दृष्ट व्यक्ति की परिभाषा...
21.2.2022.
"दुष्ट व्यक्ति की परिभाषा यह नहीं है, कि 'जिसके साथ आपका विचार नहीं मिलता, वह दुष्ट है।' यूं तो आप और वह दोनों दुष्ट कहलाएंगे। क्योंकि दोनों का विचार आपस में नहीं मिलता। वास्तव में दुष्ट का अर्थ है, 'जो ईश्वर के संविधान के विरुद्ध आचरण करे, वह दुष्ट है।' ईश्वर का संविधान है, वेद। वेदों की व्याख्या ठीक ठीक की है, ऋषियों ने। अतः "जो वेदों और ऋषियों के शास्त्रों के विरुद्ध विचार रखता है, उनके विरुद्ध भाषा बोलता है, और उनके विरुद्ध आचरण करता है, वह दुष्ट है। वेदों और ऋषियों के ग्रंथों में जो सभ्यता और मानवता बताई गई है, जो व्यक्ति उसके विरुद्ध आचरण करे, वह दुष्ट है।"
प्रत्येक व्यक्ति के विचार अलग-अलग होते हैं। इसके अनेक कारण हैं। "उनके पूर्व जन्मों के संस्कार अलग-अलग होते हैं। सब के माता पिता परिवार पड़ोस शिक्षा पद्धति सिलेबस खानपान इत्यादि में भी अंतर होता है, जिससे उनके विचारों में भिन्नता आ जाती है।"
"संसार में सब लोग दुष्ट नहीं होते।" यदि 100 में से 80 व्यक्ति वेदादि शास्त्रों के अनुकूल आचरण करते हैं। भले ही उनकी रुचि अलग अलग है, लेकिन वे सब लोग कार्य तो वही करते हैं, जिनका वेदों में विधान किया गया है, इसलिए उनको दुष्ट नहीं कहा जा सकता। अंतर इतना ही है, कि अपनी रुचि अलग अलग होने से, वे लोग अलग अलग कार्य करते हैं। इस में कोई बाधा नहीं है। "परंतु जो 100 में से 20 व्यक्ति, वेदों और ऋषियों के विरुद्ध आचरण कर रहे हैं, सभ्यता एवं मानवता के विरुद्ध आचरण कर रहे हैं, वही 20 व्यक्ति दुष्ट कहलाएंगे।"
प्रश्न -- जो 80 लोग हैं, क्या वे कुछ भी आचरण वेदों और ऋषियों के विरुद्ध नहीं करते? हो सकता है, उनमें से भी कुछ लोग 2 / 4 काम वेदों और ऋषियों के विरुद्ध करते हों। तब क्या उनको दुष्ट नहीं कह सकते?
उत्तर -- कोई 2 / 4 काम गलत करे, तो इतने मात्र से उसे दुष्ट नहीं कह सकते। ऐसा मानने पर तो सभी दुष्ट कहलाएंगे। क्योंकि 2 / 4 गलतियां तो किसी से भी हो सकती हैं। जबकि संसार में बहुत से सज्जन लोग भी हैं।
प्रश्न -- फिर दुष्टता और सज्जनता की पहचान का क्या आधार रहेगा?
उत्तर -- "जो जानबूझकर अधिकांश कार्य वेदों व ऋषियों के विरुद्ध करता हो, या जो अनेक कार्य वेदानुकूल करते हुए भी, बड़ी बड़ी हानियां करने वाले कुछ कार्य वेदों व ऋषियों के विरुद्ध जानबूझकर कर देता हो, वह दुष्ट है।" और "जो अधिकांश कार्य वेदानुकूल करता हो, बड़े बड़े लोकोपकारक लाभदायक कार्य करता हो, उससे अनजाने में छोटी छोटी 2/4 गलतियां भले ही हो जाएं, परन्तु जानबूझकर वेदों के विरुद्ध आचरण नहीं करता हो, तो वह सज्जन है।"
"इस परिभाषा के अनुसार समाज में जो 'दुष्ट लोग' दिखाई दें, उनसे दूर रहें। ऐसे दुष्टों से बचकर रहें। उन से प्रेम भी न करें, और दुश्मनी भी न करें। राग भी न करें, द्वेष भी न करें। किसी प्रकार का लड़ाई झगड़ा न करें। बस उनसे अपना बचाव करें। उनकी उपेक्षा रखें। यदि आप उन के संपर्क में रहेंगे, तो वे आपको भी डुबो देंगे। आपके जीवन में अशांति उत्पन्न करेंगे, और आपका जीवन भी भ्रष्ट कर देंगे।"
"सज्जनों के संपर्क में रहें। उनके आदेश निर्देश संदेश सुझाव का पालन करें। ऐसा करने से आपको बहुत अधिक लाभ होगा। इस तरह से जीवन जीने से आप प्रसन्न रहेंगे। जीवन में अच्छी उन्नति करेंगे, और सुखमय जीवन जिएंगे।"
---- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, रोजड़ गुजरात।
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