कृतज्ञता व कृतघ्नता...

 24.6.2021.

         *"अपने आचरण को पहचानें। आप कृतज्ञ हैं? अथवा कृतघ्न?"*

        *"कोई व्यक्ति आपके ऊपर कोई उपकार करे, आपको सहयोग देवे, आपका भला करे, आपकी समस्याओं को सुलझावे, आप की किसी भी प्रकार की सहायता करे। और यदि आप उसके इन उपकारों को हृदय से स्वीकार करते हैं, उसका आभार मानते हैं, धन्यवाद करते हैं, उसके साथ सभ्यता नम्रता सम्मानपूर्वक व्यवहार करते हैं, तो इसका नाम 'कृतज्ञता' है। और यदि आप इसके विपरीत व्यवहार करते हैं, तो उसका नाम 'कृतघ्नता' है।"*

         कृतज्ञता ही मानवता है। यह मनुष्यता का सर्वप्रथम लक्षण है। सबसे उत्तम कर्म है। सबसे बड़ी सभ्यता है। *"जो व्यक्ति कृतज्ञता का व्यवहार नहीं करता, बल्कि इसके विपरीत कृतघ्नता का व्यवहार करता है, उसे शास्त्रों में बहुत बड़ा पापी बतलाया गया है।"*

            रामायण में तो यहां तक कहा है, कि कृतघ्नता इतना बड़ा पाप है, कि इसका कोई प्रायश्चित भी समझ में नहीं आ रहा, जिसे करके व्यक्ति इसके बुरे संस्कार से छूट जाए। इसलिए कभी भी कृतघ्नता नहीं करनी चाहिए। विशेष रूप से अपने माता-पिता और गुरुजनों के साथ या और भी जो बड़े विद्वान धनवान बलवान उच्च पदस्थ महानुभाव हैं, उनके साथ तो ऐसा व्यवहार कभी भूल से भी नहीं करना चाहिए।

         *"जो लोग मन में राग द्वेष रखते हैं, अभिमानी हैं, हठी दुराग्रही हैं, किसी की बात नहीं सुनते, सब जगह अपनी मनमानी करते हैं, ऐसे दुष्ट प्रवृत्ति के लोग ही इस प्रकार की कृतघ्नता के पाप करते हैं।"* ऐसे लोगों को सावधान हो जाना चाहिए। जो विद्या उन्होंने अपने माता-पिता और गुरुजनों से प्राप्त की है। उस विद्या को कलंकित नहीं करना चाहिए। और भी सेवा प्रोत्साहन सहयोग सुरक्षा आदि अनेक प्रकार का लाभ उन्होंने अपने माता-पिता गुरुजनों आदि से प्राप्त किया है, उसका भी सदुपयोग करना चाहिए, दुरुपयोग नहीं। 

       उन्हें अपने दोषों से युद्ध करना चाहिए। अपने हठ दुराग्रह ईर्ष्या अविद्या राग द्वेष अभिमान आदि दोषों को दूर करके ईश्वर की कृपा का पात्र बनना चाहिए। समाज के साथ सभ्यता नम्रता से मिल जुलकर रहना चाहिए। ऐसा करने से वे अपना जीवन भी सुखमय बनाएंगे और दूसरों को भी सुख देंगे। ऐसा करने से ही उनका जीवन सार्थक और सफल होगा। *"अन्यथा वे बहुमूल्यवान कठिनाई से प्राप्त होने योग्य इस मानव जीवन को व्यर्थ तो करेंगे ही, साथ ही ईश्वर की बनाई हुई पशु पक्षी वृक्ष आदि लाखों योनियाँ भविष्य में उनका स्वागत करने के लिए तैयार खड़ी हैं।"*

--- *स्वामी विवेकानंद परिव्राजक, रोजड़, गुजरात।*

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