क्या आत्मा की सत्ता है?

 4.4.2020.


*प्रश्न --- क्या आत्मा की सत्ता है?*

*उत्तर -- जी हाँ, है।*


कैसे? संसार में कुछ नियम हैं, जिनमें से एक नियम है , कि *कोई भी गुण, बिना द्रव्य के नहीं रहता.* 

(जो तत्त्व गुणों को धारण करता है, उसे द्रव्य कहते हैं. और द्रव्य जिस विशेषता को धारण करता है, उसे गुण कहते हैं।)

जैसे *गर्मी* एक गुण है। इसे *अग्नि* नाम का द्रव्य धारण करता है। अर्थात गर्मी, अग्नि में रहती है , उससे दूर अलग नहीं रह सकती। जहां भी गर्मी होगी , वहां पर अग्नि तत्त्व अवश्य होगा। कहीं स्थूल रूप में और कहीं सूक्ष्म रूप में । जैसे, चूल्हे में अग्नि जलती है, उसकी लपटें दिखती हैं, यह स्थूल है, दिखाई देती है। 

पर भट्ठी में एक लोहे की रॉड गर्म कर दी जाए और बाहर निकाल के रख दी जाए, तो उसमें गर्मी भी है अग्नि भी है, परंतु वहां स्थूल रूप में लपटें नहीं दिखती। सूक्ष्म रूप में वहां दोनों हैं। अग्नि भी है, और गर्मी भी है। 

इस उदाहरण से पता चला, कि कोई भी गुण बिना द्रव्य के नहीं रहता।


एक और दूसरा नियम - *जैसे गुण कारण द्रव्य में होते हैं, वैसे ही कार्य द्रव्य में उत्पन्न होते हैं। जो गुण कारण द्रव्यों में नहीं होगा, वह कार्य द्रव्य में भी उत्पन्न नहीं होगा।* उदाहरण - यदि कोई व्यक्ति, सूजी घी पानी आदि को चूल्हे पर पकाए और उसमें वह चीनी डाले, तो हलवा बन जाएगा, और वह मीठा होगा। क्योंकि मिठास गुण वाली चीनी हलवे में डाली गई थी। कारण द्रव्य चीनी में मिठास गुण था, इसलिए हलवे में मिठास गुण उत्पन्न हुआ।

 यदि चीनी के स्थान पर नमक डाल दिया जाए, तो उपमा बन जाएगा, और उसका स्वाद भी नमकीन होगा। 

इस उदाहरण से पता चला कि, जिन कारण द्रव्यों से वह द्रव्य बनाया गया, उन में मिठास नहीं था, तो उपमा बनने पर उसमें भी मिठास उत्पन्न नहीं हुआ। जब चीनी डाली गई, तब हलवे में मिठास आया। क्योंकि मिठास उसके कारण द्रव्य चीनी में था । 

इससे पता चलता है कि *यदि कोई गुण, किसी कारण द्रव्य में न हो, तो उससे उत्पन्न होने वाले कार्य द्रव्य में भी वह गुण उत्पन्न नहीं होता।


अब जो लोग आत्मा को नहीं मानते, उन लोगों से हमारा यह प्रश्न है, वे इस प्रश्न का उत्तर सोचें और हमें बताएं।

हमारा प्रश्न है कि - यह जो व्यक्ति या मनुष्य है, इस व्यक्ति या मनुष्य में क्या *इच्छा* नाम का कोई गुण है? 

यदि है। तो जिन तत्वों से यह व्यक्ति या मनुष्य या शरीर बना है, उन तत्वों में अर्थात कारण द्रव्यों में, कहीं न कहीं यह इच्छा नाम का गुण होना चाहिए। ऊपर नियम बताया जा चुका है कि - जो गुण कारण द्रव्य में नहीं होता, वह कार्य द्रव्य में भी उत्पन्न नहीं हो सकता। 

तो आपकी दृष्टि में, जिन तत्वों से मनुष्य बना है, वे सब भौतिक पदार्थ हैं। तो आप कृपया बताएं, कि कौन से भौतिक मूलद्रव्य में इच्छा नामक गुण विद्यमान है? हीलियम हाइड्रोजन नाइट्रोजन अॉक्सीजन कॉपर गोल्ड सिलिकॉन लिथियम या एटम इलेक्ट्रॉन प्रोटॉन न्यूट्रॉन एनर्जी आदि, किस द्रव्य में इच्छा नाम का गुण है?

