोध करने पर फांसी हो जाती? एक भी नेता क्रांतिकारी नही है। ऐसी संसद व सरकार व्यवस्था परिवर्तन कभी कर पाएगी? कभी नही। और मतदान लोगो ने किस नामपर दिए? राम रामराज्य राममंदिर...!! क्या राममंदिर ही रामराज्य है? राममंदिर तो हो गया लेकिन कानून व शिक्षा मे रामत्व का लेशमात्र परिवर्तन हुआ?

इसके विपरीत तो एकता कपूर, करण जौहर जैसो को पद्मश्री देकर सारे अच्छे लोगो को दिए पद्मश्री सम्मान पर पानी फेर देनेवाला काम हो गया। कहा तक कहे। व्यभिचार इस राष्ट्र मे पहली बार वैध हुआ, जो किसी राजा के कालखंड मे अनवरत अंग्रेजो तक और भ्रष्टाचारी कांग्रेस के राज तक भी अवैध था वो भारतीय संस्कृति की रक्षक पार्टी के सरकार के रहते वैध हुआ। वाह!

एक अजीत भारती जी पत्रकार के अतिरिक्त कभी भी कोठे पर कोई भी पत्रकार बोला? सारे दक्षिण वाले भी दल्ले और वामपंथी भेडीए भी..! कोठा इस संदर्भ में माननीय नही होता उसकी खटिया खडी केवल जनता ही कर सकती है और स्वयं को इस कलंक से मुक्त कर सकती है । जो यह कलंक लगे अब तक 2 वर्ष से अधिक व्यतीत हो गये।  इस महान भारतीय सनातन वैदिक सभ्यता के राष्ट्र आर्यावर्त मे इस राष्ट्र की आत्मा को क्षत करनेवाला हर काम हो रहा है लेकिन इसको रक्षित करनेवाले विशाल कार्य पर बस छद्म राजनीति हो रही है।

नालंदा खडा हो गया, कौन approved करेगा? UGC.. कैसे चलेगा? UGC की Guidelines मे। मैकालेइज्म खत्म हुआ ? नही पता! मूल मे कोई नही देखता। बिल्डिंग दिख गयी हो गया नालंदा। पहले के भांति विश्वविद्यालय होगा कि बस नाम मात्र का नालंदा होगा ये तो आगे पता चलेगा। कितने लोग भारतीय विश्वविद्यालयों की शिक्षा पद्धति से परिचित हैं? गुरूकुल वाले होंगे पर आज आर्य समाज के अतिरिक्त कोई गुरुकुल आर्ष परंपरा को जिवित भी रखे हुए हैं? अंधो का क्या है, वे तो ISCON गुरूकुल देखकर भी कहते हैं, हो गया गुरूकुल। आ गयी भारतीय शिक्षा। वह क्या है? आर्यावर्त की शिक्षा ऐसी थी? अब वैसे ही राममंदिर देखकर और नालंदा की बिल्डिंग देखकर क्रमशः रामराज्य और स्वदेशी शिक्षा मे कुछ कार्य हो गया यह माना जा रहा है.... भौतिक भवनों से कुछ नहीं होता। विद्यालय में शिक्षा शिक्षक स्वदेशी व्यवस्था हो व मंदिर में भी गुरूकुल हो ऐसी हमारी व्यवस्था रही है। 




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