वेदानूकुल गीता को जानिए
श्रीमदभग्वदगीता का वैदिक उपदेश
ईश्वर का स्वरूप :-
• सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् ।
सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ।। ( 13/13 )
ईश्वर सर्वव्यापक है । सब ओर उसके हाथ पैर हैं । वह सब जगह देखता और सुनता है ।
• अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्मुच्यते ।
भूतभावादोभ्दवकरो विसर्गः कर्मसंज्ञितः ।। (8/3)
ईश्वर जन्म और मृत्यु से परे है । वह अवतार नहीं लेता ।
• बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च ।
सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयं दूरस्थं चान्तिके च तत् ।। (13/15)
ईश्वर अत्यन्तसूक्ष्म होने से बाहर की आँख आदि इन्द्रियों से जानने योग्य नहीं है । ईश्वर न आता है न ही कहीं जाता है । क्योंकि वह दूर तथा पास स्थानों पर विद्यमान है, वह निराकार होने से दिखाई नहीं देता ।
• यया धर्ममधर्म च कार्य चाकार्यमेव च ।
अयाथावत्प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी ।। ( 18/13 )
हे अर्जुण ! यदि तूँ इस निराकार अत्यन्त सूक्ष्म और सर्वव्यापक ईश्वर को जानना चाहता है तो अपने हृदय में ही ध्यान करके जान सकता है, क्योंकि वह बाहर नहीं मिल सकता । वह वहीं मिलता है जहाँ आत्मा भी हो, दोनों का वास हृदय में ही है बाहर नहीं ।
• ईश्वर सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति ।
भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारुढानि मायया ।। (18/61)
हे अर्जुण ! वह परमात्मा ही व्याप्त होकर अपनी निराकार शक्तियों से इस संसार को यन्त्र के समान चलाता है ।
• तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत ।
तत्प्रसादात्परां शान्तिस्थानं प्राप्स्यसिशाश्वतम् ।। (18/62)
हे अर्जुण ! उसी निराकार सर्वव्यापक संसार को बनाने तथा चलाने वाले की शरण में पूर्ण भावना सहित जा । उसकी शरण में जाने से सर्वोत्तम शांती तथा शाश्वत सुख मिल सकता है । ( तमेव शब्द सिद्ध करता है कि कृष्ण ईश्वर से भिन्न हैं )
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