  यदि इनमें से किसी भी द्रव्य में इच्छा नामक गुण नहीं है, और इन्हीं द्रव्यों को मिलाकर उत्तरोत्तर विकास होते होते एमिनो एसिड्स बने, सैल्स बने और उसी से विकास होकर यह मनुष्य शरीर बना, तो यह बताएं कि *शरीर या मनुष्य में यह इच्छा नामक गुण कहां से आ गया? जबकि मूलद्रव्य में किसी में भी इच्छा नहीं है।* तो नियम के अनुसार जब कारण द्रव्य में इच्छा नहीं है, तो कार्य द्रव्य अर्थात शरीर में भी यह उत्पन्न नहीं हो सकती।

        *फिर भी शरीर या मनुष्य में, इच्छा सभी को प्रत्यक्ष है।*

इससे यह अनुमान करना चाहिए, कि यदि कहीं कोई गुण उपलब्ध है, तो उसको धारण करने वाला कोई न कोई द्रव्य भी अवश्य होगा। इससे सिद्ध हुआ कि इच्छा जिस द्रव्य में रहती है वह द्रव्य भौतिक द्रव्यों से तो अलग प्रकार का है। क्योंकि भौतिक द्रव्य में तो किसी में भी इच्छा नामक गुण उपलब्ध नहीं है। तो हम दार्शनिक लोग उसे अभौतिक द्रव्य मानते हैं। और उसे *आत्मा* नाम से कहते हैं। 

तो मनुष्य में पाया जाने वाला जो इच्छा नामक गुण है , उसको धारण करने वाला एक द्रव्य निश्चित रूप से मानना ही चाहिए। क्योंकि *बिना द्रव्य के कोई गुण अकेला नहीं रह सकता।* इस नियम के आधार पर, इच्छा नामक गुण को धारण करने वाले द्रव्य आत्मा की सत्ता सिद्ध होती है। जब तक शरीर में आत्मा रहेगा, तब तक इच्छाएं उत्पन्न होती रहेंगी। जब आत्मा शरीर को छोड़कर चला जाएगा, =(मरने पर) तब सारी इच्छाएं भी समाप्त हो जाएंगी। जैसे , जब तक बिजली करंट सप्लाई होती रहती है, तब तक पंखा चलता रहता है। करंट सप्लाई बंद होने पर, पंखा भी बंद हो जाता है। 


इसी प्रकार से हमारे और भी प्रश्न हैं। *क्या मनुष्यों में द्वेष भी देखा जाता है? क्या वे प्रयत्न भी करते हैं, अर्थात वे स्वयं कर्म करते हैं? क्या मनुष्य सुखी और दुखी भी होते हैं? क्या मनुष्यों में ज्ञान भी है?*

द्वेष गुण का अर्थ है लड़ाई झगड़ा ईर्ष्या करना। दो कुत्तों के बीच में एक रोटी डाल दीजिए और फिर देखिए वे झगड़ेंगे। परंतु यदि दो मोटरसाइकिलों के बीच में 5 लीटर पेट्रोल रख दिया जाए, तो वे नहीं झगड़ती। क्योंकि उनमें द्वेष नहीं होता।


प्रयत्न गुण का अर्थ है स्वयं क्रिया करना। जैसे मनुष्य स्वयं चलता है, उसे न तो धक्का मारना पड़ता है, और न ही उसे चलाने के लिए किसी ड्राइवर की आवश्यकता होती है। परंतु स्कूटर कार आदि भौतिक पदार्थ स्वयं नहीं चलते। या तो उन्हें धक्का लगाना पड़ता है या कोई ड्राइवर चलाए। इसे प्रयत्न गुण कहते हैं, जो कि मनुष्य में है, कार स्कूटर में नहीं है।


 सुखी दुखी होना गुण का अभिप्राय है यदि मनुष्य को गर्मी के दिनों में एयर कंडीशंड रूम में बिठा दें, तो वह सुख का अनुभव करता है। और यदि धूप में खड़ा कर दें, तो आधे घंटे में ही वह दुख का अनुभव करता है। जबकि ये दोनों सुख दुख के अनुभव स्कूटर कार में नहीं होते। चाहे वे 8 घंटे भी धूप में खड़े रहें। 


ज्ञान का मतलब है जानकारी। मनुष्य को मालूम है मुझे कहां जाना है, क्या करना है? खाने की चीज को खा लेता है, पहनने की चीज को पहन लेता है। उसे यह सब जानकारी है। परंतु कार स्कूटर आदि भौतिक पदार्थों को यह जानकारी नहीं है, कि अब धूप तेज हो गई है, तो मैं छाया में जाकर बैठूं। परंतु तेज धूप लगने पर मनुष्य छाया में जाकर बैठता है, उसे जानकारी भी होती है, और सुख-दुख की अनुभूति भी होती है। ये गुण भौतिक पदार्थों में नहीं देखे जाते। 

इससे पता चलता है कि इच्छा ज्ञान आदि गुणों को धारण करने वाला, भौतिक द्रव्यों से भिन्न, कोई चेतन पदार्थ है। हम उसे *आत्मा* के नाम से कहते हैं।


यदि ये इच्छा द्वेष आदि सारे गुण हैं, तो प्रश्न उत्पन्न होता है कि, इच्छा द्वेष प्रयत्न सुख-दुख का अनुभव तथा ज्ञान, ये सब गुण किस द्रव्य में रहते हैं? हमारी मान्यता तो यह है, कि ये सारे गुण आत्मा में रहते हैं। 


अब आपको उत्तर देना है, कि आप के भौतिक विज्ञान के अनुसार ये गुण किस द्रव्य रहते हैं? और जीवित अवस्था में तो दिखते हैं, मरने पर क्यों नहीं दिखते?

*लेखक - स्वामी विवेकानंद परिव्राजक, निदेशक, दर्शन योग महाविद्यालय, रोजड़, गुजरात।*

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