किसी भी व्यक्ति से संबंध तोड़ने में जल्दबाजी न करें

किसी भी व्यक्ति से संबंध तोड़ने में जल्दबाजी न करें। कभी ऐसा न हो, कि बाद में आपको पछताना पड़े।

        मनुष्य सामाजिक प्राणी है, इसलिए वह अकेला नहीं जी सकता। उसे दूसरों का सहयोग लेना ही पड़ता है। इसीलिए लोग एक दूसरे से संबंध बनाकर रखते हैं, ताकि समय आने पर वे एक दूसरे से लाभ ले दे सकें।

       सब लोगों का स्वभाव भी एक सा नहीं होता। क्योंकि सब के विचार, पूर्व जन्म के संस्कार, योग्यता, बुद्धि का स्तर, खानपान, वातावरण, घर का परिवेश आदि भिन्न-भिन्न होने से सब के विचार पूरे-पूरे नहीं मिलते। जब पूरे-पूरे विचार आपस में नहीं मिलते, तो परस्पर टकराव उत्पन्न होता है। यह टकराव छोटा मोटा हो, तो लोग उसे सहन कर लेते हैं, और संबंध बनाए रखते हैं। परंतु यदि यह टकराव बड़े स्तर का हो, तो दो-चार बार सहन करने के बाद वे संबंध तोड़ देते हैं।

       जब दो व्यक्ति संबंध तोड़ते हैं, तो उनमें प्रायः एक व्यक्ति न्यायप्रिय होता है, अच्छा होता है, और दूसरा अन्यायप्रिय अर्थात बुरा। इसी कारण से उनमें आपस में टकराव उत्पन्न होता है, और संबंध टूट जाता है।

        जब संबंध टूट जाता है, तो अपने अपने स्तर पर दोनों व्यक्ति परेशान होते हैं, पश्चाताप भी करते हैं। इस स्थिति में अधिक परेशानी तो उस स्वार्थी अन्यायप्रिय व्यक्ति को होती है, जो उस संबंध का मूल्य ठीक से न समझ कर दूसरे न्यायप्रिय व्यक्ति को दुख देता था।

        अब संबंध टूटने पर उस न्यायप्रिय व्यक्ति की ओर से, जो उस अन्यायप्रिय व्यक्ति को लाभ मिल रहे थे, वे बंद हो जाते हैं। वह स्वार्थी तो था ही, इसीलिए वह अधिक दुखी होता है। परंतु जो न्यायप्रिय/अच्छा व्यक्ति था, उसका संबंध टूट जाने से और उसमें सहनशीलता नम्रता आदि विशेष गुण होने से उसे दुख कम होता है। वह बस इतना ही अफसोस करता है कि *अगर यह दुष्ट व्यक्ति मुझे ढंग से समझने की कोशिश करता, तो यह संबंध बना रहता, और इसे लाभ भी मिलता रहता। इसने मुझे समझने की कोशिश ही नहीं की। चलो कोई बात नहीं, मैं तो कहीं और संबंध जोड़ लूंगा और आनंद से अपना जीवन जी लूंगा।* ऐसा सोचकर वह अच्छा व्यक्ति प्रसन्नता से अपना जीवन जी लेता है।

       आप भी इस लेख पर चिंतन करें, और आत्म निरीक्षण करें कि आप दोनों में से कौन से व्यक्ति हैं? और भविष्य में किसकी तरह जीवन जीना चाहते हैं?

 - स्वामी विवेकानंद परिव्राजक

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